कई साल तक मैं लखनऊ में रही. 1980 और 1990 के दशक के दौरान छोटे शहरों में रहने का मतलब था कि हमेशा दुपट्टा लपेटे रहो और कोशिश करो कि लड़कों से पंगेबाजी की नौबत न आए. मैं आम लड़कियों से थोड़ी अलग थी, लिहाजा ऐसे समय में जब साथ पढऩे वाले मेरे संगी-सहेलियों ने सेक्स को लेकर एक्सपेरिमेंट शुरू कर दिए थे, मैं दसवीं की अपनी परीक्षा के लिए शेक्सपियर को गहराई से समझने की कोशिश में जुटी हुई थी.
हम 'सेफ टाइम', सेक्स की अगली सुबह ली जाने वाली गोलियों या दूसरे गर्भनिरोधक उपायों के बारे में नहीं जानते थे. गर्भपात एक शर्मनाक चीज हुआ करती थी जिसे मेरे कॉन्वेंट स्कूल की लड़कियां चटखारे लेकर सुनातीं, ''हाय, सुना तुमने? पिछले दिनों कौन डॉक्टर के पास गई थी? '' मैं बुद्धू तब तक यही समझती थी कि इस तरह की कोई औरत दिमागी इलाजी के चक्कर में गई होगी डॉक्टर के पास. पर आज! यानी 20 साल बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव आया नहीं दिखता है.
लड़कियां सेक्स को लेकर एक्सपेरिमेंट करती हैं लेकिन उसके बारे में चर्चा करने से वे अब भी कतराती हैं. वे यह बताने से अब भी परहेज करती हैं कि वे अह्नत कुंआरी नहीं. लड़कों को इस सब के बारे में शायद ही कोई जानकारी होती है. हालांकि इक्का-दुक्का स्कूलों में यौन शिक्षा लागू की गई है लेकिन इनसे कोई ढंग की जानकारी नहीं मिलती. हां, इतना ज्ञान उन्हें होता है कि ''हमेशा कंडोम का इस्तेमाल करो और संयम से रहो. '' लेकिन ऐसा भी नहीं कि जानकारियां उन तक नहीं पहुंच रही हैं.
मोबाइल पर उपलब्ध पॉर्न और लैपटॉप के फोल्डर में सहेज कर रखे इरोटिक वीडियो ने नई पीढ़ी को यौन संबंधों का ए टू जेड सिखा दिया है. अब मुश्किल यह खड़ी होती है कि जो कुछ देखा उसमें माहिर हों भी तो कैसे? क्योंकि सेक्स महज एक क्रिया भर नहीं बल्कि एक भावनात्मक चीज है. इसकी जगह उस समाज में कहां जो परंपराओं की जकडऩ में घुट रहा है. इस मामले में छोटे शहरों और महानगर के मर्दों में बड़ा हल्का-सा फर्क है. और औरतें भी पीछे नहीं.
नीलसन-इंडिया टुडे सेक्स सर्वे के अनुसार, छोटे शहरों में पुरुष डेट पर नहीं जाते. इसी से पता चलता है कि लखनऊ में ज्यादातर लड़के आखिर क्यों चाय की दुकानों पर खड़े होकर लड़कियों को घूरते तो दिख जाते हैं, लेकिन किसी लड़की को साथ चलने की बात कहने का जोखिम नहीं उठा पाते. हिंदुस्तान में हम सेक्स के बारे में बात नहीं करते, बल्कि इसे ऐसा विषय मानते हैं जिसे अपने तक ही रखा जाना चाहिए. सेक्स के बारे में जानकारी हमें इंटरनेट या दोस्तों से मालूम होती है. दोस्त भी ऐसे जो खुद भी क्या जानते होंगे? लिहाजा देश के लड़के औरतों की जरूरत के बारे में अधकचरी जानकारी के साथ बड़े होते हैं.
19 की आयु पर पहुंचने तक छोटे शहरों या महानगरों के ज्यादातर लड़के-लड़कियों को 'प्यार' हो चुका होता है और वे उसी से शादी करना चाहते हैं. 20 से 25 साल की उम्र तक ज्यादातर लोग ऐसे ही चक्करों में उलझे रहते हैं और उनके जीवन का पहला शारीरिक संबंध सुहागरात को बनता है. कुछ मुहब्बत में चोट खाते हैं और अपने जीवन में आई दूसरी लड़की से ब्याह कर लेते हैं. कई साथियों के साथ संबंध बनाने का फितूर छोटे शहरों के मर्दों को नहीं भाता.
महिलाओं को आकर्षित करने की कला भी उन्हें नहीं आती. इसे बार-बार करना उनके लिए कठिन है. इसलिए वे एक आसान रास्ता चुनते हैं. वही जो उनके पिता करते आए हैं. वे घर खर्च के लिए पैसे देते हैं और पत्नी का कहा मानकर पारिवारिक शांति बनाए रखते हैं. यह एक मिथक है कि पुरुषों को कई साथियों की जरूरत होती है और जिम्मेदारी उठाने से उन्हें डर लगता है. वे कतई ऐसे नहीं होते. उनका एक ही सपना होता है कि उनके जीवन में सोलह कला में दक्ष एक समझदार कन्या आए और उनके सारे दोषों के साथ उसे अपना ले. एक सुंदर और बुद्धिमान पत्नी पाने की चाहत कभी-कभी औरत की समझदारी और सहृदयता के गुण को फीका कर पुरुष की फेहरिस्त में सबसे ऊपर विराजमान दिखती है. ऐसा इसलिए कि तब ही वे अपने बगल में खड़ी बुद्धिप्रदीप्त सौंदर्य शलाका के गर्वीले प्रदर्शन से अन्य लोगों के दिलों पर छुरियां चलाएंगे.
छोटे शहरों के ज्यादातर पुरुष शादी होने तक कुंआरे रहते हैं. उनकी पत्नी ही उनकी सेक्स पार्टनर होती है और अगर वह तन-मन से सेक्स के लिए तैयार है तो वे संतुष्ट रहते हैं. हैरत की बात है कि एक आदर्श यौन साथी के रूप में उनके मन में बैठी छवि उनकी पत्नी ही होती है, न कि किसी फिल्म स्टार की या खिलाड़ी की. कल्पनालोक की सैर छोटे शहरों के मर्दों का शगल नहीं.
आज जब प्रगति और विकास के नए परचम लहरा रहे हैं और हम खुद को उदार मान रहे हैं, कितनी अजीब बात है कि छोटे शहरों या महानगरों का पुरुष अब भी अपनी पत्नी से अक्षत कौमार्य की अपेक्षा कर रहा है. यही वजह है कि अगर शादी से पहले कॉलेज के दिनों में अपने किसी नजदीकी साथी के साथ कोई शारीरिक संबंध हो गया था तो लड़कियां अक्सर उसे छुपा बैठती हैं. अपनी 'छवि' को बचाने के लिए वे किसी हद तक चली जाती हैं.
मुझे याद है कि लॉरेटो कॉन्वेंट की अच्छी लड़कियों ने मुझ पर 'कमजोर करेक्टर और तेजतर्रार' का ठप्पा लगा दिया था. वजह इतनी सी थी कि मैं अपने भाई को लेने सेंट फ्रांसिस जाती जो सिर्फ लड़कों का स्कूल था और वहां उन लोगों से बातें करती. किसी लड़के को चुंबन देने और उसके असर को महसूस करने से पहले ही मेरा कौमार्य भंग घोषित कर दिया गया और कोई मुझसे शादी करने के लिए तैयार नहीं था. मन ही मन मैं सोच रही थी कि कितनी शानदार स्थिति है यह, लेकिन मेरी मां दहल गई थीं.
सर्वे में वही तथ्य उभर कर आए हैं जो मैं जानती थी: पुरुषों के लिए सेक्स हमेशा मायने रखता है. शादी के कुछ साल बाद भी सेक्स अहमियत रखता है. वैसे अगर उन्हें इसे जीने का भरपूर मौका न मिले तो भी कोई मलाल नहीं. छोटे शहरों के मर्द सप्ताह में दो से तीन बार सेक्स करते हैं, जबकि महानगरों में एक बार. छोटे शहरों में गर्भनिरोधक का चलन कम है, शायद वे मानते हैं कि एक ही साथी के साथ संबंध बनाए रखना सबसे बड़ी सुरक्षा है.
छोटे शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कोई जगह नहीं. महानगरों में भी कुछ पुरुषों का मानना है कि लिव-इन में रहने की बजाय अपने साथी के साथ डेटिंग करने के बाद शादी कर लेनी चाहिए. लोग आज भी सेक्स को भावना से अलग रखकर नहीं देखते. लिहाजा कई साथियों के साथ सहवास करना आसान नहीं. शहरों-कस्बों में ज्यादातर पुरुषों ने विवाहेतर संबंध से परहेज किया है. महानगरों या शहरों-कस्बों के पुरुष शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना जायज नहीं मानते.
फिर, जज्बा किसी रिश्ते में कितना अहम है? हम शायद इसी सोच और दर्शन के साथ जीने को अभिशप्त हैं कि शादी का मतलब है बुढ़ापे तक का साथ. दरअसल यह शादी से जुड़ा आश्वासन है, इसलिए इसमें कोई और प्रयोग मान्य नहीं. मसलन, पत्नियों की अदला-बदली, एक रात का संबंध, यौनाचार या फिर इसी तरह के दूसरे खेल.
कामसूत्र के रचयिता वात्स्यायन यह सब देखकर गर्वान्वित तो नहीं ही होते. हमारा देश चौथी सदी के कामसूत्र से लुढ़कता हुआ इक्कीसवीं सदी की सेंसरशिप तक आ पहुंचा है. इसलिए जहां हिंदुस्तानी मर्दों की आचार-संहिता में 'छूना' मना है, निजी अंगों या अंतरंग क्षणों को देखने में कोई पाप नहीं. कई पुरुष दूसरों को कपड़े उतारते, नहाते या सहवास करते देखने का लुत्फ उठाते हैं. यही उनके लिए पॉर्न सरीखा है और पॉर्न को अच्छा माना जा रहा है क्योंकि यह हमें तनाव से मुक्त करता है और मर्दों को वफादार बनाए रखता है.
इंटरनेट ने इनकी मदद के लिए कई खिड़कियां खोल दी हैं. अश्लील साइट पर जाना और उसे डाउनलोड करना गलत नहीं या इसे प्रत्यक्ष देखना बुरा नहीं. उनके मन में सब उचित है जब तक वे 'छू नहीं रहे. '
शहरों-कस्बों में 14 की उम्र के किशोरों में शारीरिक संबंध और स्त्री की देह रचना के बारे में जानने की सहज उत्सुकता रहती है. उन्हें अपने दोस्तों से कच्ची-पक्की जानकारी मिल जाया करती है. वे जो सुनते हैं, उसे ही सच मान लेते हैं. सही जानकारी और अधकचरे तथ्यों के बीच बड़ा फर्क होता है. छोटे शहर में सेक्स से जुड़े शैक्षिक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं हैं. बॉलीवुड के लटके-झटके भरे द्विअर्थी गाने और मर्द के इर्द-गिर्द नाचती औरत उनकी दुनिया में चाहत के शोले भड़का देती है. नतीजा होता है बलात्कार, यौनाचार और हर तरह की गलत यौन हरकतें. यहीं से ऐसी संस्कृति जन्म लेती है जिसमें औरत के वजूद को इंसान की काया से काटकर यौन उपभोग की काठी पर टिका दिया जाता है.
एक अरब की आबादी वाले हमारे मुल्क में लोग सेक्स को अब भी बुरा मानते हैं. जब तक शादी, सहभागिता या दोस्ती पर चर्चा हो रही हो, अच्छा है; कौमार्य, शारीरिक संबंध या उससे मिलने वाले परम सुख की बात छिड़ी नहीं कि सब कमरे से उठकर चले जाएंगे. आखिर इतना डर क्यों? सेक्स को सबसे सही तरीके से समझने का नजरिया बातचीत ही है. इसके बारे में पढऩा, चर्चा करना और जानकारी का साझ ही समाज के बंद कपाटों को खोल सकता है.
सर्वे के मुताबिक, स्त्री-पुरुष दोनों का मानना है कि सेक्स के मामले में सिर्फ मार्गदर्शन के लिए यौन विशेषज्ञ के पास जाने की कोई जरूरत नहीं है. हां, किसी तरह की मेडिकल समस्या होने पर डॉक्टर के पास जाने से उन्हें परहेज नहीं है.
सेक्स को यहां एक ऐसा हौवा बना दिया गया है कि इससे जुड़ी रूढि़वादी धारणाएं जस की तस कायम हैं. अब भी कई महानगरों में रहने वाले पुरुष विचारों के स्तर पर छोटे कस्बों से आए हुए हैं. अपने विचार से वे दोस्तों और परिचित स्त्रियों को भी प्रभावित करते हैं. अगर पुरुषों ने अपनी विचारधारा को स्वस्थ और उचित दिशा नहीं दी तो यौन शोषण होता रहेगा. हमें ऐसी स्वस्थ शैक्षिक प्रणाली की जरूरत है जिसमें विपरीत लिंग का आदर करने का पाठ छोटी उम्र से ही पोषित हो. साथ ही निहायत जरूरी है कि यौन शोषण की घटनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए कड़े कानून बनें. इसके अतिरिक्त, एक ऐसा मीडिया विकसित हो जो हर हाल में औरत के पक्ष में खड़ा रहे.
-माधुरी बनर्जी लूजिंग माइ वर्जिनिटी ऐंड अदर डंब आइडियाज और मिस्टेक्स लाइक लव ऐंड सेक्स की लेखिका हैं.

