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नितिन गडकरी: अपनी बारी गंवा चुका अवसरवादी

फरवरी से ही नितिन गडकरी की किस्मत गोता लगाने लगी थी. तब उत्तर प्रदेश में एक चुनावी सभा के दौरान ओवरलोड हो जाने के कारण वह मंच ही ढह गया, जिस पर गडकरी विराजमान थे.

नितिन गडकरी
नितिन गडकरी
अपडेटेड 21 जनवरी , 2013

फरवरी से ही नितिन गडकरी की किस्मत गोता लगाने लगी थी. तब उत्तर प्रदेश में एक चुनावी सभा के दौरान ओवरलोड हो जाने के कारण वह मंच ही ढह गया, जिस पर गडकरी विराजमान थे. उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन से लेकर अपनी पूर्ति समूह की कंपनियों में अनियमितता के आरोप तक, 55 वर्षीय गडकरी इस साल को भूल ही जाना चाहेंगे. अब दूसरी बार उनके बीजेपी अध्यक्ष बनने की संभावना भी उलझी हुई दिख रही है. पार्टी ने इसे मुमकिन बनाने के लिए संविधान में बदलाव किया था.

लालकृष्ण आडवाणी, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह जैसे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता संकेत दे चुके हैं कि गडकरी ने अब अध्यक्ष बने रहने के लिए नैतिक आधार खो दिया है. गडकरी के पूरी तरह से लगे रहने के बावजूद उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी खेत रही.

‘‘चौंकाने वाले नतीजे” देने के वादे के साथ किए गए उनके सभी प्रयोग नाकाम रहे. आरएसएस के विवादास्पद पदाधिकारी संजय जोशी को लाने और घोटाले के दागी बीएसपी नेता बाबूसिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने का उलटा नतीजा हुआ. मार्च में झारखंड से राज्यसभा की सीट के लिए हुए चुनाव में गडकरी ने जिस तरह से निर्दलीय विधायक अंशुमान मिश्र का समर्थन करने का फैसला किया, उसकी हमेशा उत्साह से उनका साथ देने वाले आरएसएस को भी आलोचना करनी पड़ी. इसी तरह बीजेपी की सरकार वाले एकमात्र दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में विवाद से गडकरी जिस तरह निपटे और बी.एस. येदियुरप्पा के प्रति नरमी दिखाई, उसकी आडवाणी ने भी खुलकर आलोचना की.

पार्टी नेताओं को लगता है कि गडकरी के इन कदमों से बीजेपी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को नुकसान हो रहा है. उनका सोचना ठीक ही है. बढ़ती कीमतों और भ्रष्टाचार पर यूपीए के खिलाफ लोगों में बढ़ते गुस्से का फायदा उठाने में बीजेपी विफल ही रही है. पहले कभी भी किसी मुद्दे पर बीजेपी इस तरह बंटी नहीं दिखी. अब आरएसएस गडकरी के माध्यम से पार्टी के छोटे से छोटे मामलों में भी दखलंदाजी कर रहा है. दूसरी तरफ, गडकरी अपने आलोचकों को गलत साबित करने में नाकाम रहे हैं.

भोपाल में 4 नवंबर को अपने एक भाषण में उन्होंने बीजेपी के प्रतीक पुरुष स्वामी विवेकानंद की तुलना अंडरवल्र्ड के डॉन दाऊद इब्राहिम से कर डाली, बोले कि संभवतः दोनों का बौद्धिक स्तर एक ही था. उनके शब्द थे, ‘‘विवेकानंद ने इसका इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण, भाईचारे और आध्यात्मिकता के लिए किया, जबकि दाऊद ने इसका इस्तेमाल अपराध की दुनिया में आगे बढऩे के लिए किया.” बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ‘‘व्यावहारिकता और अवसरवाद के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है और गडकरी ने इस रेखा को पार कर लिया है.”

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