अक्तूबर के उस दिन जब दिल्ली में सूरज ढलने को था, संसद भवन से चंद कदम दूर कॉन्सटीट्यूशन क्लब के अंदर पारा चढ़ रहा था. भ्रष्टाचार के एक नए अध्याय के उद्घघाटन का सीधा प्रसारण करने के लिए साठ टीवी कैमरे चौकस थे जबकि करीब 100 फोटोग्राफर चहलकदमी कर रहे थे. अचानक ‘मैं आम आदमी’ की छापे वाली गांधी टोपी पहने एक शख्स सबके बीच दिखा और अफरा-तफरी जैसा माहौल बन गया.
मंच के सामने लगे कैमरे बीच में बैठे उस दुबले-पतले और चश्मा पहने शख्स की तरफ घूम गए जो अपने आसपास मौजूद लोगों में शारीरिक कद में सबसे छोटा नजर आ रहा था. अरविंद केजरीवाल देश को संबोधित करने और तमाम नेताओं को अपने-अपने सुरक्षित कोनो में दुबकने के लिए मजबूर करने जा रहे थे.
इसका तो मानो सिलसिला बन गया है. 5 अक्तूबर को सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के बारे में उनके खुलासे ने देश की नब्ज पकड़ ली थी और तकरीबन सारे समाचार माध्यम इसे प्रसारित कर रहे थे. ठीक पांच दिन बाद केजरीवाल को कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया.
दरअसल आजतक चौनल ने एक खबर प्रसारित की जिसमें कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के एक ट्रस्ट में वित्तीय फर्जीवाड़े का खुलासा किया गया. हफ्तेभर बाद 17 अक्तूबर को केजरीवाल के निशाने पर थे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी. उनका उद्देश्य साफ था-मौजूदा मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियों के खोखलेपन को उजागर करो और दिखाओ कि आखिर क्यों सिर्फ उन्हीं की पार्टी राजनैतिक विकल्प दे सकती है.
केजरीवाल गरजे, ‘‘ये सारे मिलकर जनता को मूर्ख बना रहे हैं.’’ लेकिन गडकरी से जुड़े खुलासे में वाड्रा वाली धार नहीं थी, क्योंकि देश अब नाम लेकर लोगों को शर्मसार करने की रणनीति से वाकिफ हो चला है. जरूरी नहीं कि हर बार यह तरीका कारगर ही हो.
फिलहाल सियासत गर्म है और केजरीवाल ने बीजेपी को बचाव की मुद्रा में ला दिया है. गरीब किसानों की कीमत पर एक अमीर नेता के मुनाफा कमाने की उनकी कहानी के सार्वजनिक होने के कुछ मिनट बाद ही सुषमा स्वराज ने गडकरी का बचाव करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस की. ठीक उसी तरह जैसे वाड्रा को बचाने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया था.
आज की तारीख में नेताओं के बीच एक ही सवाल है: अगला कौन? केजरीवाल को अपना सियासी किला खड़ा करने के लिए जरूरी है कि वे सत्ता प्रतिष्ठान के मौजूदा अंगों को तहस-नहस कर डालें. उनकी निडरता ने अशोक खेमका जैसे आइएएस अफसरों को सरकार में मौजूद सड़ांध को सामने लाने की हिम्मत दी. अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने दूसरे नौकरशाहों का भी आह्वान किया कि वे उनके अभियान में शामिल हों.
उनके साथी प्रशांत भूषण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘‘नेता जानते हैं कि हमें चुप कराने का कोई तरीका नहीं है. हमें खरीदा भी नहीं जा सकता. और हमारी चमड़ी इतनी मोटी है कि वे चाहे कितना भी कीचड़ हम पर उछालें, वह साफ हो जाएगा. अण्णा हजारे ने हमें सिखाया था कि सार्वजनिक जीवन के पांच सिद्धांतों में एक यह भी है कि आप में अपमान को पीने की शक्ति होनी चाहिए.’’
केजरीवाल में देश का मध्यवर्ग एक ऐसा करिश्माई व्यक्तित्व देख रहा है जो किसी पर भी ‘कीचड़ उछाल सकता है.’ भारतीय राजस्व सेवा का यह पूर्व अधिकारी न तो पारंपरिक वक्ताओं जैसा है, न ही उसके पास हजारे जैसी नैतिक ताकत है. उसका सामान्य व्यक्तित्व ही उसे असामान्य बनाता है. जैसा कि टीम केजरीवाल के अघोषित सिद्धांतकार और राजनीतिशास्त्री योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘‘केजरीवाल की ऊर्जा जटिलताओं को सुलझाने, आम लोगों के साथ घुल-मिल जाने और उनकी ईमानदारी में निहित है.’’
यह ऊर्जा विशुद्ध ईमानदारी, दृढ़ आत्मविश्वास और मजबूत धारणाओं से आती है. केजरीवाल इन तमाम खूबियों की चमक पहले भी दिखा चुके हैं. आयकर विभाग में सात साल की नौकरी में सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार से उनका साबका पड़ चुका है. आइआइटी खडग़पुर में पढ़ाई के दौरान टाटा स्टील ने उन्हें प्लेसमेंट देने से मना कर दिया था. उन्होंने तब कंपनी के चेयरमैन के दफ्तर में फोन करके दोबारा इंटरव्यू कराने का दबाव बनाया. उनकी संकल्प शक्ति का फल मिला और नौकरी हाथ लग गई. सन् 2000 में उन्होंने आइआरएस की नौकरी से अवकाश लेकर परिवर्तन नाम का एक एनजीओ बनाया जिसने सूचना के अधिकार पर काम किया. इसके लिए उन्हें 2006 में मैगसेसे पुरस्कार मिला.
जुलाई के आखिरी हफ्ते में जब केजरीवाल ने हजारे से अलग होकर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय देने का फैसला किया तो वे दरअसल ऐसा करके सरकारी भ्रष्टाचार और सुस्ती के खिलाफ दस साल से ज्यादा पुराने एक अभियान को मजबूती दे रहे थे. यह तब की बात है जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बारे में हजारे को खास पता नहीं था. उन्होंने 25 जुलाई को हजारे का विरोध प्रदर्शन का पसंदीदा तरीका चुना. जनलोकपाल बिल के लिए आमरण अनशन का तरीका अपनाया और इसके माध्यम से अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित भी किया.
केजरीवाल को पहली कामयाबी वाड्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने से मिली. यह उनके लिए निर्णायक मोड़ था, क्योंकि हजारे और टीम अण्णा के कोर सदस्य किरण बेदी व संतोष हेगड़े ने राजनैतिक पार्टी बनाने के उनके फैसले के विरोध में उनका साथ छोड़ दिया था. वे निजी बातचीत में उन्हें ‘‘सनक’’ का शिकार बता रहे थे.
हजारे, बेदी और हेगड़े चाहते थे कि राष्ट्रव्यापी हो चुका यह आंदोलन अराजनैतिक ही बना रहे तथा जनलोकपाल और प्रत्याशियों को खारिज करने के अधिकार वाले एजेंडे पर ही काम करता रहे. दूसरी ओर केजरीवाल और उनके करीबी सहयोगी प्रशांत भूषण व शांति भूषण राजनीति के अखाड़े में कूदना चाहते थे. टीम अण्णा की टूट सौहार्दपूर्ण नहीं रही. बेदी कहती हैं, ‘‘मेरी दलील थी कि यह राष्ट्रीय आंदोलन है जो लोगों को जोड़ रहा है. ऐसी किसी चीज की ओर क्यों जाना, जो हमें बांटती हो?’’
टीम अण्णा की टूट के बाद के अध्याय पर बात करते हुए केजरीवाल गंभीर हो जाते हैं. वे कहते हैं, ‘‘लोग जाने क्या-क्या कह रहे थे. हर कोई हमें उपेक्षा की नजर से देख रहा था. हमारे कई समर्थक हमें अगस्त और सितंबर में छोड़कर चले गए. अब वे वापस आ रहे हैं.’’ उनके मुताबिक, सबसे खराब महीना अप्रैल का रहा जब उनके और उनकी टीम के खिलाफ साजिशें की गईं. वे किसी का नाम नहीं लेते. वे कहते हैं, ‘‘वह समय काफी मुश्किल था. मुझे नींद नहीं आती थी. वजन 10 किलो कम हो गया था. मैंने फिर छुट्टी ली और विपश्यना में चला गया.’’
केजरीवाल पिछले 15 साल से विपश्यना का अभ्यास कर रहे हैं. उनका कहना है कि मुश्किल हालात में यह उनके दिमाग को शांत रखती है. केजरीवाल के खुलासे पर राजनैतिक तबके ने जिस तरह खीझकर प्रतिक्रिया दी है, उससे उन्हें बल ही मिला है.
वाड्रा ने उनके आंदोलन को ‘‘मैगो पीपल’’ का आंदोलन करार दिया था. खुर्शीद ने उन्हें शरारती कह डाला. दिग्विजय सिंह ने आरोप लगा दिया कि केजरीवाल यह सब इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का सदस्य नहीं बनाया गया. बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें ‘‘कीचड़ उछालने वाला’’ कहा. निजी निंदा के अलावा और आलोचनाएं भी हैं.
केजरीवाल कहते हैं कि उन्हें राजनीति में आने को मजबूर किया गया है. वे इसलिए मोहभंग की स्थिति में हैं क्योंकि वे मानते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘सब मिलकर भ्रष्टाचार करते हैं. पार्टी मतभेद से इतर उनके हित समान हैं. उनके बीच अघोषित समझौता है कि व्यक्तियों पर हमला नहीं बोलना है.’’ वे कहते हैं कि उनकी टीम का प्रयास देश को वैकल्पिक राजनीति देना है. उनके मुताबिक, ‘‘हम यह नहीं कह रहे हैं कि ये नेता बुरे हैं और हम अच्छे. सिस्टम में ही गड़बड़ी है. हमें उसे बदलने के तरीके खोजने होंगे.’’
टीम केजरीवाल की राजनीति का इक्का दरअसल लगातार दिखने की रणनीति है जो चुनावों में धनबल की जगह लेगी. जैसा कि प्रशांत भूषण कहते हैं, ‘‘हमने राजनैतिक पार्टी बनाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि लोगों की राय हमें इतनी ही दूर तक पहुंचा सकती है. व्यक्ति कारगर होगा तभी लोग उसे वोट देंगे.’’
वे राजनैतिक तबके से मिल रही प्रतिक्रियाओं का आनंद ले रहे हैं. यादव कहते हैं, ‘‘हमने दिखा दिया कि एक छोटा-सा आदमी भी सच बोलकर उन्हें झकझोर सकता है.’’ टीम केजरीवाल का मानना है कि नेताओं के बनाए तरीकों यानी परिवार को निशाना न बनाने की रीति को तोड़कर उसने खेल का तरीका ही बदल डाला है.
भारतीय संविधान 26 नवंबर, 1949 को तैयार हुआ था और यह महज संयोग नहीं है कि केजरीवाल उसी दिन अपनी पार्टी के नाम की घोषणा करेंगे. नई पार्टी निश्चित तौर पर नेता विरोधी होगी. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के विजन डॉक्युमेंट के मुताबिक ‘स्वराज्य का वादा किया जाएगा जिसका अर्थ है, ‘‘जनता का शासन, नेताओं और बाबुओं का नहीं.’’ इस दस्तावेज में राजनैतिक दलों को जमकर लताड़ा गया है: ये पार्टियां ‘‘चुनावी मशीन हैं जिनका काम मतदाताओं को पकडऩा और पैसे से सत्ता पाने तथा सत्ता से ज्यादा पैसे बनाने के लिए चारे की तरह उनका इस्तेमाल करना है.’’
केजरीवाल समय के पहिये को घुमाकर वापस 1947 में ले जाना चाहते हैं और भारत सरकार को दोबारा परिभाषित करना चाहते हैं. उनके मुताबिक, स्वशासन का अर्थ ग्रामसभा और मुहल्लासभा का राज है. यह उनकी राजनीति का ‘‘आधार’’ है. राजनैतिक एजेंडा शासन के वास्तविक विकेंद्रीकरण के इर्द-गिर्द घूमता है जो भारतीय संविधान में पंचायती राज के संशोधनों में दर्ज प्रावधानों से कहीं आगे की चीज है. आइएसी के विजन डॉक्युमेंट के मुताबिक ‘अधिकतम संभव निर्णय्य गांव या मुहल्लों के स्तर पर लिए जाने होंगे. ये फैसले जनता लेगी, अफसर या विशेषज्ञ नहीं.
केजरीवाल का नजरिया यहां प्रत्यक्ष लोकतंत्र स्थापित करने का है. यह व्यवस्था सिर्फ स्विट्जरलैंड में है. वहां इसकी आलोचना अक्सर इसलिए की जाती है क्योंकि नीति निर्णय प्रक्रिया बहुत लचर है. भारत की ज्यादा आबादी के मद्देनजर यह समझना मुश्किल है कि प्रत्यक्ष लोकतंत्र यहां कैसे तीव्र और बेहतर निर्णय प्रक्रिया को जन्म देगा. ऐसा तंत्र भ्रष्टाचार को खत्म करने की बजाए उसे विकेंद्रित भी कर सकता है.
शहरी मध्यवर्ग के लिए केजरीवाल का आर्थिक एजेंडा डराने वाला है. उनका उद्देश्य उस संस्था को सिर के बल खड़ा कर देने का है जिसने उदारीकरण के दो दशकों में उसे समृद्ध बनाया है- मुक्त बाजार. आइएसी का विजन डॉक्युमेंट जो कि पार्टी के राजनैतिक एजेंडे का आधार होगा, अपनी सोच में बिल्कुल साफ है: विकास ‘2जी के तर्क’ या ‘मुक्त बाजार’ की ताकत से निर्देशित नहीं हो सकता.
दस्तावेज के अनुसार, विकास को ‘समता’ और ‘आखिरी आदमी की आवश्यकता’ के सिद्धांत से निर्देशित होना होगा. यह दस्तावेज हमें छठे दशक के अंत और सातवें दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी के पतनशील समाजवाद वाले दिनों की ओर ले जाता है. भारत का अपना अनुभव कहता है कि यह मॉडल कारगर नहीं है. लेकिन विजन डॉक्युमेंट के कुछ हिस्सों को व्यापक स्वीकार्यता मिल सकती है.
स्वतंत्र जनलोकपाल का गठन एक ऐसा ही प्रस्ताव है. देश में जैसा भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बना है, उसमें पुलिस और न्यायपालिका सुधार का एजेंडा भी मंजूर हो सकता है. इसी तरह सर्व शिक्षा और सर्व स्वास्थ्य सेवा का एजेंडा भी सबको स्वीकार्य हो सकता है. लेकिन सवाल है कि क्या ये प्रस्ताव विकेंद्रीकृत और सर्वसमावेशी गांधीवादी राजनीति तथा मार्क्सवादी अर्थशास्त्र के क्रांतिकारी दृष्टिकोण के पार जाकर अपील कर पाएंगे? केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत बनाने में कामयाब हो चुके हैं. लेकिन पूरे देश को इस बात के लिए राजी करना आसान नहीं होगा कि वे ही वास्तविक राजनैतिक विकल्प दे सकते हैं.
आइएसी और उसके बाद आने वाली राजनैतिक पार्टी के साथ एक समस्या है. वह यह कि हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह केजरीवाल का आंदोलन भी दिल्ली केंद्रित है. इसे काफी हद तक शहरी इलाकों में ही समर्थन हासिल है, जहां यूपीए के भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोश है. एक ऐसी भविष्य की राजनैतिक पार्टी के लिए यह बात ठीक नहीं होगी जो कांग्रेस और बीजेपी समेत सभी मौजूदा दलों की जगह लेना चाहती हो.
राष्ट्रीय पार्टी बनाने का काम कठिन है. केजरीवाल को बीजेपी से सबक लेना चाहिए. 1980 में इसकी स्थापना के तीन दशक से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी पार्टी 127 साल पुरानी कांग्रेस की तरह राष्ट्रव्यापी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है. सियासत में इतिहास अहम होता है. कांग्रेस के पास उम्र का तजुर्बा और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले नेताओं की विरासत भी है.
टीम केजरीवाल इन चुनौतियों से वाकिफ है. केजरीवाल और भूषण जहां भ्रष्टाचार को सामने लाने पर खुद को केंद्रित किए हुए हैं, वहीं यादव को इस टीम की राजनैतिक पहुंच को बढ़ाने का काम सौंपा गया है. 15 अक्तूबर को यादव हैदराबाद आकर कृषि मजदूरों की यूनियन आपवू से मिले थे. वे कहते हैं, ‘‘मेरा काम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और मौजूदा जनांदोलनों के बीच एक सेतु की भूमिका निभाना है.’’
उन्होंने महाराष्ट्र में आदिवासियों के संगठन लोक संघर्ष मोर्चा के साथ भी बात की है. वे सर्वोदय कर्नाटक को अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं, जिसे वे ‘‘किसानों और दलितों का एक अनूठा गठजोड़’’ करार देते हैं. उन्होंने तमिलनाडु के महिला मोर्चे की ओर हाथ बढ़ाया है.
उद्देश्य साफ है. टीम केजरीवाल अलग-अलग स्थानों पर खास तबकों तक पहुंच बना रही है ताकि भविष्य की पार्टी के आधार को आक्रोशित शहरी मध्यवर्ग से कहीं ज्यादा विस्तारित किया जा सके. टीम समाजवादी जन परिषद के साथ बातचीत कर रही है जो आठ राज्यों में मौजूद है. इसके अलावा जम्मू, पंजाब और राजस्थान में काम करने वाली इंडिपेंडेंट डेमोक्रेटिक पार्टी और उत्तराखंड की जनवाहिनी के साथ भी बातचीत जारी है. यादव विकल्प तैयार करने में आने वाली कठिनाई से इनकार नहीं करते, ‘‘हमने 2004 और 2009 में लोक राजनीति मंच के साथ मिलकर कोशिश की थी. यह परवान न चढ़ सका.’’
लेकिन केजरीवाल के लिए यह भविष्य की लड़ाई है. जब दिल्ली में 2 अक्तूबर को उन्होंने नया राजनैतिक दल बनाने का एलान किया, तब उन्होंने कहा था, ‘‘मुझे अपने बच्चों के लिए लडऩा है. मैं नहीं लड़ूं तो वे मुझे कभी माफ नहीं करेंगे. मैं हार गया तो कम-से-कम वे यह जानेंगे कि मैंने कोशिश की थी और वे मेरी लड़ाई को आगे ले जा सकेंगे.’’ गाजियाबाद के वैशाली में स्थित तीन बेडरूम के एक फ्लैट में जब भीड़ तालियां बजा रही थी, उनका 12 साल का लड़का पुलकित अपने सिर को हाथ में पकड़कर पूछ रहा था, ‘‘पापा क्या कह रहे हैं? मैं यह सब नहीं करना चाहता. मैं तो क्रिकेट खेलना चाहता हूं.’’
इस घटना को सुनने पर केजरीवाल मुस्कराते हैं, लेकिन दोबारा उनके चेहरे पर संकल्प का तनाव आ जाता है. ‘‘समूचे ढांचे को तोड़कर शुरू से बनाने की जरूरत है. लोगों को उनकी ताकत का एहसास कराना होगा.’’ वे चाहते हैं कि उनकी राजनीति आंदोलन की शक्ल में रहे. वे कहते हैं, ‘‘हम पैसे नहीं खर्च करेंगे. फिर हमारे और दूसरे दलों के बीच फर्क क्या रह जाएगा? लोगों ने यदि समर्थन नहीं दिया तो हम पीछे हट जाएंगे.’’
केजरीवाल बताते हैं कि पिछले डेढ़ साल में आइएसी ने तीन करोड़ रु. खर्च किए हैं. अधिकांश राशि एसएमएस भेजने पर खर्च हुई है. वे कहते हैं, ‘‘हमारे एसएमएस पाने वाले दो करोड़ सदस्य हैं.’’ अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश को उन्हें 2014 की चुनावी कामयाबी में तब्दील करना है, तो उन्हें सदस्यों की संख्या बढ़ाने की जरूरत होगी.
-भावना विज अरोड़ा और प्रिया सहगल

