अपनी दुर्लभ मुस्कान के साथ पी. चिदंबरम (67) वर्ष 2012 का अंत कर रहे हैं. यह वह साल है जिसमें उन्हें न सिर्फ नॉर्थ ब्लॉक का अपना पसंदीदा मंत्रालय मिला है, बल्कि वे एक और ऊंचे पद के और करीब पहुंच गए हैं. इस साल के अंत तक अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दोनों तरह का मीडिया उनके यूपीए3 के लिए प्रधानमंत्री का संभावित उम्मीदवार बनने की अटकलें लगाने लगा.
2जी घोटाले के मामले में अगस्त में सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद उनकी छवि सुधरी है. इस साल 31 जुलाई को वित्त मंत्रालय में उनके कदम रखने के बाद से ही भारत और चिदंबरम, दोनों की तरक्की में तेजी आई है. उन्हें नंबर दो का ओहदा भले हासिल न हो, लेकिन अपना एजेंडा चलाने के लिए वास्तव में चिदंबरम को किसी ओहदे की जरूरत नहीं है. उनका चश्मा पुराने स्टाइल का हो सकता है, लेकिन उनकी दृष्टि नए जमाने की है.
उन्होंने ही वित्त मंत्रालय में कदम रखने के बाद अर्थव्यवस्था की जोखिमपूर्ण स्थिति की चेतावनी दी थी. बिना समय गंवाए उन्होंने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह, दोनों को इस बात के लिए मना लिया कि तत्काल सुधार करने की जरूरत है. उन्हें इन दोनों का भरोसा हासिल है, इस बात से उन्हें मदद मिली.
सरकार में ‘‘डीटेल्स मैन्य के रूप में प्रसिद्ध चिदंबरम 22 मंत्री समूहों और अधिकारप्राप्त मंत्री समूहों में से सबसे ज्यादा 10 के मुखिया हैं. मीडिया पर गठित मंत्री समूह के प्रमुख के नाते वे सीधे नकदी ट्रांसफर योजना की मार्केटिंग से लेकर खुदरा में एफडीआइ पर बचाव करने तक यूपीए के संकटमोचन जैसे रहे. दिसंबर में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उनके दिमाग की उपज राष्ट्रीय निवेश बोर्ड को मंजूरी दे दी, हालांकि उसका नाम बदलकर निवेश पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीआइ) रखा गया. यह लालफीताशाही को खत्म करने के लिहाज से लाया गया, निवेश में एक ही जगह निर्णय करने का मंच है. अपने आलोचकों पर यह उनकी एक और जीत है.

