उनके असली जीवन की शुरुआत 29वें वर्ष में हुई. एम.सी. मैरी कॉम को अपनी जिंदगी के प्राइम टाइम में भी शोहरत पर निशाना लगाने की इजाजत नहीं दी गई—ओलंपिक में महिला मुक्केबाजों के लिए दरवाजा पहली बार लंदन 2012 में ही खोला गया. मैरी 2011 से ही पांच बार वल्र्ड चैंपियनशिप में मेडल हासिल कर चुकी थीं, लेकिन 48 किलो के उनके वर्ग को लंदन में महिला मुक्केबाजी में शामिल नहीं किया गया. यह उनके लिए दूसरा आघात था.
यह दो बच्चों की मां की जबर्दस्त लगन का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने वजन को बढ़ाकर 51 किलो कर लिया. उनके मुताबिक यह प्रक्रिया किसी भी ट्रेनिंग स्कीम से ज्यादा बोझिल थी.” जब वे एकमात्र क्वालिफाइंग टूर्नामेंट वल्र्ड चैंपियनशिप के क्वार्टरफाइनल में हार गईं तब दिल टूटना स्वाभाविक लगने लगा. लेकिन किस्मत ने उन्हें एक और अवसर मुहैया करा दिया—इंग्लैंड की मुक्केबाज निकोला एडम्स ने उन्हें रीपीचेज सिस्टम के द्वारा टूर्नामेंट में वापस आने का रास्ता दिया.
मेडल के भूखे देश ने मैरी का उत्साह बनाए रखा और एक के बाद एक प्रतिद्वंद्वी को परास्त करते हुए वे सेमीफाइनल तक पहुंचीं और ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया. गोल्ड तक न पहुंच पाने की वजह से मैरी की आंखों में आंसू आ गए, गोल्ड न जीतने के लिए माफी मांगकर उन्होंने देश का दिल जीत लिया.
अपनी उम्रदराज काया से रियो 2016 में बाजी मारने के लिए जोर लगाएंगी. इस बीच उनके लिए पुरस्कारों का सिलसिला रुका नहीं है. उनके जीवन पर संजय लीला भंसाली एक फिल्म बना रहे हैं जिसमें प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिका में होंगी. इसके लिए प्रियंका को इंफाल में प्रशिक्षण दिया जाएगा. और खुद मैरी मुक्के लगाने के अलावा एक किताब लिखने में व्यस्त हैं.

