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देश को दहलाने वाली दहशत: हौसले और हिम्मत से भरे मासूम चेहरे

नारी देह के शिकार पर निकले दरिंदों की ज्यादती और उनके दिए गहरे जख्मों के बावजूद इन्होंने जिंदगी, इंसाफ और उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. साहस और चुनौती की छह जिंदा दास्तान, जिन्हें हम देशभर से लेकर आए हैं. ये कहानियां जीने का हौसला देती हैं.

अपडेटेड 21 जनवरी , 2013

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा उसका शरीर कभी-कभार  ही हरकत में आता है. मॉर्फीन के इंजेक्शन से तारी होने वाली बेहोशी और होश के बीच मानो लुकाछिपी होती. उसे शायद ही कभी नींद आती और आती भी तो हमेशा भयावह छवियों के मंडराते साए की वजह से टूट जाती. हर बार उसे असह्य पीड़ा की याद हो आती, और उसका सूजा हुआ जख्मी चेहरा विकृत हो जाता था. उसे बस इतना याद था कि वह नीचे पड़ी हुई है और उस पर बार-बार हमला हो रहा है. घबरा कर वह अपनी आंखें खोलती, तो नजर मुस्कराती हुई मां के चेहरे पर पड़ती. फिर उसे राहत मिलती, और शायद अच्छे दिनों की याद में वह दोबारा नीम बेहोशी में डूब जाती थी.

हालिया दिनों में हुआ यह सबसे नृशंस बलात्कार था उस 23 साल की लड़की के साथ, जो सफदरजंग अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड में सिर्फ एक और संख्या बनकर रह जाएगी, हालांकि उसके दर्द ने देशभर में ऐसा गुस्सा और दहशत पैदा की है जिसे किसी ने पहले नहीं देखा था. उसे खास इलाज के लिए सिंगापुर भेज दिया गया है, हालांकि इस बार असामान्य प्रतिक्रिया हुई है. लोगों को एहसास हो चुका है कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है—वह चाहे किसी की पत्नी हो, बेटी, बहन या दोस्त.

बेहद नाजुक स्थिति में अस्पताल में पड़ी 23 साल की इस लड़की की जिंदगी और मौत के बीच जद्दोजहद बलात्कार पीड़ित सभी महिलाओं के साहस का प्रतीक बन चुकी है. ऐसा नहीं कि बाकी पीड़िताओं से वह कुछ अलग है. तीन बच्चों में सबसे बड़ी वह लड़की उत्तर प्रदेश के बलिया से दिल्ली अपने मां-बाप के साथ आई थी.gangrape

उसके मां-बाप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अच्छे अवसर दिलवाने के लिए यहां लाए थे. उसके पिता को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक निजी फर्म में लोडर की नौकरी मिल गई. मां-बाप ने बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए त्याग से कम कुछ भी नहीं सोचा. जब उनकी बेटी ने फिजियोथेरेपिस्ट का प्रशिक्षण लेने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने इसके लिए बड़ा कर्ज भी ले लिया. 

उसके दोस्त कहते हैं कि ‘’वह अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह ही है.” वह दिल्ली के एक निजी अस्पताल में इनटर्न के तौर पर काम कर रही थी. उसने कई जगह नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया था. उसे उम्मीद थी कि कहीं-न-कहीं नौकरी मिल जाएगी. वह कभी कोई दिखावा नहीं करती थी. उसके भीतर ललक थी कि वह भी अपने मां-बाप को दो जून की रोटी से आगे की दुनिया में ले जा सके. उस दिन 16 दिसंबर को जो फिल्म देखकर वह अपने मित्र के साथ लौट रही थी, वह भी पहली बार का विशेष तोहफा था.

कोई उसे दामिनी कह रहा है, कोई निर्भया और कोई अमानत. उसके अदम्य साहस को किसी एक शब्द में पिरोना नामुमकिन है. सफदरजंग अस्पताल के गेट नंबर 7 के बाहर बैठे सैकड़ों लोगों ने उसकी सलामती के लिए दुआ की, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि छह बलात्कारियों को वाजिब सजा मिले, बल्कि उस बदलाव का साक्षी बनने के लिए जो इस घटना से प्रेरित हो रहा थाः कड़े नए कानून, ज्यादा संवेदनशील पुलिस प्रशासन और एक ऐसा समाज जो औरतों की कद्र करता हो. इस बार शायद हारे कानून निर्माताओं को अपना किया वादा याद रह जाएगा क्योंकि रायसीना हिल पर जिन नौजवानों ने एक साथ चढ़ाई की थी, वे इसे नहीं भूलने वाले. इस लड़ाई का श्रेय आखिर उसी को तो जाता है.

‘‘बलात्कारियों का सार्वजनिक रूप से बधियाकरण हो”
सुनीता कृष्णन, 41 वर्ष
सामाजिक कार्यकर्ता, हैदराबाद

वह दुःस्वप्न बहुत भयावह है. अचानक एक साए की तरह सामने आ जाता है. किसी हिलती हुई टहनी या फिर दरवाजों के खुलने की चरमराती आहट से वे घबरा उठती हैं. भीड़ में लोगों की गंध से उसे दिक्कत होती है. वे कहती हैं, ‘लगता है, मैं फिर उसी नरक में आ गई.’ 25 साल हो गए जब गांव के आठ गुंडों ने सुनीता कृष्णन से बलात्कार किया था. वे आज भी सोचती है कि क्या सब कुछ पूरी तरह सामान्य हो पाएगा.

उस वक्त कृष्णन की उम्र सिर्फ 16 साल थी जब उन पर हमला हुआ. आंध्र प्रदेश के अपने गांव में वह स्कूल जाती थी और वहीं गरीब बच्चों की मदद के लिए शुरू किए गए एक अभियान का हिस्सा भी थी. जिन्होंने उस पर हमला किया, वे उसे सबक सिखाना चाहते थे क्योंकि वह ‘पुरुषों की दुनिया’ में आती-जाती थी. उस घटना से कोई सार्वजनिक आक्रोश नहीं जन्मा. घटना की पड़ताल करने वाले यह जानने में दिलचस्पी रखते थे कि कहीं खुद उसकी ही तो पहल नहीं थी. काउंसलरों ने पूछा, ‘‘तुम रात में बाहर गई थीं?” उन्होंने उनके दुखी मां-बाप को ही दोषी ठहराया और किसी तरह यह साबित कर डाला कि ‘वह खुद अपना बलात्कार चाहती थी.’ वे इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहतीं.

नौ साल सदमे में गुजारने के बाद कृष्णन को एक रास्ता नजर आया. वे कहती हैं,  ‘‘मैंने अपनी कहानी से प्रेरणा ली और अपने गुस्से को दूसरों की लड़ाई लडऩे में लगा दिया.” 16 साल पहले उन्होंने हैदराबाद में प्रज्ज्वला नाम का एक स्वैच्छिक समूह बनाया था जो यौनकर्मियों और उनके बच्चों के पुनर्वास का काम करता है. अब तक इस संगठन ने 4,000 से ज्यादा युवतियों को छुड़ाया है और उनकी मदद की है.

सिर्फ 4 फुट 8 इंच की चश्माधारी इस एक्टिविस्ट का सामाजिक कद आज कहीं ज्यादा ऊंचा है. उन्होंने सदमे से उबरने के लिए खुद को बार-बार भरोसा दिलाया कि गलती उनकी नहीं थी. वे कहती हैं, ‘‘इस बात का खुद को भरोसा दिलाने से ही मैं उबर सकी.” इन सबके बावजूद अब भी उन्हें साए से, आवाज से, गंध से डर लगता है. वे कहती हैं,  ‘‘कुछेक दिन तो बहुत डरावने होते हैं.”

कृष्णन इस बात को मानने को तैयार नहीं कि दिल्ली में जो आवाज उठी है, वह लोगों की बदली हुई मानसिकता का संकेत है. उनके मुताबिक दिल्ली में इतना हल्ला इसलिए हो रहा है क्योंकि वह राजधानी है और बलात्कार सार्वजनिक स्थल पर हुआ है. वे कहती हैं, ‘‘यह मिथक टूट चुका है कि सिर्फ गरीब लड़कियों के साथ ज्यादती होती है. इस घटना ने दिखा दिया है कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है.”

क्या बलात्कार कानूनों को बदल कर उसमें फांसी की सजा शामिल की जानी चाहिए? उन्हें ऐसा नहीं लगता क्योंकि उनके मुताबिक फिर वकील कानूनी कमियों का लाभ उठाकर मामलों को हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक खींच ले जाएंगे और मुकदमा लंबा चलता रहेगा. वे कहती हैं, ‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरा टैक्स बलात्कारियों का पेट भरने में जाया हो.” जितना घिनौना अपराध है, वे उतने ही बर्बर और सार्वजनिक न्याय की बात करती हैं, ‘‘सबके सामने इन्हें मृत्युदंड हो या बधिया कर दिया जाए. हमारी सरकारें माओवादियों और आतंकवादियों का एनकाउंटर करवा सकती हैं तो इनका क्यों नहीं? हमें आप दिखाइए कि भारत को महिलाओं के खिलाफ  हिंसा बिल्कुल बरदाश्त नहीं है.”

‘‘काश! उस वक्त मैं जूडो जानती होती”
जाहिरा, 20 वर्ष
कूड़ा बीनने वाले की बेटी, लखनऊ

उन्होंने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया. फिर उन्होंने उसे यातना दी, मारा-पीटा और उसके नाजुक जख्मी शरीर पर सिगरेट से दागा. उसकी चीख पर वे पत्थर बने रहे. तब उसकी उम्र महज 13 साल थी, और उसे लखनऊ की एक सुनसान गली के कोने में नंगी और लगभग बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया. उसके शरीर से खून बह रहा था.

आज सात साल बाद जाहिरा की देह पर अब भी साफ  दिखते सिगरेट के दाग उस बर्बर भयावहता का सुराग देते हैं. यह बात 2 मई, 2005 की है जब पांच गुंडों ने सबके सामने हुसैनगंज से कूड़ा बीनने वाले की बेटी को उठा लिया था. इनमें समाजवादी पार्टी के एक नेता का भतीजा भी शामिल था.

उसके शरीर के घाव तो भर गए हैं, लेकिन मन पर दर्द के निशान अब भी मौजूद हैं. मामला बलात्कार और उत्पीडऩ पर खत्म नहीं हो गया. जाहिरा और उसका परिवार पुलिसवालों, वकीलों और अपराधियों से रोज मिलने वाली जान से मारने की धमकी के साए में लगातार शॄमदा होता रहा. उसके गरीब पिता ने अपराधियों की दी नकदी लेने से इनकार कर दिया और उसे अब अपनी जान का डर सताता है. वह बताती है, ‘‘उन्होंने मामले को दबाने के लिए क्या नहीं किया, यहां तक कि मेरी मेडिकल रिपोर्ट में छेड़छाड़ करने के लिए डॉक्टर को भी रिश्वत दी.” फिलहाल एक अज्ञात आश्रय की छत के नीचे बैठी जाहिरा दोबारा साहस बटोर रही है. दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के बाद हुए राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों से उसके थके हुए चेहरे पर बरसों में मुस्कान लौटी है. लेकिन जिंदगी से मिला सबक उसे निराश कर देता है. वह कहती है, ‘‘उसे (दिल्ली की पीड़ित) जल्द ही भुला दिया जाएगा. गरीब मरता है और ताकतवर बच निकलता है.”

जाहिरा एक महिला प्रशिक्षक से मार्शल आर्ट सीखती है और अपने गुस्से को कूची और रंगों में चित्रकारी कर के जाहिर करती है. वह कहती है, चित्रकारी से मुझे आराम मिलता है. मैं सोचती हूं कि जब वे आए थे तो काश मुझे जूडो आता!”

‘‘मेरी जिंदगी जीते जी नरक बन चुकी है”
मीना, 12 वर्ष
किसान की बेटी मंदसौर, मध्य प्रदेश

तीन साल हो गए, मीना अपने पिता की टूटी-फूटी झोंपड़ी से बाहर नहीं निकली है. अपेक्षाकृत कम घनी आबादी वाले सोंदनी में कोई भी उससे बात करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता. पड़ोसी उनके छोटे-से झोंपड़े के सामने से तेजी से गुजर जाते हैं. जिस रात चार स्थानीय दबंगों ने झोंपड़ी में घुसकर मीना के साथ बलात्कार किया था, उसके बाद से ही पड़ोसियों ने उसके परिवार को बिरादरी से निकाल दिया है.

सिर्फ सात बीघा की छोटी जोत वाले उसके बुढ़ाते किसान पिता को गुंडों ने इतना मारा कि वे बेहोश हो गए और इस तरह अपनी आंखों के सामने अपनी नई ब्याही बेटी पर हो रहे जुल्म को देखने से बच गए. मीना के पति ने उसे वापस रखने से मना कर दिया और उसके पिता को कोई भी अपने यहां काम पर रखने को तैयार नहीं कि वे अपनी मुट्ठीभर कमाई में इजाफा कर पाएं.

भारत के गांव-कस्बों में ऐसी कहानियां भरी पड़ी हैं. सामूहिक बलात्कार के बाद मंदसौर के स्थानीय अस्पताल में डॉक्टरों ने मीना का इलाज करने से इनकार कर दिया. जब मीना और उसके घायल पिता शिकायत दर्ज करवाने गए, तो अपराधियों से रिश्वत खा चुके पुलिसवालों ने उन्हें दुत्कार कर थाने से बाहर भगा दिया. एक पल ऐसा आया जब लगा कि शायद मीना को राहत मिल जाए. उस वक्त कांग्रेस की राज्य सचिव दीप्ति सिंह की जानकारी में यह मामला आया था. दीप्ति सिंह भोपाल में महिलाओं के कल्याण के लिए प्रियदर्शिनी नाम की संस्था चलाती हैं. उन्हीं के दखल से चार में से तीन दोषियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया.

मीना को बड़ी मुश्किल से कुछ काम मिल सका है. सोंदनी में वह आजकल कपड़े सिलने का काम कर रही है. बहुत तो नहीं, लेकिन जो कुछ भी इससे मिलता है, वह उसके पिता की मामूली कमाई में सहारे का काम ही करता है. इस बीच जान की धमकियां अब भी मिलती रहती हैं.

‘‘मैंने उसे रोकने की बड़ी कोशिश की, लेकिन नाकाम रही.”
अनिता, 18 वर्ष
कारीगर और आया की बेटी, बंगलुरू

दो साल पहले की बात है जब अनिता 10वीं की परीक्षा की तैयारी कर रही थी. उस दिन घर पर कोई नहीं था. बंगलुरू के बाहरी इलाके में स्थित उसके घर में अचानक 34 वर्षीय स्थानीय सियासी गुंडा दशरथ जबरन घुस आया. अनिता कहती है, ‘‘उसने मेरे कपड़े फाड़ डाले. मैंने कमरे में मौजूद हर चीज—गमले, झाड़ू, बरतन, गद्दे से उसे मारा. सब तोड़ दिया. मैं उसे रोकना चाहती थी, लेकिन वह काफी मजबूत था. मैंने बहुत कोशिश की, चिल्लाई, रोई, कि कोई तो मदद को आए. लेकिन मैं उसे रोक नहीं सकी.”

उसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं दी क्योंकि सारे पड़ोसियों के यहां सिलाई मशीनें चल रही थीं. अनिता ने उस पल खुद अपने दर्द, भय और शर्म से जंग लड़ी. उसने परीक्षा दी, फिर कॉलेज भी गई, लेकिन दशरथ लगातार उसका पीछा करता रहा. उसे गर्भ ठहर गया था. दशरथ ने उसे एक गोली खाने को दी. उस दवा को खाने से उसकी फैलोपियन ट्यूब फट गई.

उसके माता-पिता ने दशरथ से बात की और उसने अनिता से शादी करने की हामी भर दी. इसके बाद दशरथ ने उसका कॉलेज छुड़ा दिया और एक डे केयर सेंटर में जबरन काम पर लगा दिया. दशरथ उसे पीटता और उसकी सारी कमाई ले लेता. अगस्त में जब वह 18 साल की हुई, तो उसने दशरथ से शादी की. वह कहती है, ‘‘इसके अलावा मैं कर भी क्या सकती थी? उसने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था. कौन मुझे स्वीकार करता या उसके खिलाफ  मेरे साथ खड़ा होता?”

दशरथ के घर में उसे सिर्फ भूख, पिटाई, यातना, कैद और बलात्कार मिला. वह फिर गर्भवती हुई, लेकिन दशरथ और उसकी पहली पत्नी ने उसके पेट पर लात मारकर उसे आधी रात में घर से बाहर निकाल दिया. सड़क पर ही उसका गर्भपात हो गया. वह कहती है, ‘‘मैंने दशरथ के खिलाफ अपहरण, बलात्कार और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया है. मैं चाहती कि उसे मेरी जिंदगी तबाह करने और मेरे सपने तोडऩे की सजा मिले.” पुलिस ने एफआइआर लिख ली है. उधर दशरथ खुला घूम रहा है जबकि अनिता इंसाफ की तलाश में एक अज्ञात आश्रय में छुपी बैठी है.

‘‘वह कभी नहीं हंसती, और शायद ही कभी कुछ बोलती है.”
गुडिय़ा, 11 वर्ष
फैक्टरी मजदूर की विधवा की बेटी,   सीकर, राजस्थान

पिछले साल 20 अगस्त को ईद मनाने के बाद सहेलियों के साथ वह घर लौट रही थी कि उसे अगवा कर लिया गया. 11 साल की बच्ची ने उनके चंगुल से छूटने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी ताकत के आगे उसकी एक न चली. वे उसे किसी लुगदी की गुडिय़ा की तरह घसीटते हुए अपनी जीप में लेकर गायब हो गए. आखिरी बार अगर किसी के कान में उसकी आवाज पड़ी थी, तो वह बचाने के लिए उसकी चीख-पुकार थी. एक दिन बाद उसे सीकर के औद्योगिक इलाके में एक वन क्षेत्र में पड़ा पाया गया. चार महीने बाद आज गुडिय़ा के जख्म भरने को हैं.

जयपुर के जे.के. लोन अस्पताल के बच्चा वार्ड में वह आम तौर पर बिना किसी हरकत के बैठी रहती है और कुछ नहीं बोलती. वह कुछ बोलने की कोशिश में बस बुदबुदाती है जो सिर्फ उसकी दो बड़ी बहनों को समझ में आता है जो वहां उसके साथ हैं. एक बहन कहती है, “हम पांच बहनें हैं. यह सबसे छोटी है. यह हमेशा हंसती थी, अब तो इसके चेहरे पर मुस्कराहट भी नहीं आती.”

इस छोटी-सी बच्ची को अब तक नौ बार रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी से गुजरना पड़ा है, जिसमें एक सर्जरी रेक्टम की हो चुकी है. उसके डॉक्टर एल.डी. अग्रवाल के मुताबिक उसकी चोट “90 फीसदी ठीक हो चुकी है,” लेकिन वे आश्वस्त नहीं हैं कि वह अपराधियों की पहचान परेड का तनाव झेल पाएगी या नहीं. इस केस को आगे बढ़ाने के लिए पुलिस पहचान परेड करवाना चाहती है. वे कहते हैं, ‘‘वह अब भी सदमे में है.’’

दोनों दोषियों—25 वर्षीय सुरेश कुमार जाट और 26 वर्षीय सुरेश वर्मा को घटना के चार दिन बाद ही 24 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन गुडिय़ा की बहनों का कहना है कि जब वे अगवा किए जाने की रिपोर्ट लिखवाने गईं तो उन्हें संदेह की नजर से देखा गया और लापरवाही बरती गई. उन पर झूठ बोलने का आरोप लगा दिया गया. जब कुछ स्थानीय लोगों ने थाने को घेर लिया, तब जाकर कई घंटे बाद पुलिस ने शिकायत दर्ज की.

गुडिय़ा और उसके परिवार को मुआवजा दिलवाने में राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष लाड कुमारी जैन की अहम भूमिका रही, लेकिन राज्य सरकार से मिले 5 लाख रु. का अधिकांश हिस्सा उसके इलाज पर खर्च हो गया है. जैन को इस बात की चिंता है कि राज्य में बलात्कार और हिंसा की शिकार महिलाओं की काउंसलिंग का कोई प्रावधान नहीं है.

डॉ.अग्रवाल कहते हैं कि यदि गुडिय़ा इस सदमे से उबर पाई, तो यह चमत्कार ही होगा. बच्ची की नाक में सोने की एक लौंग थी जो बलात्कार के दिन कहीं खो गई थी. डॉ. अग्रवाल ने उसे नई लौंग दी है. एक और डॉक्टर उसके लिए नई सलवार समीज लेकर आए हैं. उन्हें अब सिर्फ बच्ची के चेहरे पर मुस्कान का इंतजार है.

(कुछ पीड़िताओं के नाम उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए बदल दिए गए हैं)

—साथ में लक्ष्मी कुमारस्वामी, सौम्या अजी और रोहित परिहार

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