सच है कि पुरुष सेक्सुअलिटी और स्त्रियों की सेक्सुअलिटी के बारे में उनका रवैया हमें तमाम सामाजिक मानकों के बारे में काफी कुछ बता देता है. अब देखिए न, इंडिया टुडे के 2005 के सर्वे में 66 फीसदी युवा अविवाहित मर्दों ने कहा था कि वे ऐसी लड़की से शादी नहीं करेंगे जो शादी से पहले यौन संबंध बना चुकी हो. 2006 के सर्वे में यह प्रतिशत बढ़कर 74 फीसदी तक पहुंच गया. क्या बिस्तर पर मर्द या औरत दोनों के आनंद का महत्व है? इस सवाल के जवाब में भी एक ही आयु समूह के अविवाहित मर्दों की राय में भारी बदलाव आया.
2005 में इसके जवाब में 83 फीसदी लोगों ने ‘‘हां,’’ कहा था पर 2006 में यह संख्या घटकर 67 फीसदी रह गई. इससे पता चलता है कि लोगों की यौन संबंधों के बारे में किसी को राजी करने में ‘‘लैंगिक समानता’’ अब भी फिक्र का विषय बनी हुई है. यह बात भी सामने आई कि पिछले एक दशक में युवा आजाद ख्याल लड़कियों को स्वीकारने को प्रेरित तो हुए हैं पर वे उसकी आजादी को लेकर गहरे असमंजस में भी रहते हैं. ऐसे में हैरत की बात नहीं कि 2012 के सर्वे में जब युवाओं से पूछा गया कि वे संभावित डेटिंग पार्टनर में किस तरह के गुण देखना चाहते हैं तो उन्होंने ‘‘स्नेह’ को ‘स्वतंत्रता’ से काफी ऊपर रखा.
जिस दौर में इंडिया टुडे ने इस तरह के सर्वे किए हैं उसमें संयोग से भारतीय जीवन के सबसे खुले रहस्य समलैंगिकता पर भी सार्वजनिक बहस हुई. औपनिवेशिक जमाने के कानून ने भारतीय सेक्सुअलिटी के लिए ‘‘प्राकृतिक’’ और ‘‘अप्राकृतिक’’ जैसे काल्पनिक शब्द गढऩे में मदद की है. लेकिन यह कल्पना पुरुषों के दिए जवाब में नहीं टिकती. हालांकि, समलैंगिकता का अनुभव हासिल करने की बात स्वीकारने वाले विवाहित पुरुषों के प्रतिशत में 2004 से 2007 के बीच गिरावट आई है, लेकिन उन लोगों की संख्या दोगुने से ज्यादा हो गई जिन्होंने कहा कि इस बारे में उन्होंने पति/पत्नी से चर्चा की है.
समलैंगिकता के बारे में लोगों का परेशान करने वाला रवैया 2012 के सर्वे से भी साफ होता है. बड़ी संख्या में जहां मर्द यह कहते हैं कि विवाहेतर संबंधों के लिए वे अपनी पत्नी को माफ कर देंगे, वहीं ऐसे संबंध समलैंगिक प्रकृति के रहने पर जबर्दस्त रूप से नकारात्मक जवाब मिलता है.
पिछले वर्षों के आंकड़ों से यह बात सामने आती है कि ज्यादा से ज्यादा मर्द अब कम उम्र में अपना पहला यौन संबंध बनाने लगे हैं. 2005 के सर्वे में शामिल 32 फीसदी अविवाहित पुरुषों ने कहा था कि उन्होंने पहले यौन संबंध का अनुभव 15 से 18 वर्ष की उम्र में किया. 2006 में यह प्रतिशत 52 तक पहुंच गया. इससे पता चलता है कि युवाओं की संस्कृ ति में बदलाव आ रहा है और उन्हें यौन संबंध बनाने के ज्यादा मौके मिल रहे हैं.
लेकिन नतीजों से एक और इशारा मिलता है: ज्यादातर पुरुष एक ‘‘अनुभवी’’ महिला से शादी के लिए हामी भरने से पहले दो बार सोचेंगे. यानी युवतियों को आगे भी ‘‘शुद्धता’’ (यानी कौमार्य) का बोझ ढोना पड़ेगा.
पिछले दशक में मर्दों ने जहां कुछ यौन वर्जनाओं को जारी रखा है, वहीं कुछ कमजोर भी हुई हैं. परिवार के सदस्यों के साथ यौन संबंध बनाने के सवाल पर जवाब पहले जैसे ही मिल रहे हैं. भारी बहुमत से ना. दूसरी ओर ग्रुप सेक्स में शामिल होने की बात करने वाले युवाओं का प्रतिशत पिछले वर्षों में बढ़ा है.
सेक्स की दुनिया के बदलते समूचे परिदृश्य में भी एक पहलू लगातार बना हुआ हैरू एक स्थायी संबंध बनाए रखने के मूल्य पर जोर. विवाहेतर संबंध आम हैं लेकिन पिछले वर्षों में इंडिया टुडे के सेक्स सर्वे में इसे स्वीकारने वाले मर्दों की संख्या इसे प्रतिबिंबित नहीं करती. वास्तव में 2012 के सर्वे में ‘‘आदर्श सेक्स पार्टनर्य के ग्रुप में ‘पति या पत्नी’ को सबसे ऊपर रखा गया है. शायद मर्दों को यह आभास है कि यौन जगत की सौदेबाजी एक परेशान करने वाली गतिविधि है और शॉर्ट टर्म में जो बात खुश करती है, वह शायद भविष्य में सुख न दे. जीवन के बारे में आमतौर पर जो सच होता है, काम-वासना की संस्कृति के संदर्भ में सच उससे अलग नहीं होता.

