उसकी जिंदगी का सबसे रोमांचक पल 16 दिसंबर की रात को था जब उसने 23 साल की एक पूरी तरह तार-तार कर दी गई लड़की के गर्भाशय में अपनी भिंची हुई दाहिनी मुट्ठी घुसा दी थी. लड़की की रुह कंपा देने वाली चीख, दर्द में छटपटाती देह और उससे लगातार निकलता खून उसे इतना उत्तेजित कर रहा था कि और किसी चीज में उसे इतना मजा नहीं आया था.
आप बेशक उसे हैवान कह सकते हैं, लेकिन वह 17 साल के राहुल (बदला हुआ नाम) के वेश में खून के प्यासे छह खूंखार मनोरोगियों राम सिंह, उसके भाई मुकेश, पवन गुप्ता, विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह के साथ शामिल था. उनकी खौफनाक बर्बरता ने देशभर के भीतर उबल रहे गुस्से को सड़कों पर ला दिया.
चेहरे पर किसी शिकन के बगैर राहुल ने जब उस रात की हैवानियत को शब्दों में बयान किया, तो दिल्ली पुलिस के घाघ अफसरों के भी होश उड़ गए. उन्होंने हैवानों के इस झुंड में यौन मनोरोगी 33 वर्षीय बस चालक राम सिंह के बाद राहुल को सबसे खतरनाक शख्स माना है.
राहुल की जिंदगी के पिछले पांच साल बस खलासी या खाने और चाय-पान की दुकानों में काम करते सड़क पर ही बीते हैं. वह बारह साल की उम्र में ही बदायूं के भवानीपुर स्थित अपने घर से भाग आया था. अपने पीछे वह मानसिक रूप से अस्वस्थ अपने पिता, मां और छह भाई-बहनों को छोड़ आया था, लेकिन उसे इसका कोई अफसोस नहीं है. उसे अपने सबसे छोटे भाई का नाम तक याद नहीं.
वह पूर्वी दिल्ली के कड़कडड़ूमा में बस खलासी का काम करता था. वहीं उसकी मुलाकात राम सिंह से हुई, जिसे उसने अपनी बचाई 8,000 रु. की रकम उधार दे दी. जिस रात अपराध हुआ, वह राम सिंह के घर पैसे वापस लेने गया था. वहीं उसकी मुलाकात अन्य पांच आरोपियों से हुई, जिनमें से दो से वह पहली बार मिला था.
दिल्ली के आर.के. पुरम स्थित रविदास कैंप में बाकी चार आरोपी रहते थे. यह एक झुग्गी बस्ती है जिसकी संकरी गलियों के दोनों ओर उफनता नाला है और जिसके चारों ओर सिर्फ दुर्गंध है. यह दक्षिणी दिल्ली के अभिजात रिहाइशी इलाकों से सटा हुआ इलाका है. राम सिंह बदनाम शख्स है. वह तीन बच्चों की मां को भगा ले गया था, हालांकि कुछ दिनों बाद वह लौट आया और कहते हैं कि उस औरत की मौत बीमारी से हो गई थी. उसका सबसे बड़ा बेटा नीरज कुमार उसे गाली देते हुए कहता है, ‘‘कानून के हाथ वह काफी देर से आया है. जितनी जल्दी हो, उसे मार दिया जाना चाहिए.” एक बुजुर्ग पड़ोसी कहते हैं कि राम सिंह का छोटा भाई सुरेश अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर बरसों पहले यहां से निकल गया था क्योंकि उसे दो बदनाम भाइयों के बीच अपनी पत्नी को छोडऩे में दिक्कत महसूस होती थी.
इस दीवाली राम सिंह के घर कुछ झगड़ा हुआ था, जिसके बाद उसके माता-पिता अपने गांव राजस्थान के करोली लौट गए थे. उनके जाने के तुरंत बाद एक बस खलासी 28 साल का अक्षय कुमार सिंह दोनों भाइयों के साथ रहने आ गया.
बाकी दो आरोपी इस झुग्गी में महज 30 मीटर की दूरी पर रहते थे. आरोपी पवन के पिता हीरालाल कहते हैं, “उसकी तीन बहनें हैं, वह ऐसा नहीं कर सकता.”
आरोपी विनय शर्मा सीरीफोर्ट जिम में हेल्पर था जहां आए दिन अमीर ग्राहकों से उसका झगड़ा होता रहता था, लेकिन उसके माता-पिता को उसकी आपराधिक प्रवृत्ति का अंदाजा नहीं था. उसके पिता हरि राम शर्मा दिल्ली हवाई अड्डे पर निचले दर्जे के कर्मचारी हैं. वे बताते हैं कि सिर्फ एक बात उसमें अलग दिखी थी कि 17 दिसंबर को वह बड़े चाव से सामूहिक बलात्कार की खबर टीवी पर देख रहा था. शर्मा बताते हैं, ‘लेकिन खबर तो बड़ी थी, इसलिए सामान्य बात थी. हालांकि वह शायद ही कभी टीवी देखता था.”
आरोपी अक्षय के बारे में ज्यादा मालूम नहीं है. उसने झारखंड के पलामू जिले में अपनी बीवी और बेटी को छोड़ दिया था और बिहार के औरंगाबाद जिले के पैतृक गांव लहंग करमा से काफी दूर अनजान-सी जिंदगी बिता रहा था.
हमले के दौरान बताते हैं कि राहुल ने ही लोहे की रॉड से लड़की को न सिर्फ पीटने बल्कि उसके भीतर उसे डालने की तरकीब सुझाई थी. मामले की जांच कर रहे प्रमुख अधिकारी कहते हैं, “उसके शरीर के काफी भीतर डालने के बाद इन्होंने काफी तेजी से उसे बाहर खींचा था.” इसी के चलते लड़की की आंतें शरीर से बाहर लटक गई थीं. वे बताते हैं, “एक समय ऐसा आया जब लड़की जितना ज्यादा चीखती थी, खासकर राहुल और राम सिंह को उतना ही मजा आता जाता था.”
जो पुलिसवाले आम तौर पर खून देखने के आदी होते हैं, वे भी इस बलात्कार की नृशंसता को बताते हुए सहमे से जान पड़ते हैं. ऐसा लगता है कि इस देश की आत्मा को चाक कर देने वाली शहरी भारत के अंधेरे कोनों की बर्बर दास्तानों का शायद यह अंत नहीं है.

