प्रभात रंजन की लघुकथाओं का एक जबरदस्त संग्रह है, जिसका शीर्षक है बोलेरो क्लास. इसकी कहानियों-और शीर्षक ने भी-उन आकांक्षाओं को कुशलता से पकड़ा है जो तरह-तरह के छोटे शहरों से होकर गुजरने वाले नए हाइवे और टोलवे तक अपना रास्ता बना चुकी हैं. डामर से परे कई वर्चुअल हाइवे भी हैं जो पूरे देश को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं. इनकी पहुंच घरों के अंदर तक है. बहुत ही अंदर: ड्राइंग रूम, स्टडी और बेडरूम तक.
लेकिन बाजार और घरों तक नई सोच (और नए प्रोडक्ट) पहुंचाने वाले हाइवे मान्यता और चलन के पुराने ढांचों को पूरी तरह से खत्म नहीं कर पा रहे हैं. मान्यताओं के मुकाबले टेक्नोलॉजी काफी तेजी से बदल रही है और जहां इन दोनों का मिलन होता है वहां आकांक्षाएं टकराती हैं और इच्छाओं को कोई सिरा नहीं मिलता.
चार महानगरों (नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नै) और 12 छोटे शहरों (हिसार, मुरादाबाद, कोटा, कोल्हापुर, जामनगर, रतलाम, सेलम, कोट्टयम, गुंटूर, आसनसोल, बालेश्वर और आइजॉल) में किए गए 2012 नीलसन-इंडिया टुडे सेक्स सर्वे में उभरकर आए छोटे शहर उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां तेजी से बदलता समय, बहुत धीरे-धीरे बदल रही मान्यताओं से टकरा रहा है.
इंडिया टुडे के इस दसवें वार्षिक सेक्स सर्वे से पता चलता है कि देश के अन्य इलाकों के लोग पूर्वोत्तर को दूसरे देश की तरह देखते हैं. इंटर-पर्सनल संबंधों के कुछ पहलुओं के मामले में तो यह साफ तौर पर दिखता है. इसी प्रकार, मिजोरम की राजधानी आइजॉल के काफी लोग (79 फीसदी) अपने सेक्स जीवन को संतोषजनक मानते हैं. हालांकि, कच्चे आंकड़ों से हमें यह नहीं पता चल पाता कि लोगों के लिए ‘‘संतुष्टि’’ का क्या मतलब है, लेकिन यह तथ्य विचारणीय है कि आइजॉल-ऐसे क्षेत्र में स्थित शहर जहां काफी हद तक सामान्य जीवन बाधित रहा है-के लोगों में देश के अन्य छोटे शहरों के मुकाबले अपने दिन-प्रतिदिन के सामाजिक जीवन और आर्थिक हालत के बारे में खुशहाली का ऊंचा स्तर देखा गया.
पूर्वोत्तर में पसरी अशांति ने वहां मर्द-औरतों के तुलनात्मक उदार संपर्कों की परंपरा को ज्यादा नहीं बदला है. इसलिए आइजॉल में उन लोगों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है जिन्होंने पहले सेक्स पार्टनर के रूप में अपने ब्वॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड को नामित किया है. वहां लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों और एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर वालों की संख्या भी अपेक्षाकृत ज्यादा है.
आइजॉल में जहां ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड के के साथ डेट पर जाने वालों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है (89 फीसदी), वहीं मुरादाबाद और गुंटूर में यह क्रमश: 3 फीसदी और 2 फीसदी है. आइजॉल का ऊंचा आंकड़ा एक बार फिर से विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाता है. छोटे शहरों में डेटिंग की कम तादाद से पता चलता है कि ऐसे संपर्क सार्वजनिक गतिविधियों में आते हैं और इस तरह की गतिविधियों के लिए जगह बहुत कम हैं.
मॉल, मल्टीप्लेक्स और सार्वजनिक पार्कों जैसी जगहों के बढऩे से इस परिस्थिति में बदलाव आएगा, जहां प्रेमी जोड़े बिना किसी तरह की प्रताडऩा के या पहचाने जाने के डर के बिना घूम सकेंगे.
ब्वॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड रखने और डेटिंग पर जाने की आकांक्षा साफ तौर से जाहिर की गई और ज्यादातर शहरों में (मुरादाबाद को छोड़कर सभी में) बड़ी संख्या में लोगों ने यह स्वीकार किया कि वे विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति के प्यार में पड़ चुके हैं. यह कोई अचरज की बात नहीं है, प्यार और रोमांस कॉस्मोपॉलिटन पहचान को जाहिर करने के लिए महत्वपूर्ण पहलू हैं और साथ ही ये अभी के कंज्यूमर कल्चर का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ये दोनों पहलू चाहत की ऐसी दुनिया को पोषित करते हैं जो नए-नए रास्तों की तलाश करती रहती है.
यह भी रोचक बात है कि कोटा में तुलनात्मक रूप से ज्यादा लोगों (50 फीसदी) ने इस बात को स्वीकार किया कि वे डेट पर जा चुके हैं. इसकी वजह यह हो सकती है कि कोचिंग इंडस्ट्री की वजह से वहां बड़ी संख्या में युवा रहते हैं. आखिर दुनियावी सफलता और इंटिमेसी की मॉडर्न आकांक्षा अकसर साथ-साथ चलती है.
भारत में आधुनिक अंतरंगता के बारे में सोच में चुंबन की अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है. आधुनिक से भी ज्यादा इसे ‘‘बहुत ज्यादा’’ पश्चिमी और ‘‘असली’’ भारतीय संस्कृति से बाहर की चीज माना जाता है. हमारी फिल्मों ने चुंबन को दिखाए बिना उसके संकेत देने के सबसे असाधारण तरीके निकाले हैं. इस सर्वे से लोगों के रवैये में बदलाव के महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलते हैं. वास्तव में, चुंबन का आनंद लेने की बात स्वीकार करने के मामले में छोटे शहरों का प्रतिशत चारों महानगरों से भी ज्यादा है (उदाहरण के लिए कोटा के 89 फीसदी लोग यह स्वीकार करते हैं, जबकि मुंबई में 81 फीसदी). एक और सवाल के जवाब में सर्वे में शामिल लोग चुंबन को भावनात्मक महत्व वाले एहसास के रूप में पर्याप्त महत्व देते हैं (जामनगर में 90 फीसदी और सेलम में 78 फीसदी).
चुंबन के बारे में रवैया बदलना असल में लोगों की खुद के बारे में सोच में बदलाव का ही हिस्सा है. इनसे यह संकेत तो मिलता ही है कि लगाव जाहिर करने के बारे में सोच बदल रही है, हमें यह भी पता चलता है कि एक दूसरे मामले में अपनी अलग पहचान की नई भावनाओं का विकास हो रहा है. रोमांस की इच्छा मॉडर्न होने की कल्पना का हिस्सा है और यह अपना निर्णय खुद लेने (उदाहरण के लिए पार्टनर चुनने) और अपने मुताबिक जीवन जीने के विचारों से जुड़ा है.
लोग अपने पार्टनर में किन गुणों की तलाश करते हैं? इस सवाल के कई बहुत रोचक जवाब मिले हैं. संभावित डेटिंग पार्टनर के लिए सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले गुण मैच्युरिटी और खुलापन हैं. ‘‘यौन आकर्षण’’ सबसे निचले पायदान पर आता है. क्या इससे यह मतलब निकाला जाए कि इस अस्थिर समय में-और यदि डेटिंग पार्टनर ही पति-पत्नी बनें-परिपक्व सोच की जरूरत है? और लोग जब जीवन-साथी की तलाश करते हैं तो जज्बात की जगह तर्क के आधार पर फैसला करते हैं?
शायद इसी वजह से उपयुक्त जीवन-साथी की तलाश के लिए लोग अटकलबाजी में दांव लगाने की बजाए दोस्तों और अपने जैसे लोगों पर ज्यादा भरोसा करते हैं. लेकिन यह बात सामने आई है कि ‘‘सौंदर्य’’ को ‘यौन आकर्षण’ से अलग देखा जाता है. बड़ी संख्या में लोगों ने कहा कि उनके पार्टनर में सुंदरता का गुण उन्हें आकर्षित करता है. लेकिन सौंदर्य शायद देखने वाले की नजर में होता है.
बदलावों के प्रमाण के अलावा यह सर्वे हमें इस बात की याद भी दिलाता है कि छोटे शहर लंबे समय से चल रही मान्यताओं के अगुआ हैं और उनमें बदलाव नहीं आया है. इसलिए सर्वे में शामिल ज्यादातर लोगों ने यही संकेत दिया है कि उनका सिर्फ एक यौन साथी रहा है और उनके पति या पत्नी ही उनकी आदर्श यौन साथी है. बदलाव की रफ्तार ने विवाहित जीवन के महत्व के बारे में रवैये को नहीं बदला है. इससे अंतरंगता और संबंध के कई अन्य पहलुओं के बारे में भी लोगों की सोच में बदलाव नहीं आया है.
इसलिए बड़ी संख्या में मर्द और औरतें, दोनों यह उम्मीद करते हैं कि उसके जीवन-साथी का कौमार्य सुरक्षित हो. और भले ही सेक्स के प्रति रवैया बदल रहा हो-गुंटूर के 56 फीसदी लोगों ने यौन फैंटेसी की बात कबूल की है-लेकिन इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर लोगों ने बताया कि शादी के समय उनका कौमार्य सुरक्षित था. एक बार फिर से वास्तविकता उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि कौमार्य के बारे में सोच. रतलाम ने इस रुख को पलट दिया है: सिर्फ 11 फीसदी यह मानते हैं कि शादी के समय उनके पार्टनर का कौमार्य सुरक्षित रहा होगा.
कई अन्य महत्वपूर्ण मामले भी हैं जिनमें लंबे समय से चल रही सांस्कृतिक मान्यताओं की दीवार को बदलाव की बयार के झोंके लगे हैं. बहुत कम संख्या में लोगों ने यह स्वीकार किया कि यौन जीवन संतोषजनक न रहने पर वे दोबारा शादी कर सकते हैं, और बहुत ज्यादा लोगों (मुरादाबाद में 84 फीसदी और बालेश्वर में 73 फीसदी) ने लिव-इन रिलेशनशिप को खारिज किया.
इसी तरह डेटिंग तो स्वीकार्य है, लेकिन शादी से पहले यौन संबंध को बहुत कम स्वीकार्यता मिली है. लेकिन कोटा के 22 फीसदी लोगों ने ‘‘रजामंदी से संबंध’’ की बात स्वीकार की. कोटा में यह स्वीकार करने वालों का प्रतिशत भी ज्यादा रहा कि यौन संबंध बनाते समय यौन फैंटेसी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उन्होंने समान लिंग के व्यक्ति से यौन संबंध बनाए हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं की आकांक्षा के लिए प्रेशरकुकर की भूमिका निभा रहा कोटा अंतरंगता के मामले में प्रयोग करने वाला शहर भी बन गया है.
यौन जीवन में प्रयोग करने से पीछे न हटने के बावजूद-सर्वे में शामिल रतलाम के 22 फीसदी लोगों ने सेक्स ट्वायज का इस्तेमाल किया है और कोट्टायम के 59 फीसदी लोगों ने पोर्नोग्राफिक फिल्में देखी हैं-यौन संबंधों के ऐसे कम ही तरीके हैं जिनमें लिमिट से ज्यादा प्रयोग स्वीकार किया जाता हो. इसलिए होमोसेक्सुअलिटी और बाइसेक्सुअलिटी की स्वीकार्यता भी उस हिसाब से बहुत कम है, जैसा कि विपरीत लिंगी लोगों और ट्रांसजेंडर लोगों के बीच है. यह असल में हमें वास्तविक चलन की जगह लोगों का रवैया ज्यादा दिखाता है क्योंकि अनुभवजन्य साक्ष्य अलग कहानी कहते हैं. उदाहरण के लिए, शादीशुदा मर्द बाइसेक्सुअल (उभयलिंगी) संबंध बनाते पाए गए हैं. यह कई छोटे शहरों में भी दिखाई देता है.
हम ऐसी दुनिया में हैं जहां कल्पनाओं की उड़ान परंपराओं की सीमाओं को नहीं मानती. भारत के छोटे शहरों का यौन जीवन हमें सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं के बारे में बहुत कुछ बताता है. शायद इसका सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि हिसार, कोल्हापुर और कोटा के लोग अब इसके बारे में बात करने को तैयार दिखते हैं.
संजय श्रीवास्तव दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ में सोशियोलॉजी के प्रोफेसर हैं.

