एक भव्य दरवाजा लुटियन की दिल्ली के दिल में खुलता है, जिससे शहादत और आजादी की यादें ताजा होती हैं. यह वही जगह है जहां गणतंत्र अपनी फौजी ताकत की नुमाइश कुछ ऐसे करता है कि पूरी दुनिया को इसकी भव्यता नजर आ सके. यही वह जगह है जहां सर्दियों का डूबता सूरज घूमने के शौकीनों के लिए बेहतरीन बैकड्रॉप मुहैया करता है. यही वह जगह है, जहां से इंसाफ की मांग लेकर सड़कों पर उतरा आम आदमी सत्ता को चुनौती देते हुए दया की नहीं, कार्रवाई की मांग कर रहा है. यही वह मार्के की जगह है, जहां से आप देख सकते हैं कि देश की सियासी और संवैधानिक सत्ता किस तरह उदासीनता दिखा रही है.
यह इंडिया गेट है, जहां से इन सर्दियों में दिसंबर की धुंध को चीरती एक चीख उठी थी, जिसमें बर्फ-सी जम चुकी सत्ता की अंतरात्मा के खिलाफ एक समूची पीढ़ी का गुस्सा पैबस्त था. बैरिकेडों को तोड़ देने वाली, असहमति में तनी हजारों लहराती मुट्ठियों ने यहीं उस सत्ता में अपनी टूट चुकी आस्था का ऐलान किया, जिसके पास अपने बचाव में एक के बाद एक अलग-अलग सिर्फ पैंतरे मौजूद थे.
अपने ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले इकलौते रासायनिक हथियार आंसू गैस के गोलों को भी इस भीड़ ने धता बता दिया; उन्हें लाठियों का सामना करना पड़ा; और उन्होंने नेताओं की अनर्गल बातों से संतुष्ट होने से मना कर दिया. नाइंसाफी से जूझते राष्ट्र में यह नए मुक्ति संघर्ष की एक झलक भर थी, जिसका अगुआ वह नाराज भारतीय था जिसने उम्मीद का दामन तो छोड़ दिया है, लेकिन जिसके पास अपने गुस्से की ताकत अब भी बाकी है.
दिल्ली की बदनाम सड़कों पर एक लड़की के साथ हुई नृशंसता ने इस बार चिनगारी का काम किया. इंडिया गेट पर जमा प्रदर्शनकारी जानते थे कि उस लड़की ने जो हैवानियत भोगी है, उनका संघर्ष उसकी बराबरी नहीं कर सकता. वह लड़की भी इन्हीं प्रदर्शनकारियों जैसी युवा थी, इक्कीसवीं सदी के भारत की सबसे संभावनाशील आबादी में से एक, जो संभावनाओं की राजधानी में एक सपना लेकर आई थी. लेकिन यह कहानी उस रात उस बस में चढऩे से पहले की है. वह बस नहीं, यातना शिविर थी.
आप इस तथ्य से मुंह नहीं चुरा सकते कि जिन्होंने उस पर जुल्म ढाया, वे भी इसी युवा आबादी का हिस्सा थे, अलबत्ता उनकी रिहाइश के दड़बे ही उन्हें नई पीढ़ी के चेतनासंपन्न युवाओं से अलग करते थे. इस बार इंसाफ की मांग में उठे नौजवान हाथ इतने स्वत:स्फूर्त थे कि नागरिक अधिकारों के लिए लडऩे वाली कोई भी क्रांतिकारी ताकत इन्हें बरगला नहीं सकती थी.
वे अपनी आकांक्षाओं, अपनी चाहतों और आजादी के अपने खयाल से बिलकुल अलहदा और बेमेल उस भारत को खारिज कर रहे थे, जहां एक अकेली औरत का सड़क पर चलना मुहाल है; जहां सबसे कमजोर नागरिक हिंसा का स्थायी शिकार हैं; जहां आपकी पहचान ही आपकी किस्मत तय करती है, वह लैंगिक हो चाहे जातीय; और जहां के बाजारों में सबसे सस्ती चीज अगर कुछ है तो वो है जिंदगी. अपनी ही अनैतिकता से खुद को अवैध ठहरा चुके एक राज्य में ये चेहरे बाहरी माने जाते हैं.
यह 2012 का भारत था जहां जितना बड़ा सरोकार, उतनी ही ज्यादा असहमत भीड़ थी. उनका गुस्सा जितनी तेजी से बढ़ा था, उसकी बराबरी सिर्फ इस व्यवस्था की संवेदनहीनता ही कर सकती थी. इस आक्रोश का बीज जंतर-मंतर और ऐसी ही दूसरी जगहों पर पनपा था, जब उसके निशाने पर सिर्फ भ्रष्ट नेता हुआ करते थे. लेकिन कैंसर की तरह फैले इस गुस्से ने न सिर्फ यह जता दिया कि सत्ताधारी वर्ग नैतिक रूप से खोखला हो चुका है बल्कि यह भी बताया कि लुटेरों के इस गणराज्य में आधुनिकता एक छलावा है; जहां सत्ता बचाव का सबसे महीन तरीका यह अपनाती है कि असल मुद्दे को ही दूसरी दिशा में मोड़ दिया जाए.
हमने पहले भी देखा था कि सीएजी के खुलासे के बाद किस तरह लूट के आंकड़ों पर देश का सरकारी तंत्र पहली प्रतिक्रिया में शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन धंसाए इनकार की मुद्रा में बैठा रहा था. स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए कुख्यात ए. राजा हों या कॉमनवेल्थ घोटाले का चेहरा सुरेश कलमाड़ी, यह रोजमर्रा की बात नहीं थी. लेकिन जो हुआ, उससे लोगों की धारणा यह बनी कि इस देश में दंड कभी भी अपराध के अनुपात में नहीं मिलता.
न्यायपालिका हो या संसद, नागरिक समाज की सभी संस्थाओं ने किसी न किसी तरह से नागरिकों को निराश ही किया है. चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों लूटे-खसोटे गए एक लोकतंत्र में लोगों ने अब खुद को सबसे ज्यादा अपमानित हिस्सेदार के तौर पर देखना शुरू कर दिया था. इसी की परिणति रही कि 2012 के अंत तक मोहभंग अपने चरम पर पहुंच गया और गुस्साए नागरिकों ने सड़कों को जंग के मैदान में तब्दील कर डाला.
भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्साया नागरिक अब भी नेतृत्वविहीन नहीं हुआ है. पिछले साल इस गुस्से को संभालने का काम गांधी टोपी पहने एक सत्याग्रही ने किया था. सरकारी तंत्र जिस तरह झूठ के दलदल में धंसता चला जा रहा था और नेताओं के साथ विश्वसनीयता का आखिरी धागा भी टूट चुका था, सड़क पर अपनी जंग लडऩे वाले नागरिकों के लिए वह गांधीवादी आदर्श बन गया. इस साल अण्णा हजारे के अनुयायियों ने जमीनी स्तर पर फैल रहे असंतोष को पकड़ा और अपनी लड़ाई को नया चरण दिया-यह जंग अब राजनीति के अखाड़े के भीतर होनी थी. गुस्से की ताकत ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को टिकाए रखा, लेकिन इसे एक निर्देशक की जरूरत थी.
अरविंद केजरीवाल का निर्देशन बदनाम हो चुकी व्यावहारिक राजनीति के खिलाफ प्रचार की रणनीति पर टिका था, लेकिन उसका वैकल्पिक आदर्श उन सुदूर गांवों में बसता था जो भारतीय युवा की आकांक्षाओं से कोसों दूर है. इस संदर्भ में देखें तो बोडोलैंड में बहे आदिवासियों के खून के बाद जिस गुस्से ने समूचे पूर्वोत्तर को अपनी चपेट में ले लिया था, वह भी वंचितों के नेतृत्व के लिए सियासी चारा ही बन कर रह गया. इससे जातीयता की राजनीति की भयावहता में हालांकि कोई कमी नहीं आई और बाहरी ठहरा दिए गए लोगों का पलायन कम से कम आधुनिक भारत की सांस्कृतिक विविधता का तो प्रतिनिधि चेहरा नहीं ही था.
अतीत पर नजर डालें तो पाएंगे कि गुस्साए नागरिकों के पास हमेशा ही एक नेतृत्व रहा है, वह कमोबेश एक राजनैतिक एजेंडा लेकर चला है और उसका फायदा भी उसने उठाया है. राज्य के आर्थिक कुप्रबंधन के चलते जब महंगाई आसमान पर पहुंची थी, तो अचानक बहुसंख्य लोग बाजार से कट गए थे. उस वक्त भी उनके गुस्से को उन राजनैतिक पार्टियों ने भुना लिया जिनकी आर्थिक दृष्टि एक ग्लोबल दुनिया में विकल्प देने से कोसों दूर थी. कह सकते हैं कि 2012 दिल तोडऩे वाला साल रहा जब सिर्फ नेता मुस्कराते रहे जबकि बदहाल नागरिक जिंदगी की बुनियादी जरूरतों के लिए चीखते-चिल्लाते ही रह गए.
जनता की चीख जब डर की सरहदें तोड़ देती है, तो फिर वह ताकतवर लोगों की खुशफहमियों को भी छिन्न-भिन्न कर देती है और फिर उसमें आततायियों को डराने का माद्दा आ जाता है. हाल ही में दिल्ली में हुए प्रदर्शन तीव्र भावना और आदर्श से संचालित थे, इसे किसी केजरीवाल आदि की व्यक्तिगत ईमानदारी जैसी चीज छू तक नहीं गई थी. इसे इक्कीसवीं सदी की प्रतिनिधि लड़ाई कहा जा सकता है. नारों को तेजी से फैलाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पहली बार हुआ था.
कुछ लोग कह सकते हैं कि फेसबुक या ट्विटर से क्रांति आ सकती है. हालांकि सवाल किसी माध्यम की संभावनाओं का उतना नहीं होता जितना संदेश की ताकत का होता है जो असल फर्क डालता है, जैसा हमने काहिरा के तहरीर चौक पर या बाकी मध्य-पूर्व में देखा है. हालांकि भारत जरा अलग किस्म का देश है, लेकिन इतना भी अभिशप्त नहीं है कि आजादी मुट्ठी भर लोगों की बंधक हो. यहां दांव पर सिर्फ लोकतंत्र नहीं है, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से लोकतंत्र के प्रबंधन पर भी सवाल है. टीवी पर प्राइम टाइम से लेकर अखबारों के पहले पन्ने पर मौजूद गुस्साए भारतीय युवाओं की तस्वीर एक ऐसे लोकतांत्रिक भारत की तस्वीर थी जो इनकार की मुद्रा में थी.
माध्यम चाहे सोशल हो या पारंपरिक, गुस्से को भड़काता ही है. यह चौन से सोने वालों और गुस्साए लोगों का फर्क भी साफ करता है. 2012 में गुस्साए नागरिकों का नायकत्व अप्रासंगिक नेताओं की निष्क्रियता के खिलाफ खड़ा था. इंडिया गेट पर मौजूद प्रदर्शनकारियों को राहत दिलाने और आश्वस्त करने के लिए साउथ ब्लॉक में एक भी ऐसा चेहरा नहीं था जिसके शब्दों पर भरोसा किया जा सकता था.
किसी भी प्रतिरोध के पुराने पन्नों को पलटें तो एक रूमानियत सी बार-बार दिखती है. हमेशा ही प्रतिरोध की दास्तानें सुखद नहीं होतीं. दमनकारी राज्य के फौजी बूट उसे शांत करा सकते हैं. उसकी शहादत, उसकी जीत की तरह ही प्रेरणादायक होती है.
हालांकि विरोध प्रदर्शनों की कब्रगाह पर खड़ी कई सत्ताएं सिर्फ सवालों की ताकत से ढह चुकी हैं. भारत की सड़कों पर प्रतिरोध की यह रूमानियत सत्ता परिवर्तन नहीं कर सकती. हां, राजनैतिक संस्कार को जरूर बदल सकती है. यह गुस्सा राजनीति की कला को रोशन कर सकता है, अंधेरा कुछ कम हो सकता है. सड़कों से उठकर समूचे राष्ट्र की चेतना को अपने कब्जे में ले लेने वाला आक्रोशित हिंदुस्तानी गुजरते दर्दनाक साल में हमारा नायक है, क्योंकि उसके गुस्से ने राजनीति को झकझोर दिया है, नेताओं को जवाबदेह बनाया है और इन सबसे कहीं ज्यादा, बुनियादी तौर पर गड़बड़ व्यवस्था की फूहड़ताओं को उजागर किया है. आजादी की लड़ाई का नया नेता यही नाराज हिंदुस्तानी है.

