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एनडीए आगे, घटते यूपीए की कीमत पर छोटी पार्टियां मस्‍त

...लेकिन सौ टके का सवाल: देश का नेता कैसा हो? क्योंकि मोदी को एनडीए की हरी झंडी नहीं तो राहुल के असली दमखम का पता नहीं.

यूपीए
यूपीए
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2013

इस देश को अपनी समूची संवेदनहीनता के साथ बार-बार और लगातार अपमानित करने वाली मौजूदा सत्ता को भारत की जनता ने अपनी पूरी ताकत से ठुकरा दिया है. बदनामी के दलदल में घुटनों धंसी अपनी विरासत को अब भी जायज ठहराने की कवायद में लगे घिसे-पिटे एक नौकरशाह की सरकार और खानदान में ताजपोशी की एक और रस्म की तैयारी में लगी धुंधला चुकी ‘त्याग की देवी’ के कुनबे के लिए इससे बुरी चेतावनी कुछ नहीं हो सकती.

इंडिया टुडे-नीलसन देश का मिजाज पोल में यूपीए का गर्त में चला जाना किसी तबाही की तरह इस बात को सामने लाता है कि सत्ताधारी गठबंधन भारत की लड़ाई कैसे हार चुका है और इससे कहीं ज्यादा यह तथ्य कि उसका नेतृत्व कैसे इस पतन को संभालने में नाकाम रहा है. इस नाकाम को एक ही सहारा है कि सत्ता के गलियारे के दूसरे छोर पर भी अफरातफरी मची हुई है: यदि आज चुनाव हो जाएं तो एनडीए बढ़त की कगार पर है, बावजूद इसके उसने पिछले सर्वेक्षण से लेकर अब तक कुछ नहीं कमाया है.

अपने अस्तित्व के संकट में फंसी बीजेपी मौका गंवा रही है और उसने अपनी जमीन उन क्षेत्रीय दलों के हाथों सौंप दी है जिनके क्षत्रपों की परिकल्पना का भारत उनके चुनावी इलाकों से भी छोटा है. एक और आम चुनाव से पहले दरक चुके आदर्शों और आहत प्रतिष्ठाओं के टुकड़ों से पटा भारत का यह सियासी मैदान दुनिया के सर्वाधिक निर्मम लोकतंत्र के धैर्य का बस इम्तिहान ले रहा है. अब भारत को एक अदद रहनुमा का इंतजार है.UPA

सत्ता के शीर्ष पर बैठे चेहरे वे आईना हैं जिनमें नेतृत्वहीनता का अक्स सबसे साफ दिखाई देता है. डॉ. मनमोहन सिंह की कहानी आठ साल पहले सेंट्रल हॉल में आंसुओं से लबालब एक सियासी प्रहसन से शुरू होती है जहां एक हादसा उन्हें प्रधानमंत्री बना गया. इस कहानी का त्रासदी भरा अंत होना तय है. बहरहाल, खांटी सियासत में उनका कम तजुर्बा ही उनकी थाती बन गया. वे पूरब से निकले एक आधुनिक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड थे जो अतिवादी भावनाओं की सियासत में मध्यमार्ग का प्रतीक बनकर उभरे.

उनका पहला कार्यकाल विश्वास बहाली और संकल्प से भरा था जिसमें एक ऐसे नेता का जन्म हुआ जो अपनी मान्यता के लिए कुर्सी तक को दांव पर लगा सकता था. उन्होंने ‘साम्राज्यवाद’ का हल्ला मचाने वाले वामपंथी कॉमरेडों को चुनौती दे डाली, सरकार को जोखिम में डालकर अमेरिका के साथ एटमी करार का अपना वादा पूरा किया. 2004 का जनादेश यदि एनडीए के खिलाफ  था, तो निश्चित तौर पर 2009 का जनादेश मनमोहन की यूपीए सरकार के पक्ष में था. सोनिया गांधी के चुने हुए शख्स को भारत ने हाथोहाथ लिया.

आज भी वे प्रधानमंत्री तो हैं ही, लेकिन जैसा कि किसी ने पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर के लिए कहा था, सत्ता में नहीं हैं. वे एक ऐसी सत्ता का चेहरा हैं जिसने भ्रष्टाचार और खराब राजकाज के लिए ही दुनियाभर में सुर्खियां बटोरीं, और आज भी इस चेहरे को पढ़ पाना मुमकिन नहीं. किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की किसी भी सरकार के शायद वे इकलौते प्रधानमंत्री होंगे जिसने अपनी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कैबिनेट से खुद को अलग कर लिया और ‘‘कुछ न देखने, सुनने और करने’’ की अपनी आरामगाह में शरण ले ली.narendra modi

जब यूपीए के पैर के नीचे की जमीन जानलेवा तरीके से धसक रही थी, वे साउथ ब्लॉक की हवाओं में ऐसे गोते खा रहे थे मानो उन्होंने गुरुत्वाकर्षण पर फतह पा ली हो. सर्वेक्षण में उनकी रेटिंग शायद ही कभी औसत से ऊपर गई होगी, लेकिन इस बार वह भी गर्त में गोते खा रही है, बावजूद इसके कि उन्होंने आर्थिक सुधारों का आखिरी दांव चल दिया है. यूपीए 2 का रिकॉर्ड मनमोहन सिंह को इस पतन के लायक नहीं बनाता, तो सिर्फ इसलिए कि भारतीय राजनीति में बेचारगी के लिए उनसे ज्यादा कोई और याद भी नहीं आता. किसी नेता में जो कुछ नहीं होना चाहिए, उनके भीतर वह सब कुछ है.

आदर्श नेतृत्व के नाम पर तो दूसरे छोर पर भी कोई नहीं दिख रहा. जब सर्वेक्षण किया गया था, तब बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर नितिन गडकरी अपनी बदनामी की मुंडेर पर खड़े अपने साथ पार्टी को भी डुबाने की हरकतें कर रहे थे. वे अपनी कोशिश में लगभग सफल हो गए थे. आरएसएस के इस लाडले प्रचारक ने जब यह मानने से इनकार कर दिया कि उसके कारोबारी हित से पार्टी के राजनैतिक हित को चोट पहुंची है, तो आरएसएस के दबाव में पार्टी को ही मजबूरी में उसके पीछे खड़ा होना पड़ा.

घपलों-घोटालों में गरदन तक डूबी यूपीए का जो भी नैतिक लाभ बीजेपी को मिल सकता था, उसे गडकरी ने अकेले ही लीपपोत कर बराबर कर दिया. संदिग्ध कारोबारी सौदों से जुड़े सिर उठाते आरोपों के बीच उनका अनैतिक तरीके से बने रहना ही भ्रष्ट और बदनाम लोगों के लिए अपना खेल जारी रखने का एक बहाना बन गया, चाहे वे किसी भी पार्टी के रहे हों.UPA

जब उन पर महाराष्ट्र में मंत्री रहने के दौरान एक कंपनी को बेजा फायदा पहुंचाने और उसके बदले अपने पूर्ति समूह के लिए कथित लाभ लेने के आरोप लगे, लगभग उसी समय कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर भी सत्ता से निकटता का बेजा लाभ उठाने के आरोप लगे. लेकिन आम लोगों ने बीजेपी अध्यक्ष पर लगे आरोपों को ज्यादा गंभीरता से लिया, क्योंकि गडकरी के विपरीत वाड्रा ने कभी कोई सार्वजनिक पद नहीं संभाला. यही नहीं, उन्होंने आम लोगों को यह कहने का मौका दे दिया कि कोई भी दूध का धुला नहीं है.

गडकरी अध्याय ने एक राजनैतिक पार्टी के तौर पर बीजेपी की स्वायत्तता की सीमाओं को एक बार फिर सामने ला दिया, जिसके असली आका नागपुर में बैठते हैं और आरएसएस की हुक्मउदूली नहीं की जा सकती. बीजेपी को अब भी इक्कीसवीं सदी के भारत की आकांक्षाओं और चलन के हिसाब से एक आधुनिक दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में उभरना बाकी है और जब तक वह विशुद्ध हिंदू ग्राम्य व्यवस्था की सांस्कृतिक रूमानियत में समाधिस्थ एक संगठन के कोड़ों पर नाचती रहेगी, तब तक ऐसा नहीं कर पाएगी.gandhi family

जनमत सर्वेक्षण में गडकरी के खिलाफ आया वोट दिखाता है कि पार्टी ने जिस तरह पुरातनपंथी आरएसएस के सामने घुटने टेक दिए हैं, भारत को यह बात स्वीकार नहीं है. 23 जनवरी को हालांकि गडकरी की पतंग कट गई और नागपुर को अपने प्रिय भक्त को मुक्त करना ही पड़ा. शायद उसे देर से यह बात समझ में आई कि दागी को हमेशा के लिए नहीं बचाया जा सकता.

अब राजनाथ सिंह बीजेपी के नए अध्यक्ष हैं, लेकिन सवाल उठता है कि बीजेपी का नेता कौन है? यूपीए के खंडित जनादेश और अपने कुछ मुख्यमंत्रियों की कड़ी मेहनत का लाभ बीजेपी को मिला है. वह सर्वेक्षण में यहां तक पहुंची है तो अपने केंद्रीय नेतृत्व की वजह से नहीं, बल्कि बात ठीक उलटी है. उसे इस ठहराव को उभार में बदलने के लिए एक कामकाजी अध्यक्ष से कहीं ज्यादा कारगर शख्सियत की जरूरत है. उसे एक ऐसा नेता चाहिए जो जनाधार में जान फूंक सके और विचारों की ताकत से भारत में जोश भर सके.

इस सर्वेक्षण में एक विकल्प सामने आया है: नरेंद्र मोदी. भारत का सबसे कामयाब मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री पद के लिए देश का प्रिय उम्मीदवार है. उन्हें 36 फीसदी वोट मिले हैं और वे कांग्रेस के अपने प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी से 14 अंक ऊपर हैं. बाकी, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह शामिल हैं, सब एक अंक पर अभिशप्त होकर अप्रासंगिक हो गए हैं. मोदी और राहुल के बीच सीधी लड़ाई में 57 फीसदी लोग मोदी को और 41 फीसदी राहुल को चाहते हैं. दोनों में लोकप्रियता के अलावा कुछ भी समान नहीं है.

मोदी, जिन्होंने देश को पहली बार आरएसएस की शाखा के चश्मे से देखा, एक आधुनिक नेता के सबसे करीबी प्रतिरूप हैं जो वर्तमान भारत के समकालीन दिखते हैं. अब इस तथ्य पर कोई बहस नहीं रह गई है कि गुजरात देश का सबसे बढिय़ा प्रशासित राज्य है जहां की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. एक प्रशासन के तौर पर उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि राजनैतिक इच्छाशक्ति हो तो बदलाव के लिए नारों की जरूरत नहीं पड़ती. उन्होंने साबित किया है कि सत्ता सिर्फ उन्हीं को भ्रष्ट करती है जो राष्ट्रीय हितों पर निजी हितों को तरजीह देते हैं. एक वक्ता की भूमिका में उनके पास ऐसे शब्द हैं जो सीधे सामने वाले के दिलो-दिमाग पर असर करते हैं. वे संदेशवाहक भी हैं और खुद ही संदेश भी. उनकी विश्वसनीयता उनकी निजी ईमानदारी जितनी ठोस है.bhagwa dhabba

इसके बावजूद उनकी पार्टी, जिसके नेताओं का अहं उनके चुनावी क्षेत्रों से भी ज्यादा फैल चुका है, मोदी को लेकर आश्वस्त नहीं है. देश में उनकी लोकप्रियता संगठन के भीतर की लोकप्रियता से बेमेल है. भले ही भारत लगातार उन्हें प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा योग्य उम्मीदवार के तौर पर चुनता रहा है (जैसा हमारे पिछले जनमत सर्वेक्षण भी दिखाते हैं), लेकिन बुढ़ा चुके सामंतों और षड्यंत्रकारी नेताओं के वर्चस्व वाला बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व भविष्य के चेहरे के तौर पर उन्हें प्रस्तुत करने को लेकर काफी डरा हुआ है.

मोदी भारतीय राजनीति के सर्वाधिक आकर्षक परिवर्तनकारी आख्यानों में एक रहे हैं जिन्होंने दिल्ली में पार्टी के पदाधिकारी से अपना सफर शुरू करके 2002 में हुए दंगों के खलनायक की छवि से उबरते हुए अब विकास की राजनीति के सबसे बड़े उपदेशक और उन उपदेशों पर अमल करने वाले नेता की छवि अख्तियार कर ली है. गुजरात के मुख्यमंत्री के चाहने वाले देशभर में हैं.

उनके खिलाफ जिसे खड़ा किया गया है, उसके मुंह में वरदानों का पैदाइशी चम्मच है. राहुल गांधी वह सब कुछ हैं जो मोदी नहीं हैं. दुनिया के सबसे पुराने सियासी खानदानों में एक के नवीनतम उत्तराधिकारी, जिन्हें प्रधानमंत्री का सबसे योग्य उम्मीदवार बनने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा. उनके लिए सियासत विरासत का दूसरा नाम है. हफ्ताभर पहले जयपुर में जब उन्हें आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में नंबर दो के ओहदे पर नियुक्त किया गया था, उस वक्त खानदान की पुण्यात्माएं निश्चित तौर पर ताजपोशी का जश्न मना रही होंगी. जयपुर में कांग्रेसियों का उत्साह तो कुछ ज्यादा ही छलक रहा था, वे इतने लंबे समय से इसी शुभ घड़ी का तो इंतजार कर रहे थे.indira

पार्टी ने हालांकि यह नहीं कहा है कि वे 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, न ही ऐसा कुछ कहा गया है कि वे प्रचार का नेतृत्व करेंगे. लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है? राहुल एक सीढ़ी चढ़ते हैं तो उन्हें देखकर कांग्रेसियों के घुटने सीधे हो जाते हैं चूंकि उनकी सियासी गतिविधियां देश के सबसे ताकतवर सियासी खानदान के हिसाब से ही आकार ले चुकी हैं.

गांधी राजवंश का यह चेहरा हालांकि कुछ अलग है. इसकी शख्सियत को आप संकल्प की जगह संकोच, स्फूर्तता की जगह भ्रम और निकटता की जगह दुराव से पहचान सकते हैं. हिंदुस्तानी सियासत के मानदंडों के हिसाब से राहुल युवा हैं लेकिन उनकी शब्दावली अपने बुजुर्गों के समाजवादी खोखलेपन से उधार की ली हुई है. इसके बावजूद कांग्रेस के इकलौते नेता के रूप में राहुल गांधी की अपरिहार्यता भारत की सबसे पुरानी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की सिकुड़ती चादर को ही दर्शाती है.

कांग्रेस की सर्वाधिक चमकदार प्रतिभा भी उसी ऊंचाई तक बढ़ सकती है जहां तक खानदान को गवारा हो. जब तक शीर्ष पर कोई गांधी बैठा है  बाकी नेताओं को आपस में झगडऩे की जरूरत नहीं पड़ती, भले ही राहुल अपने खानदान के सबसे प्रतिभाशाली प्रतीक न हों. अगर पार्टी में किसी नेता की महत्वाकांक्षाएं हैं तो वह ज्यादा से ज्यादा इस परिवार के लिए मनमोहन सिंह बनने की ख्वाहिश पाल सकता है क्योंकि गांधी परिवार अच्छी तरह जानता है कि निरंकुश सत्ता का चाबुक चलाने के लिए उसे अपने लिए किसी सरकारी ओहदे की जरूरत नहीं होगी.kejriwal

तो जैसा कि जनमत सर्वेक्षण कह रहा है, क्या भारत के पास पतनोन्मुख कांग्रेस में उगते हुए राहुल और ठहरी हुई बीजेपी में चढ़ते मोदी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है? युवा आबादी के मामले में दुनिया के चुनिंदा देशों में एक भारत की बढ़ती आकांक्षाओं के मद्देनजर देखें तो ये दोनों ही एक आदर्श नेता से कोसों दूर हैं, लेकिन बदतर हालात में भारत को जो कुछ भी हासिल हो सकता है उसमें ये सर्वश्रेष्ठ हैं. हां, वे अपनी आरामगाह से बाहर निकल सकें तो उनके पास बेहतर करने के लिए बहुत मौके होंगे.

ऐसा नहीं कि उनके पास अपने रोल मॉडल नहीं हैं. सिर्फ नकल करके मोदी खुद अटल बिहारी वाजपेयी नहीं बन सकते, जो बीजेपी के इकलौते प्रधानमंत्री थे और हमारे सर्वेक्षण के मुताबिक अब तक के सर्वश्रेष्ठ भी हैं. नेताओं के बीच एक कवि रहे वाजपेयी ने मध्यमार्गी और समावेशी राजनीति में सबसे ऊंचे मानदंड स्थापित किए हैं. भारत उनका कर्जदार है. भले ही वाजपेयी ने काफी समय पहले सार्वजनिक जीवन छोड़ दिया हो, लेकिन लोग अब भी उन्हें याद करते हैं.

मोदी को देखकर या तो सराहना निकलती है या अचरज होता है. उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर बांटने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है. ध्रुवीकरण में अलगाव का भी पक्ष होता है, क्योंकि ध्रुव का हमेशा एक दूसरा सिरा भी होता है. गुजरात के मुख्यमंत्री अपनी इन्हीं विशेषताओं की वजह से सर्वमान्य नहीं हो पाए हैं. राज्य में तीसरी जीत के बाद गुजराती की बजाए हिंदी में भाषण ने केंद्र में पहुंने की उनकी महत्वाकांक्षा को उजागर कर दिया.

गुजरात के लोग उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, और उत्तर प्रदेश जैसे गैर-बीजेपी शासित राज्य में भी उन्हें समर्थन हासिल है. मोदी अभी तक इस देश का प्यार नहीं जीत पाए हैं. ऐसा तब तक रहेगा जब तक वे 2002 के दंगों के लिए माफी नहीं मांग लेते. माफी मांगना गलती को स्वीकारना नहीं होता, यह दूसरों की गलती के लिए माफी मांगने का बड़प्पन भी है. देश को उस दिन का इंतजार है.

राहुल के लिए सबसे अच्छी शिक्षा होगी कि वे राजनीति करते हुए अपने परदादा और दादी की जीवनी पढ़ें. नेहरू के लिए राजनीति का मतलब पार्टी नहीं, राष्ट्र निर्माण था. 1957 के आम चुनावों में उन्होंने जबरदस्त भाषण दिया था, ‘‘...कुछ दिनों में चुनाव खत्म हो जाएंगे. मेरी दिलचस्पी कुछ दूसरे बड़े मुद्दों में है... हमें एक-दूसरे को समझना होगा क्योंकि हमारी जिम्मेदारियां महती हैं... लोगों को राष्ट्र निर्माण के काम में हाथ बंटाना होगा.’’ जिस मंच से इंदिरा गांधी ने भारत माता की स्क्रिप्ट पढ़ी थी, वह दरअसल जनता के मानस का मंच था. देश के साथ उन्होंने ऐसा भावनात्मक रिश्ता कायम किया जो आज तक कायम है.

मोदी और राहुल की लोकप्रियता उनकी कमियों को नहीं छुपाती, न ही अपने दौर की चेतना को पकड़ पाने में सक्षम एक नेता की तलाश को कम करती है. इक्कीसवीं सदी के किसी नेता को खांटी सियासत और उसकी पारंपरिक भाषा के दायरों से आगे जाकर अपने इर्द-गिर्द सड़कों, कैंपसों, फेसबुक, ट्वीट, बाजारों और प्रयोगशालाओं में हो रहे ऐतिहासिक बदलावों का सामना करना होगा. नए नेतृत्व की चुनौतियों पर लिखे अपने मशहूर आलेख में टॉड एस. पर्डुम लिंकन को उद्धृत करते हैं, ‘‘खामोश अतीत के सिद्धांत आज के तूफान को समझने के लिए नाकाफी हैं.’’ भारत भी एक ऐसे रहनुमा के इंतजार में है जो तूफान का रुख मोड़कर यहां गणतंत्र को फिर से प्रतिष्ठित कर सके.

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