साल 2012 का अंत धमाके या फुसफुसाहट के साथ नहीं बल्कि चीत्कार के साथ हुआ है. 2010 के बाद से घोटाले भारत को कई तरीके से चोट पहुंचाते रहे हैं. देश को 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों की हेराफेरी और फिर 2जी घोटाले के कारण शर्मसार होना पड़ा. इन दोनों प्रकरणों के कारण 2011 में अण्णा हजारे को जबरदस्त समर्थन और स्वीकार्यता मिली. उसके बाद इसी समर्थन पर सवार अरविंद केजरीवाल की खोद-खोद कर कीचड़ उछालने वाली टीम ने राजनैतिक वर्ग पर खूब कीचड़ फेंका. नितिन गडकरी से लेकर सलमान खुर्शीद तक सभी को निशाना बनाया गया, यहां तक उन्हें भी नहीं छोड़ा गया जो उन लोगों के करीब थे.
दो साल की राजनैतिक गलतियों के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि तीसरा साल चीजों को ठीक कर देगा. लेकिन हम ऐसे खुशकिस्मत कहां! 2012 शोर-शराबे के साथ शुरू हुआ और साल भर उसी गति पर बना रहा, यहां तक कि बलात्कार विरोधी प्रदर्शन ने उस स्वर को और भी ऊंचा कर दिया. कोयला घोटाले के बाद फर्रुखाबाद में सलमान खुर्शीद के खिलाफ प्रदर्शन, कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, असम में हत्याएं, रॉबर्ट वाड्रा का पर्दाफाश जैसी घटनाओं ने देश के राजनैतिक मूड को बिगाड़ कर रख दिया. किसी ने भी इसकी उम्मीद नहीं की थी.
जब दिसंबर की सर्द रात को दिल्ली की एक 23 वर्षीया लड़की को बलात्कार के बाद मुर्दा जानकर पुलिस की नाक के नीचे फेंक दिया गया तो कुछ अत्यंत ज्वलंतशील चीज देश के जवानों में समा गई. ये युवा वर्ग बिना किसी रहनुमा के तो थे लेकिन दिशाहीन नहीं थे. वे इंडिया गेट पर जमा हुए और उनका गुस्सा देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया. बलात्कार की मार्मिक घटना ने लोगों के गुस्से को भड़का दिया जो पहले से ही उबलने के कगार पर था.
एक बार फिर राजनैतिक वर्ग ने इसे बेरुखी के साथ लिया जो अब इस वर्ग की पहचान बन चुका है. कोई भी मंत्री प्रदर्शन स्थल पर नहीं आया यहां तक कि सत्ताधारी प्रतिष्ठान से कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति इंडिया गेट की घास और डामर पर नहीं चला. गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का विचार था कि ऐसे किसी कदम से खराब मिसाल कायम होगी. अंत में उन्होंने अपने इस न बयान किए जाने वाले वक्तव्य के साथ अपनी दलील पेश की ''कल को अगर छत्तीसगढ़ या गढ़चिरौली में 100 आदिवासी मारे जा सकते हैं तो क्या सरकार वहां पर भी हो सकती है.”
इस भुलाई न जाने वाली असंवेदनशीलता को इतिहास में अंकित किया जाना चाहिए. यह तो फ्रांस की रानी मैरी एंतोनेत की भूल को दूसरे पायदान पर भेजने के लिए काफी है जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर लोगों के पास खाने के लिए रोटी नहीं है तो वे केक क्यों नहीं खाते. शिंदे के बचाव को पुलिस प्रमुख ने अपना लिया और कहा कि अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी पुलिस कार्रवाई में जख्मी होते हैं तो यह बुरी बात होगी और उन्होंने उसे ''कौलेटरल डैमेज (परोक्ष नुकसान)” का नाम दिया. क्या वह एक पुलिस प्रमुख के तौर पर बयान दे रहे थे या फिर किसी आक्रामक फौज के प्रमुख के तौर पर?
शिंदे का वक्तव्य उस वायरस का द्योतक है जिसने राजनैतिक वर्ग को अपनी चपेट में ले रखा है. इस वर्ग के दूसरे लोगों ने शिंदे की तरह हमारे चेहरों पर खंखारा या छींका नहीं होगा लेकिन उनमें भी यह बीमारी बहुत गहरी है. यकीनन वहां सरकार को होना चाहिए जहां पर लोगों को मारा जा रहा है और उनका बलात्कार किया जा रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यही किया जब एक छोटे से शहर कनक्टीकट में एक पागल व्यक्ति ने 27 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.
भारत को देखें, यहां चीजें कितनी अलग हैं. जब युवा प्रदर्शनकारी चीख-चीख कर अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, उसी समय बुजुर्ग नेता अपना मुंह खोलने को लेकर पसोपेश में थे. हमारे प्रधानमंत्री ने मीडिया के सामने एक लिखित बयान को बोलने के लिए पांच दिन तक राजनैतिक मिजाज को जांचने-परखने की कोशिश की. उसके बाद भी उन्होंने टेलीविजन वालों से पूछा कि क्या इतना 'ठीक है!’ कहीं अंदर उनको यह लगा होगा कि उनका वही पुराना राग लोगों के दिलों को छू भी पाया है या नहीं लेकिन उनके लिए यह सब मायने नहीं रखता. यह सब एक दस्तूर के मुताबिक कहा गया और उसी तरह लोगों ने इसे ठुकरा भी दिया.
पहले भी कश्मीर से लेकर कोकराझार तक बलात्कार की भयानक घटनाएं होती रही हैं. पुलिस के 2011 के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में हर 18 घंटे में बलात्कार की कोई न कोई घटना होती है. उन गरीब बच्चों के बारे में सोचें जिनका शोषण हुआ था और जो 2005 के निठारी मामले में नरभक्षी प्रवृत्ति का शिकार हुए थे. यहां यह बात कुछ लोगों के दिमाग में आ सकती है कि प्रदर्शनकारी दिल्ली की सड़कों पर इस बार इसलिए उतरे कि बलात्कार की शिकार एक मध्यवर्ग की लड़की थी, न कि गरीब या जंगलों में रहने वाली कोई आदिवासी. लेकिन ऐसे लोग असल मुद्दे से चूक गए हैं.
क्या यह मायने रखता है कि आग इतनी देर तक जली कि इसकी आंच सब ने महसूस की? अगर फास्ट ट्रैक न्याय अनिवार्य बनाने वाला बलात्कार सामने आता है तो इससे हर वर्ग की महिलाओं को लाभ पहुंचेगा. पहले से ही एक लाख से ज्यादा बलात्कार के केस अदालतों में लंबित हैं और इनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है. जब सवाल महिला के सम्मान का हो तो इसका असर पार्टी लाइन और सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर होगा. कारण यह नहीं है कि हर नेता की भी बहन, बेटी और पत्नी है. बात यह है कि हर पार्टी ने संसद या सदन में बलात्कार के आरोपी को पहुंचा रखा है.
आखिर हमारे नेताओं को इस बात की घोषणा करने के लिए क्या चाहिए कि उन्होंने अपनी सुरक्षा में काफी हद तक कटौती की है? इससे फौरन ही हजारों की संख्या में पुलिस बल मुक्त हो जाएगा जिससे वे सड़कों पर पहरा दे सकेंगे.
आखिर हमारे सांसद पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों को क्यों लागू नहीं कर सकते? वे एक कदम आगे बढ़कर यह ऐलान भी कर सकते हैं कि जिन पर बलात्कार का आरोप है अब उन्हें उनकी पार्टी की ओर से टिकट नहीं मिलेगी. आगे बढ़ें, हमें हैरत में डाल दें और हमारे नए साल को कुछ खास बना दें.
यह सच है कि नेताओं के खिलाफ कुछ इल्जामात अदालतों में नहीं टिक सकते और किसी को अदालत में मुजरिम करार देने से पहले मुजरिम समझना भी सही नहीं है. यह बात भी सच है कि कभी-कभी शरारती और मतलबी तत्व झूठे इल्जाम लगाते हैं. फिर भी लोग चाहते हैं कि ऐसे आरोप सिर झुकाकर चलें.
बहरहाल, एक प्रतिनिधि लोकतंत्र को कानून के पालन के तौर पर किसी चीज के औचित्य को देखना चाहिए. नहीं तो हम लोग हमेशा ऐसे बम पर बैठे रहेंगे जिसके फूटने की संभावना हर पल बनी रहेगी. यह मामूली पुलिस केस को भी इतना महत्व देगी कि सरकार की चूलें तक हिल जाए. 2012 समेत ऐसा ही कुछ कई वर्षों से हो रहा है.
इसमें कोई शक नहीं कि बलात्कार हर जगह होता है, यहां तक कि बेहतरीन और नियंत्रण वाले हालात में भी. लेकिन उस वक्त उनका प्रभाव व्यक्तिगत जुर्म से बढ़ जाता है जब अवाम की शिकायतें इस कदर ज्यादा हों तो फिर बड़े कदम उठाने की जरूरत आन पड़ती है.
कौन है जिसे किसी वीआइपी की आवाजाही से परेशानी न हुई हो? खुलेआम पुलिसकर्मियों को घूस लेते हुए किसने नहीं देखा है? कौन है जो यह नहीं जानता है कि कानून का पालन कानून तोडऩे से ज्यादा मुश्किल है? किसने नहीं पढ़ा है कि बड़े-बड़े घोटाले नेताओं की छत्रछाया में होते हैं? और कौन है जो सही चीजों पर पैदा होने वाले गुस्से में खुद को असहाय न महसूस करता हो? तो क्या ऐसे में इंडिया गेट पर जाहिर किया जाने वाला गुस्सा कोई हैरत की बात है जिसमें सिर्फ चीख है, कोई मांग नहीं?
कोई कह सकता है कि 2012 को सिर्फ भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम या इस दिसंबर को बलात्कार विरोधी प्रदर्शनों के तौर पर याद नहीं किया जाना चाहिए. राजनैतिक पार्टियों ने भी अपना किरदार निभाया है. संसद में कुछ प्वाइंट कोयला घोटाले और खुदरा बाजार में एफडीआइ के मामले पर हासिल किए गए हैं. संसद में इस प्रकार की झूठी लड़ाई पर लोग सड़कों पर भी उतरे हैं, हाथों में बैनर और प्लेकार्ड लेकर. फिर भी इन प्रदर्शनों ने लोगों को प्रेरित नहीं किया. ऐसा लगता था कि यह नूरा कुश्ती है जिसमें बारी-बारी एक दूसरे को पछाड़ा जा रहा है. संक्षेप में उनमें किसी ने भी पार्टी से अलग हटकर न तो जोश, न जिंदादिली और न ही ईमानदारी का प्रदर्शन किया. वे कहते हैं कि किसी खबर का न होना अच्छी खबर है तो इस तरह किसी खबर का न होना बुरी बात भी है. यह सब इतनी जल्दी-जल्दी हो रहा है कि यह अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं.
जल्द ही हम इनके इतने आदी हो जाएंगे कि न तो भ्रष्टाचार और न ही किसी सामाजिक हिंसा पर हमारे अंदर किसी तरह का जोश हिलोरें मारेगा. भ्रष्टाचार तो पहले से ही नीरस विषय में तब्दील हो चुका है और यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल को उस तरह का समर्थन नहीं मिल पा रहा है जिसकी वे उम्मीद रखते हैं.
अगर हमारे नेताओं की अलमारियों में इतने अपने या भाड़े पर लिए गए भयानक राज छिपे होंगे तो कल्पना कीजिए कि एक समय आने पर बुरी खबरों को रोजाना सुर्खियों में जगह मिलना कितना मुश्किल हो जाएगा.
अगर अब अच्छी चीजें होनी हैं तो उन्हें वास्तविक और नजरों को आकर्षित करने वाला होना होगा. क्या हमारे नेता जल्द ही हमें संतुष्ट करेंगे. शायद आने वाले साल में?
लेखक दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में सोशियोलॉजी और सोशल एंथ्रोपोलॉजी पढ़ा चुके हैं. वे शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं.

