रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने दिल्ली में 19 फरवरी को एक पत्रकार सम्मेलन में मीडिया से कहा, ‘‘हमारे दामन साफ हैं. हमारे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है.’ यह बिल्कुल मनमोहन सिंह जैसा ही मामला था: निजी तौर पर पूरी तरह निष्कलंक छवि, लेकिन ठीक अपनी नाक के नीचे हो रहे भ्रष्टाचार पर रहस्यमय चुप्पी. एंटनी ने हेलिकॉप्टर घोटाले में अपने मंत्रालय की निष्क्रियता का बचाव किया.
इस घोटाले में इटली की हथियार कंपनी फिनमैकनिक्का ने कथित तौर पर पहले तो 12 एडब्लू-101 हेलिकॉप्टरों को खरीदने के लिए 3,546 करोड़ रु. के सौदे की रकम बढ़ा दी और फिर दलाली के तौर पर अनुमानित 350 करोड़ रु. बांटने के लिए बिचौलियों का इस्तेमाल किया. हालांकि फिनमैकनिक्का के सीईओ गुइसेपे ओरसी को इटली में 12 फरवरी को रिश्वत खिलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन एंटनी को सीबीआइ जांच का आदेश देने में दो दिन और सौदे का भुगतान रद्द करने में तीन दिन लग गए. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, यह सौदा इटली के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह भारत को हथियारों का निर्यात करने वाला एक बड़ा देश बन चुका है.
भारत को हथियारों के निर्यात के मामले में वह 2007 में 12वें स्थान से उठकर 2011 में 5वें स्थान पर पहुंच चुका है. इस तरक्की में दुनिया में आठवीं सबसे बड़ी रक्षा कंपनी फिनमैकनिक्का और उसके सीईओ ओरसी की भूमिका सबसे ज्यादा है. वे मिलान, लंदन, लुगानो और दिल्ली में बिचौलियों के जटिल नेटवर्क के मुखिया थे.
इस सौदे में 12 एडब्लू-101 वीवीआइपी हेलिकॉप्टरों की खरीद, परिचालन आवश्यकता नहीं थी, जैसा कि भारतीय वायु सेना का दावा है. इसकी खरीद से चीन या पाकिस्तान के साथ शक्ति के संतुलन पर कोई प्रभाव नहीं पडऩे वाला है. लेकिन इस सौदे से भारतीय हेलिकॉप्टर का बाजार कुछ हद तक फिनमैकनिक्का की ओर झुक गया. आठ सिविल और मिलिट्री सब्सिडियरी कंपनियों के माध्यम से भारत में इस कंपनी की सालाना बिक्री अब 1,000 करोड़ रु. हो चुकी है.
इस कंपनी में इटली सरकार की सबसे ज्यादा 32 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और आधिकारिक तौर पर इसने 2007 में भारत में कदम रखा. 2008 में नई दिल्ली के नेहरू प्लेस में इरोज कॉर्पोरेट टावर में स्थित दफ्तर में कॉफी की चुस्कियां लेते हुए भारत में फिनमैकनिक्का के तत्कालीन मैनेजर पावलो गिरासोले ने इंडिया टुडे को बताया था कि अगले पांच वर्षों के लिए हर साल उनकी बिक्री का लक्ष्य एक अरब डॉलर था. भारत को हथियारों की आपूर्ति के मामले में तब 12वां स्थान रखने वाले देश के लिए यह बड़ा लक्ष्य था. उस समय तक इटली ने 1980 के दशक में भारत के समुद्री जंगी जहाजों के लिए सिर्फ कुछ रडार और टॉरपीडो ही निर्यात किए थे. तब भारत के 80 फीसदी टैंक, लड़ाकू विमान और समुद्री जंगी जहाज रूसी मूल के थे और 2007 से 2011 के बीच 10 अरब डॉलर (55,000 करोड़ रु.) के भारतीय हथियारों के आयात ने इस व्यापार को और भी मजबूत कर दिया. फ्रांस, ब्रिटेन और इज्राएल की कंपनियां सिर्फ उन्हीं हथियारों की आपूर्ति कर पाईं जो रूस नहीं दे सकता था, जैसे रडार, मिसाइल, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्रोन.
सन् 2008 में फ्रांसीसी राजदूत जेरोम बोनाफंट से जब इटली के साथ प्रतिस्पर्धा के बारे में पूछा गया तो वे हंसने लगे. लेकिन इस भागीदारी की नींव फरवरी, 2005 में पहले ही पड़ चुकी थी, जब इटली के राष्ट्रपति कार्लो एजेग्लियो सियम्पी नई दिल्ली के दौरे पर आए थे. राष्ट्रपति के प्रतिनिधिमंडल में इटली के एक व्यापारी कार्लो गेरोसा भी थे, जो अब 67 वर्ष के हो चुके हैं. पिछले साल गेरोसा ने इटली में पूछताछ करने वालों को बताया था कि वे फिनमैकनिक्का के तत्कालीन सीईओ जार्जियो जाप्पा को जानते थे और ओरसी से मिल चुके थे, जो उस समय अगस्टावेस्टलैंड के सीईओ थे. सियम्पी के दौरे के समय गेरोसा ने भारतीय वायु सेना के तत्कालीन प्रमुख एयर चीफ मार्शल एस.पी. त्यागी और जाप्पा के बीच बैठक कराई. गेरोसा के अनुसार, इसके तुरंत बाद ओरसी ने उन्हें हर छह महीने पर 1,00,000 यूरो देने के वादे के साथ करार कर लिया. वीवीआइपी हेलीकॉप्टर के सौदे के लिए दौड़ चल पड़ी थी.
मेफेयर गिरोह के हथकंडे
गिरासोल ने 2008 में कहा था, ‘‘भारत सिर्फ बेचने का बाजार नहीं है, बल्कि यह तो औद्योगिक भागीदारी का बाजार है.’’ रिश्वत कांड में इटली की पुलिस की जांच से पता चला है कि भागीदारी के ये रिश्ते पारिवारिक शादियों और यूरोप के शानदार ठिकानों पर सैर सपाटे में बने. इसके लिए सांठगांठ भारत और विदेश में फिनमैकनिक्का के बिचौलियों ने की थी.
इनमें पहला नाम 52 साल के क्रिस्टेन मिशेल का है, जो लंदन के जाने-माने हथियार डीलर वॉल्फगैंग ‘‘वेश्ली’’ मिशेल का बेटा है. 84 साल के मिशेल सीनियर जर्मन मूल के ब्रिटिश थे, जिन्होंने पिछले साल लंदन में आखिरी सांस ली. वे ग्लोबल सर्विसेज ट्रेड कॉमर्स के मालिक थे, जिसका मुख्यालय लंदन में है और ग्लोबल सर्विस एफजेडई के कर्णधार थे, जिसका मुख्यालय दुबई में है. 2004 में उन्होंने फ्रांस की विमान कंपनी डसॉल्ट को इसलिए अदालत में खींच लिया था कि उसने भारतीय वायु सेना को 10 मिराज 2000 बेचने के सौदे में उनका कमीशन देने से इनकार कर दिया था. बाप-बेटे की यह जोड़ी मध्य लंदन के मेफेयर इलाके में दो कमरे के एक छोटे-से दफ्तर से काम करती थी और कर्मचारी के नाम पर बस एक सेक्रेटरी था.
मिशेल जूनियर अकसर नई दिल्ली आया करता था और औरंगजेब रोड पर क्लैरिजेज होटल में ठहरता था. 6 और 10 फरवरी के बीच बंगलुरू में हुए एयरो इंडिया 2013 में उसे विमानन कंपनियों के अधिकारियों से बात करते देखा गया था. इटली की पुलिस ने उसे ‘सौदे कराने में बिचौलिया’ बताया है और कहा है कि वह ‘‘भारत के भ्रष्ट अधिकारियों को देने के लिए जरूरी पैसे’’ दिया करता था. इटली की पुलिस ने 11 फरवरी को दायर मुकदमे में इटली के चार लोगों की गिरफ्तारी और रिमांड का जो नोटिस दिया है उसमें मिशेल जूनियर की भूमिका कुछ इस तरह बयान की गई हैरू अगस्टावेस्टलैंड एसपीए के सलाहकार क्रिश्चियन मिशेल ने वादा किया और तीन भाइयों जूली त्यागी, डॉक्सा त्यागी और संदीप त्यागी को एक निश्चित रकम, जिसका पूरी तरह हिसाब नहीं लगाया गया, 2004 से 2007 तक भारत के वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल शशि त्यागी को पहुंचाने के लिए दी...जिन्हें भारत सरकार के दायरे में सार्वजनिक रूप से यह सौदा करने का अधिकार दिया गया था और जिन्होंने यह काम अपने विभाग की आवश्यकताओं के विरुद्ध किया.’’
त्यागी बंधुओं की उलझने वाली अंधेरी दुनिया
अगस्टावेस्टलैंड के पास कारोबार का प्रस्ताव लेकर जाने वाले बिचौलियों में मशहूर हथियार एजेंट अभिषेक वर्मा भी था, जिस पर सरकारी गोपनीयता कानून के अंतर्गत सैन्य गोपनीय दस्तावेज रखने का आरोप लगा है. वह अपनी पत्नी एन्का नैक्स्यू के साथ सेना की गुप्त खरीद योजनाएं चुराने के इल्जाम में जेल काट रहा है. 7 अगस्त, 2009 के एक पत्र में अगस्टावेस्टलैंड ने वर्मा के अब अलग हो चुके न्यूयॉर्क स्थित पार्टनर सी. एडमंड्स एलन के सामने अपने हेलिकॉप्टरों की बिक्री में कमीशन देने का प्रस्ताव रखा. इसमें एक सौदा 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान इस्तेमाल के लिए एक हेलिकॉप्टर बेचने का था. यह सौदा सिरे नहीं चढ़ा लेकिन कंपनी ने हार नहीं मानी. ऐसा लगता है कि वर्मा कंपनी के लिए काम कर रहे कई बिचौलियों में से एक था.
इटली के जांचकर्ताओं का कहना है कि त्यागी बंधु पहले से अगस्टावेस्टलैंड के संपर्क में थे. इटली की पुलिस के अनुसार, उस समय मैदान में उतरे एजेंट त्यागी बंधु-राजीव ‘डॉक्सा’’, संजीव ‘‘जूली’’ और संदीप थे. ये तीनों भारतीय सौदे में वे बिचौलिए हैं जिन्हें शायद 350 करोड़ रु. का कमीशन मिला होगा. राजनैतिक, नौकरशाही, कारोबारी और सामाजिक दायरों में तीनों की अच्छी-खासी पैठ है.
सबसे बड़ा राजीव क्वालीफाइड डॉक्टर है, लेकिन उसने कभी प्रैक्टिस नहीं की. डॉक्सा जोड़-तोड़ में माहिर था. वह कांग्रेस और बीजेपी, दोनों के नेताओं के करीब था. 1984 के लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद से उम्मीदवार अमिताभ बच्चन के एक चुनाव प्रबंधक के रूप में उसने खूब नाम कमाया. वह राजधानी में अमिताभ बच्चन के 2-ए, मोतीलाल नेहरू मार्ग निवास से काम करता था और कहते हैं कि उसने राजीव गांधी से अमिताभ बच्चन की निकटता का खूब फायदा उठाया. बाद में उसने अटल बिहारी वाजपेयी के लखनऊ निर्वाचन क्षेत्र का कामकाज भी संभाला.
दूसरा भाई संजीव त्यागी उर्फ जूली वायु सेना का अधिकारी रह चुका है और रक्षा कारोबार से जुड़ा रहा है. एक प्रमुख प्राइवेट हथियार कंपनी के कर्मचारी ने बताया कि उसने 57 साल के जूली का नाम कुछ साल पहले सुना था, जब उसने गठजोड़ के लिए सर्बिया की एक हथियार कंपनी से संपर्क किया था. उसका कहना था कि जब मुझे बताया गया कि उनकी तरफ से संजीव त्यागी मुझसे संपर्क करेगा, तो मैं पीछे हट गया.
संजीव त्यागी की मुलाकात 2001 में इटली में लुगानो में एक शादी में कार्लो गेरोसा से हुई. संजीव ने अब तक अगस्टावेस्टलैंड के बिचौलिए बन चुके गेरोसा और हैश्के का संपर्क अपने रिश्ते के भाई एयर चीफ मार्शल एस.पी. त्यागी से कराया. अभियोजन पक्ष के दस्तावेज कहते हैं कि वायु सेना अध्यक्ष 2004 और 2007 के बीच अपने पद पर रहते हुए 6 या 7 बार इन दोनों बिचौलियों से मिले थे. एस.पी. त्यागी, टेलीविजन इंटरव्यू में इस सौदे से जुड़े होने से इनकार कर चुके हैं, लेकिन इटली के जांचकर्ताओं का कहना है कि वायु सेना के पूर्व अध्यक्ष इस सिलसिले की प्रमुख कड़ी हैं. 1.2 करोड़ यूरो की रिश्वत दो साल के भीतर 5 लाख 10 हजार यूरो की दो किस्तों में दी गई.
फिनमैकनिक्का के कंट्री हेड गिरासोल मार्च, 2012 में उस समय भारत छोड़कर चले गए, जब उनका नाम प्रारंभिक जांच में आया. इटली की पुलिस ने हैश्के और गेरोसा का बयान दर्ज किया है कि गिरासोल को 2009 और 2012 के बीच हर महीने 10,000 यूरो दिए गए. इटली में गिरासोल की जांच नहीं हो रही है. सीबीआइ इस केस की गांठें टटोल रही है, लेकिन बिचौलियों को भरोसा है कि वे पकड़े नहीं जाएंगे. इटली
की पुलिस ने गेरोसा के साथ हैश्के की वह बातचीत सुनी है, जिसमें उसने डींगे मारी हैं कि मॉरीशस तक जांच पहुंचने में कम-से-कम 10 साल लगेंगे.
वर्षों बाद फिर एक नए बोफोर्स की गूंज
फिनमैकनिक्का की तरफ से प्रेस के लिए जारी बयान में कहा गया है कि उसने हेलिकॉप्टर सौदे में भारतीय कानूनों का पूरी तरह पालन किया: ‘‘फिनमैकनिक्का को विश्वास है कि अगस्टावेस्टलैंड साबित कर देगी कि उसने भारतीय कानून का पूरी तरह पालन किया.’’
टाटा पावर एसईडी ने रक्षा मंत्रालय, विशेषकर वायु सेना में इटली की कंपनी की गहरी पहुंच का संकेत दिया था. सेना ने ही उन्हें टेंडर की भीतर की जानकारी दी थी. टाटा के एक अधिकारी का कहना है, ‘‘उन्हें ठेका मिलने का इतना भरोसा था कि अकेले ही बोली लगा दी.’’
दक्षिण अफ्रीका के पूर्व सांसद और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के अगुआ एंड्रयू फेनस्टेन ने दुनिया के हथियार उद्योग पर 2011 की अपनी पुस्तक द शैडो वर्ड में दिल्ली में भारतीय सेना के एक अनाम वरिष्ठ जनरल के बारे में लिखा है, जो ब्लू लेबल की बोतल के बिना हथियारों के किसी सेल्समैन को अपने दरवाजे से अंदर आने नहीं देता था. उन्होंने लिखा है, ‘‘रिश्वत देते हुए पकड़ी गई कंपनियों पर रोक लगाने की अफरातफरी में की गई कोशिशों के बावजूद बोफर्स सौदे में उजागर हो चुका भ्रष्टाचार गायब नहीं हुआ था.’’
रक्षा मंत्रालय ने इस रिश्वतखोरी को रोकने के लिए बेतरतीब कदम उठाए. उनसे भ्रष्टाचार तो रुका नहीं, बल्कि रक्षा तैयारी को जोखिम में डालकर अपनी ही जान सांसत में डाल ली. सिंगापुर, जर्मनी, इज्राएल और द. अफ्रीका की चार बड़ी हथियार कंपनियों पर रोक लग जाने से एक दशक में सेना के लिए आधुनिक तोपें और विमान भेदी तोपें लेने की प्रक्रिया ठप पड़ गई.
दुनियाभर में हथियार कंपनियों पर पाबंदी तभी लगती है जब वे बेलगाम देशों को हथियार देने के किसी गंभीर मामले में फंस जाएं. सेवानिवृत्त मेजर जनरल मृणाल सुमन का कहना है, ‘‘अगर रक्षा सौदे में रिश्वत पकड़ में आ जाए तो सबसे पहले यह पता लगाएं कि कितनी गड़बड़ हुई है, फिर दोषी कंपनी को दंड दें, उससे रिश्वत की रकम वसूलें या सौदा रद्द कर दें, सिर्फ ब्लैक लिस्ट करना काफी नहीं है.’’
रक्षा मंत्रालय किसी कंपनी को तभी ब्लैक लिस्ट कर सकता है जब सीबीआइ उस कंपनी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर दे. 19 फरवरी को रोम पहुंचने पर सीबीआइ अधिकारियों के साथ इटली के अधिकारियों ने इसलिए सहयोग नहीं किया, क्योंकि वे सिर्फ रक्षा मंत्रालय की दी गई प्रेस क्लिपिंग लेकर गए थे, उन्होंने कोई आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं किया था. सीबीआइ की सारी उम्मीद इटली के एक वकील पर टिकी है, जिसे उन्होंने इस मामले में भारतीयों की भूमिका तय करने के लिए रखा है.
21 फरवरी से शुरू हुए संसद के बजट सत्र में विपक्ष का कोपभाजन बनने की आशंका में यूपीए के कम-से-कम एक मंत्री ने तो जल्द चुनाव कराने की इच्छा व्यक्त कर दी. उन्होंने कहा, ‘‘इससे कम-से-कम हमारा सिर दर्द तो खत्म होगा. आज हेलिकॉप्टर है, कल जहाज होगा और परसों कोई पनडुब्बी होगी.’’ विपक्षी पार्टी बीजेपी ने अगस्टावेस्टलैंड की तुलना बोफोर्स रिश्वत कांड से की है, जिसका साया 1989 के भारतीय चुनाव को डस गया और राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल कर गया.
बीजेपी का इरादा कार्रवाई न करने के आरोप में एंटनी का इस्तीफा मांगने का है. कांग्रेस की लड़ाई राजनैतिक है और कैबिनेट में नंबर दो एंटनी सबसे ऊंची कमान के लिए इतने कीमती हैं कि उनकी बलि नहीं दी जा सकती.

