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अरविंद केजरीवाल: जिद्दी योद्धा की निजी जिंदगी

परिवार के लोगों को अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा पर नाज है.

अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल
अपडेटेड 11 नवंबर , 2012

बड़े होकर क्या अपने पापा की तरह तुम भी आंदोलन करोगे, यह सवाल पूछे जाने पर अरविंद केजरीवाल के 11 वर्षीय बेटे पुलकित का जवाब आता है, ‘नहीं.’’ आखिर ऐसा क्यों? ‘‘मेरे पापा ही काफी हैं. पापा में है दम.’’

इस जवाब में छिपा है आज के दौर के एक दुस्साहसी नायक में लोगों का भरोसा. वे लोग जो अरविंद के साथ जुड़े और वे भी जो उन्हें महान मानने से इनकार करते हैं. लेकिन रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े उनके खुलासों से इतना जरूर मानते हैं कि यह आदमी किसी से डरता नहीं है.Arvind Kejriwal Family

क्या वह मां डरती है जिसने कभी नहीं सोचा था कि बेटा आइआरएस की नौकरी छोड़कर आंदोलन की राह पर चल देगा. ‘‘हां, कभी-कभी तो धमकियां सुनने के बाद रात भर नींद उड़ जाती है.’’ बूढ़े पिता हाथों में अखबार लिए अरविंद की तस्वीरें निहारते रहते हैं.

मेन पेज पर कभी अरविंद की बड़ी-सी तस्वीर मनमोहन सिंह के साथ, कभी वाड्रा के साथ तो कभी सलमान खुर्शीद या नितिन गडकरी के साथ. उनकी चिंता कभी यह नहीं रही कि यह चकाचौंध कहीं बेटे को बदल न दे, दूर न कर दे. उन्हें बस इतनी शिकायत है कि अरविंद जब डायबिटीज के बावजूद भूखे-प्यासे अनशन पर बैठते हैं तो सरकार के मंत्री उन पर निजी हमले क्यों करते हैं. अरविंद की 16 साल की बेटी हर्षिता मानती है कि उसके पापा की लड़ाई सच्ची है.

अरविंद को आज भी याद है 1992 की वह सुबह. सर्दी वक्त से पहले आ गई थी. यूपीएससी का रिजल्ट आ गया था. 42 पन्नों की सूची में अपना नाम पाकर कई लोगों ने इसे अपनी जिंदगीभर की मेहनत का इनाम माना था. लेकिन 24 वर्षीय अरविंद के लिए वह सिर्फ अपने सपनों के शिखर तक पहुंचने की सीढ़ी थी. अगर अपने साथियों की तरह अरविंद ने भी इसे मंजिल मान लिया होता तो आज उन्हें कौन जानता. अरविंद को भी  यह याद नहीं कि ये सब कुछ कैसे हो गया. आंदोलन की राह धीरे-धीरे आकार लेती चली गई. अण्णा का साथ मिला. मत जुड़े तो मतभेदों ने भी कई बार घेरा. 

सफर के इस मुकाम में पत्नी सुनीता सबसे बड़ी ताकत है. सुनीता की नौकरी न होती तो अपनी नौकरी छोडऩे की हिम्मत कहां से कर पाते अरविंद. अपना जीवनसाथी खुद चुना था अरविंद ने. फिर फोन पर बताया था मां को. सुनीता भी आइआरएस हैं. वे दिल्ली में ही अडिशनल कमिश्नर हैं इनकम टैक्स विभाग में और अपने बच्चों को हर तरह की चकाचौंध से दूर ही रखना चाहती हैं. 

सुबह से शाम तक परिवर्तन के दफ्तर में अरविंद केजरीवाल ऐसे लोगों से मिलते रहते हैं जिनके पास नेताओं के भ्रष्टाचार के सबूत हैं. इसी आपाधापी में अगले दिन की मीटिंग के फैसले लिए जाते हैं.

रात को एक बार फिर घर पहुंचकर लैपटॉप पर कुछ मेल, कुछ शिकायतें, कुछ खुलासों के आंकड़ों के साथ दिन का अंत होता है. वर्षों की इस यात्रा में अरविंद न जाने कितने घरों तक पहुंचे हैं. आगे की राह कैसी होगी, इसे अरविंद भी नहीं जानते, लेकिन इतना जरूर पता है कि संघर्ष की इन्हीं संभावनाओं से नए भारत की तस्वीर निकलेगी और कारवां बनता जाएगा.

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