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दामाद ने किया दामन दागदार

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का चमत्कारिक कारोबारी उभार सत्ताधारी कांग्रेस के लिए एक खतरनाक बोझ साबित हो सकता है, जो पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों से हलकान है.

अपडेटेड 3 दिसंबर , 2012

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का चमत्कारिक कारोबारी उभार सत्ताधारी कांग्रेस के लिए एक खतरनाक बोझ साबित हो सकता है, जो पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों से हलकान है.

वर्ष 2007 में रॉबर्ट वाड्रा कहने को तो कारोबारी थे और पीतल का सामान एक्सपोर्ट करते थे लेकिन उनका ज्यादा माल एक्सपोर्ट नहीं होता था. फिर उनकी दुनिया बदल गई. उनकी पूंजी उनके संपर्क यानी कॉन्टेक्ट थे. उन्होंने जैसी सुपरफास्ट कामयाबी हासिल की वह सत्ता के कंधों पर सवारी करके ही मुमकिन है. उन्होंने तीन कंपनियां स्थापित कीं जिनमें अपनी मां मॉरीन को डायरेक्टर बनाया. एक कंपनी ब्ल्यू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लि. नाम की बनाई गई जिसका उद्देश्य था—किराए पर विमान लेने और उसकी सेवा देने का कारोबार. हालांकि अभी तक इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि इस कंपनी ने वास्तव में कोई प्लेन किराए किराए पर लिया है.

स्काइ लाइट हॉस्पिटेलिटी प्रा.लि. स्थापना 'होटल कारोबार’ को चलाने के लिए किया गया और स्काइ लाइट रियल्टी की स्थापना रियल एस्टेट कारोबार में उतरने के लिए की गई. लेकिन उनकी मुख्य कंपनी आर्टेक्स ही है, जिसकी स्थापना 1997 में की गई थी. उसी साल उनकी प्रियंका गांधी से शादी हुई थी.

 यह कारोबार मुनाफे वाला था, लेकिन बहुत ज्यादा फायदे वाला नहीं. वाड्रा तेजी से आगे बढऩा चाहते थे और बहुत दूर जाना चाहते थे. जल्दी ही उन्हें मौका मिल गया. 2008 में स्काइ लाइट हॉस्पिटेलिटी ने मानेसर में डीएलएफ के लांच हुए आवासीय प्रोजेक्ट प्राइमस से सटा 3.5 एकड़ का एक प्लॉट 15.38 करोड़ रु. में खरीदा. इस खरीद के लिए ज्यादातर पैसा दो स्रोतों से ही हासिल किया गया था: 2007-08 में सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन बैंक से मिला 7.94 करोड़ रु. का ओवरड्राफ्ट और वाड्रा की अपनी ही कंपनी आर्टेक्स से लिया गया 4.45 करोड़ रु. का लोन. स्काइ लाइट का पेड अप इक्विटी कैपिटल (चुकता शेयर पूंजी) सिर्फ  5 लाख रु. था और उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं था, ऐसे में कॉर्पोरेशन बैंक से उसे इतनी बड़ी राशि का ओवरड्राफ्ट मिलना गहन जांच का विषय है.

मीडिया में बैंक के हवाले से कहा गया है कि वह ओवरड्राफ्ट की शर्तों की जांच कर रहा है. बैंक को इसका जवाब देना होगा कि क्या वाड्रा ने 7.94 करोड़ रु. के ओवरड्राफ्ट के बदले कोई जमानत दी थी.

मानेसर की प्रॉपर्टी खरीदने के एक साल के भीतर ही 2008-09 में वाड्रा ने यह जमीन देश के सबसे बड़े प्रॉपर्टी डेवलपर डीएलएफ  को 58 करोड़ रु. की पेशगी के बदले बेच दी जो उन्हें अगले चार साल में किस्त में दिया गया (देखें चार्ट).  इस तरह वाड्रा को 42.61 करोड़ रु. का भारी मुनाफा हुआ. सिर्फ एक साल में जमीन के मूल्य में 300 फीसदी की बढ़त असामान्य बात है.

इसके जवाब में डीएलएफ ने कहा है कि गुडग़ांव में प्रॉपर्टी की कीमतें इतना बढ़ जाना कोई असाधारण बात नहीं है. इस सौदे के साथ ही वाड्रा ने दिग्गजों की दुनिया में कदम रख दिया, उनमें सबसे बड़ी थी 14,500 करोड़ रु. के नेटवर्थ वाली कंपनी डीएलएफ. 2008-2009 के मानेसर के एक सुखद सौदे ने वाड्रा के लिए कई हाइ एंड अपार्टमेंट में निवेश का रास्ता खोल दिया, जिसमें साकेत कोर्टयार्ड हॉस्पिटेलिटी में 31.7 करोड़ रु. में ली गई 50 फीसदी हिस्सेदारी भी शामिल थी. यह कंपनी 114 बेड वाले हिल्टन गार्डेन इन होटल की मालिक है जो दक्षिण दिल्ली में डीएलएफ की जमीन पर बनाया गया है.

 क्या वाड्रा के लिए यह संभव था कि सिर्फ एक सौदे में हुई 42.62 करोड़ रु. की कमाई से वे अपने खाते में इतनी सारी प्रॉपर्टी जमा कर पाते? उनकी कंपनियों के बही-खातों से पता चलता है कि यह रकम ही उनके लिए फंड का सबसे बड़ा स्रोत थी. खासकर सस्ती कीमतों पर जमीन और प्रॉपर्टी खरीदने के अपने इस कौशल का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद ने दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश-II में सिर्फ 1.2 करोड़ रु. में एक प्लॉट खरीद लिया. उनकी कंपनी स्काइ लाइट रियल्टी ने सिर्फ 5 करोड़ रु. में गुडग़ांव में 600 फ्लैट वाले कॉम्प्लेक्स डीएलएफ मैगनोलियाज में 6,000 वर्ग फुट के सात फ्लैट खरीदे और एक साल के भीतर ही उनमें से पांच फ्लैट वापस डीएलएफ को बेच दिए.

उनकी कंपनी ने दिल्ली के शिवाजी नगर स्थित डीएलएफ एस्टेट्स कैपिटल ग्रीन कॉम्प्लेक्स में 1,000 से 1,400 वर्ग फुट वाले 15 फ्लैट 5 करोड़ रु. में खरीदे. यह सौदा अप्रैल, 2009 में उस समय हुआ था जब 2,856 फ्लैट वाला यह प्रोजेक्ट लांच किया गया था. उन्होंने 2008 में 10.4 करोड़ रु. में गुडग़ांव स्थित 10,000 वर्ग फुट वाला एक्सक्लूसिव अरालियाज फ्लैट भी खरीदा. इस तरह के सिर्फ 234 फ्लैट बनाए गए थे.

वाड्रा के रियल एस्टेट साम्राज्य में असल में 'अनरियल’ (अस्वाभाविक) विस्तार होता दिखता है. सिर्फ तीन साल के भीतर उनके पोर्टफोलियो में 200 करोड़ रु. की प्रॉपर्टी हो गई. सच तो यह है कि 2007-08 में गठन के बाद पांच कंपनियों के उनके जटिल जाल से प्रॉपटी खरीद-फरोख्त या लोन के लेने-देने के अलावा और कोई कारोबार नहीं किया गया है.
 
वाड्रा की कंपनी के ही दस्तावेजों को देखें तो ऐसा लगता है कि वे या तो बहुत ही भाग्यशाली हैं या अंतर्यामी. 2007 में डीएलएफ ने 5 लाख रु. के पेड अप कैपिटल के साथ एक सहायक कंपनी (सब्सिडियरी) डीएलएफ एसईजेड होल्डिंग्स की स्थापना की. उसी साल वाड्रा ने एक कंपनी नॉर्थ इंडिया आइटी पाक्र्स प्रा.लि. की स्थापना की थी जिसने अक्तूबर, 2008 में 2.5 लाख रु. में डीएलएफ एसईजेड होल्डिंग्स की 50 फीसदी  हिस्सेदारी खरीद ली, जबकि वाड्रा की एसईजेड में कोई विशेषज्ञता नहीं थी. डीएलएफ के मुताबिक, इसके एक साल के बाद ग्लोबल में मंदी आ गई और वाड्रा ने फिर अपनी हिस्सेदारी उसी कीमत पर डीएलएफ को बेच दी. इस प्रकार डीएलएफ  के दावे के मुताबिक, इसमें न तो कोई मुनाफा हुआ और न ही घाटा.

 2008 में वाड्रा ने फरीदाबाद में 100 एकड़ जमीन की ओर डीएलएफ का ध्यान आकर्षित किया. डीएलएफ ने यह जमीन खरीदने के लिए वाड्रा की कंपनी को 15 करोड़ रु. का कर्ज दिया, लेकिन स्वामित्व का दस्तावेज संदिग्ध पाए जाने के बाद इस सौदे को रोकने की बात कही गई. वाड्रा कर्ज वापस कर एक घटिया सौदे से बच गए.

लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि अपने रियल एस्टेट सौदों में डीएलएफ ने वाड्रा को साझेदार क्यों बनाया? क्या इसलिए कि देश के 'प्रथम परिवार के दामाद’ होने की वाड्रा की हैसियत से डीएलएफ को कारोबारी फायदा मिल सकता था? या सिर्फ इसलिए कि वाड्रा और के.पी. सिंह  (डीएलएफ के मालिक) के आपस में पारिवारिक संबंध हैं? जब इकोनॉमिक टाइम्स ने मार्च, 2011 में 'रियल एस्टेट कारोबार में वाड्रा के गुपचुप प्रवेश' के बारे में लिखा था तो उस पर वाड्रा का यह बयान आया था, 'मेरी डीएलएफ के साथ अच्छी निभती है. हमारे बच्चे दोस्त हैं, हम भी दोस्त हैं. वे मंजे हुए कारोबारी हैं. वे बेवकूफ नहीं हैं. उन्हें अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए मेरी जरूरत नहीं है. वे वर्षों से अपना कारोबार कर रहे हैं.'


एक्टिविस्ट से नेता बने अरविंद केजरीवाल ने 5 अक्तूबर को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह खुलासा किया कि वाड्रा की उद्यम क्षमता किस हद तक बढ़ चुकी है. उन्होंने कहा कि वाड्रा और डीएलएफ के बीच एक-दूसरे को फायदा पहुंचाने वाली साझेदारी थी. उनके मुताबिक, वाड्रा को बहुत कम दर पर कर्ज और प्रॉपर्टी मिली और इसके बदले में डीएलएफ को हरियाणा की कांग्रेस सरकार की कृपा हासिल हुई. लेकिन डीएलएफ और हरियाणा सरकार दोनों ने इसका खंडन किया है. खंडन के बावजूद डीएलएफ के शेयर केजरीवाल के खुलासे के तीन दिन के भीतर ही 12 फीसदी तक लुढ़क गए. पहले से ही भारी कर्ज के बोझ से परेशान डीएलएफ ने ऐसी बुरी खबरों के बारे में तो सोचा भी नहीं होगा. मार्च, 2012 तक कंपनी के कुल नेटवर्थ 14,500 करोड़ रु. के मुकाबले उसकी देनदारी 26,470 करोड़ रु. की थी.

केजरीवाल के आरोपों का शोर कांग्रेस के नए दौर के सुधार कथाओं के ईद-गिर्द सुलगने लगी सकारात्मक फुलझड़ियों को बुझ देने के लिए काफी था. पार्टी आंख मूंदकर वाड्रा के साथ खड़ी हो गई. उसके वरिष्ठ नेता टीवी चैनलों पर प्रथम परिवार के प्रति वफादारी साबित करने को कुछ इस तरह मजबूर हुए मानो वे इस परिवार के लिए अपने खून का अंतिम कतरा तक दे देंगे. कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, 'सोनिया गांधी मेरी नेता हैं और मैं अंतिम सांस तक उनका बचाव करूंगा.'

हालत यह है कि अब खुर्शीद को खुद अपने नेतृत्व वाले ट्रस्ट में कई अनैतिक कार्यों के बारे में हुए खुलासों पर बचाव करना पड़ रहा है. खुर्शीद के ट्रस्ट पर आरोप है कि उसने शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए मिले धन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे हड़प लिया. उनकी मंत्रिमंडल सहयोगी जयंती नटराजन उस समय एक टीवी स्टुडियो में थीं, जब खुर्शीद का भावनाओं में डूबा हुआ बयान आया. देर न करते हुए नटराजन ने भी घोषणा कर दी, 'सोनिया जी हमारी अध्यक्ष हैं और हम उनके लिए अपनी जान देने को तैयार हैं.'

चापलूसी की होड़ का यह शो ही मानो काफी नहीं था. केजरीवाल इस उन्माद में और घी डालने के मूड में थे. उन्होने कौशांबी, गाजियाबाद स्थित अपने आवास पर 8 अक्टूबर को इंडिया टुडे से कहा, 'लोग वाड्रा के संदिग्ध कारोबार की बात कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल के बीच एक अलिखित समझौता हो गया है कि वे एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले नहीं करेंगे. यह भी एक तरह की मिलीभगत वाला भ्रष्टाचार है.'

क्या वाड्रा या डीएलएफ दोषी हैं? वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी का कहना है कि सजा नहीं हो सकती. उन्होंने कहा, 'न तो वाड्रा और न ही डीएलएफ ने किसी को धोखा दिया है. भरोसे को तोडऩा जैसा कोई अपराध भी नहीं है. यह दो निजी पक्षों के बीच निजी लेन-देन की बात है. इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ऐक्ट 1988 भी लागू नहीं हो सकता क्योंकि दोनों में से कोई भी किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है.'

जहां तक इनकम टैक्स ऐक्ट के तहत जांच की बात है, तुलसी का कहना है कि यह तब ही हो सकता है कि जब यह साबित हो जाए कि वाड्रा ने जो भी प्रॉपर्टी या जमीन खरीदी है उसके लिए कीमत बाजार मूल्य से बहुत कम दी गई है. 'इसके लिए यह देखना पड़ेगा कि फ्लैट की बुकिंग कब की गई और उस समय बिल्डर किस कीमत पर फ्लैट ऑफर कर रहा था. यदि इसमें कोई असंगति पाई गई तो ही कोई केस बन पाएगा.'

केजरीवाल ने 9 अक्टूबर को वाड्रा के साम्राज्य और डीएलएफ  के साथ उनके सौदों के बारे में और विवरण दिए. डीएलएफ देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी है जिसके पास देशभर में 34 करोड़ वर्ग फुट की डेवलप करने लायक जमीन है. उन्होंने आरोप लगाया कि हरियाणा सरकार ने वर्ष 2007 में डीएलएफ को गुडग़ांव में 30 एकड़ की जमीन पर एसईजेड बनाने की इजाजत दी, जबकि यह जमीन पहले एक अस्पताल बनाने के लिए अधिग्रहित की गई थी.

जब सरकार के इस निर्णय को पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट में चुनौती दी गई तो कोर्ट को लगा कि हरियाणा सरकार और डीएलएफ के बीच एक गठजोड़ चल रहा है. राज्य सरकार ने 10 अक्टूबर को जारी एक बयान में दावा किया है कि एसईजेड बनाने की इजाजत 'कानून की प्रक्रिया’ के तहत दी गई है. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. डीएलएफ को गुडग़ांव में 350 एकड़ जमीन मिलने के एक और मामले में फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए केजरीवाल ने कहा कि इस मामले में बोली लगाने वाली दो कंपनियों (यूनिटेक और कंट्री हाइट्स) को तकनीकी आधार पर अयोग्य ठहराने के लिए अंतिम समय में नियमों में फेरबदल कर दिया गया.

लेकिन डीएलएफ के एक प्रवक्ता ने कहा कि उक्त जमीन 'अंतरराष्ट्रीय बिडिंग’ के माध्यम से कंपनी को मिली थी और फिलहाल यह मामला पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट के समक्ष है. हरियाणा सरकार ने सफाई दी है कि समूची बिडिंग प्रक्रिया इस बारे में प्रकाशित विज्ञापन के अनुरूप ही चलाई गई थी. एचएसआइडीसी के वरिष्ठ अधिकारी इस बात से इनकार करते हैं कि डीएलएफ को फायदा पहुंचाने के लिए बिड खुलने से पहले नियमों में फेरबदल किया गया. अधिकारियों ने यह बात भी कही कि न तो यूनिटेक और न ही कंट्री हाइट्स ने इस आवंटन में डीएलएफ  की तरफदारी का आरोप लगाया था.
 
वर्ष 1989 में बोफोर्स के बाद पहली बार भ्रष्टाचार सोनिया गांधी के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. हाल के दो घोटालों से सोनिया गांधी के लिए दूरी बनाने की कुछ गुंजाइश थी. कॉमनवेल्थ खेलों के घोटाले में सुरेश कलमाडी को कुर्बान किया जा सकता था. इसी तरह 2जी घोटाले में डीएमके शामिल था, इसलिए ए. राजा को बर्बाद कर दिया गया. लेकिन कोल-गेट के साथ कांग्रेस पर कालिख लगने लगी क्योंकि यह पूरी तरह से कांग्रेस की करतूत थी.

विडंबना है कि वाड्रा को 3.5 एकड़ के प्लॉट खरीदने के लिए जिस तरह से कर्ज दिया गया उसी तरह के एक मामले से राजा मुश्किल में फंस गए थे, जब यह बात सामने आई थी कि डीबी रियल्टी ने वर्ष 2008-09 में डीएमके के कलैगनर टीवी को 200 करोड़ रु. का अनसेक्योर्ड (बिना किसी जमानत के) लोन दिया था. अब जब जनता की भावना पूरी तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ  हो चुकी है, हमला पार्टी के विभिन्न स्तरों से होता हुआ अब उसके केंद्र तक पहुंच गया है. गांधी परिवार के एक सदस्य पर अपनी ताकत का दुरुपयोग कर पैसा बनाने का आरोप लगा है.

वाड्रा के प्रभाव का असर ही है कि अब इस प्रथम परिवार की गतिविधियों के बारे में किसी तरह की जानकारी न देने का नियम भी खत्म हो रहा है. लेखिका मधु किश्वर ने 6 अक्तूबर को इस बारे में काफी गुस्से से भरा ब्लॉग लिखा कि जब उन्होंने राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के बारे में आरटीआइ से जानकारी मांगी थी तो इस बारे में टाल-मटोल कर दिया गया. केजरीवाल ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि अब सार्वजनिक जीवन में कोई भी इतना पवित्र नहीं है, जिस पर उंगली न उठाई जा सके.

वाड्रा ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उनके कारोबारी तरीकों पर किसी 'बनाना रिपब्लिक’ में सवाल उठाए जा सकते हैं (उन्होंने आलोचनाओं के जवाब में फेसबुक पर भारत को बनाना रिपब्लिक कहा था). 'मैंगो पीपुल’ (आम आदमी) का उनके द्वारा उपहास उड़ाने पर लोग काफी गुस्से में प्रतिक्रिया जताने लगे और उन्हें अपना फेसबुक एकाउंट बंद करने पर मजबूर होना पड़ा. उन्होंने यह आरोप लगाया कि भारत में लोग मजाक भी नहीं समझ पाते हैं. इसके पहले उन्होंने एक भावुक जवाब देने की कोशिश की थी. उन्होंने अपने रहस्मय संदेश में कहा था, ''मैं जिनसे भी प्यार करता था उन लोगों को खो चुका  हूं इससे बुरा क्या हो सकता है?'

वास्तव में यह बात तो है. उनके कई करीबी परिजनों की अस्वाभाविक मौत हुई है. कुछ अप्रैल, 2009 में लोकसभा चुनाव के माहौल में उनके पिता राजिंदर यूसुफ सराय के एक मोटेल में मृत पाए गए. बताया जाता है कि उनके भाई रिचर्ड ने सितंबर, 2003 में मुरादाबाद स्थित पुश्तैनी मकान में आत्महत्या कर ली थी. वाड्रा की बहन मिशेल की अप्रैल, 2001 में दिल्ली-जयपुर हाइवे पर कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. उनकी स्कॉटिश मूल की एंग्लो-इंडियन मां मॉरीन अब भी उनके पांचों कंपनियों में डायरेक्टर हैं.

बताया जाता है कि प्रियंका से शादी के बाद वाड्रा के अपने परिवार से रिश्ते खट्टे हो गए थे और उन्होंने जनवरी, 2002 में सार्वजनिक तौर पर एक कानूनी नोटिस जारी कर खुद को अपने पिता और भाई से अलग कर लिया था. केजरीवाल के खुलासे के बाद इस बारे में कयास लगाए जाने लगे कि वाड्रा कहां हैं, उनके आस्ट्रेलिया से लेकर दुबई तक में होने की बात कही जा रही थी. उनके एक करीबी सहयोगी मनोज अरोड़ा ने 9 अक्टूबर को इंडिया टुडे को बताया, 'आज की बात करें तो वे यहीं भारत में हैं.' अरोड़ा ने यह भी बताया कि वाड्रा 268, सुखदेव विहार स्थित अपने ऑफिस में हैं. वाड्रा की पांचों कंपनियों के लिए यही पता दर्ज है. अरोड़ा ने उल्टे सवाल किया, 'वाड्रा कोई बयान नहीं देने जा रहे. आखिर कहने के लिए बचा क्या है?'

वाड्रा के अन्य कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ रिश्तों पर अभी केजरीवाल ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन कांग्रेसियों को भी अब जिज्ञासा होने लगी है: क्या यह सिर्फ शुरुआत है, इसका अंत कितना बुरा होगा? कांग्रेस के एक सांसद कहते हैं, ''इन खुलासों में कोई नई बात नहीं है. लेकिन इससे सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार की धारणा और मजबूत होगी.' इंडिया टुडे ने एक आवरण कथा छापकर इस बारे में बने चुप्पीभरे षड्यंत्र को तोड़ा था, जब वाड्रा ने उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान के बीच अपनी पत्नी और अपने लिए राजनैतिक जगह की मांग की थी. कांग्रेस को डर है कि वाड्रा बम का तात्कालिक असर गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं पर पड़ सकता है.

इस मामले में बीजेपी ने लंबे समय से खामोशी ओढ़ रखी थी लेकिन अरुण जेटली ने खामोशी तोड़ते हुए कहा कि यूपीए सरकार ''थम परिवार को बचाने के लिए कूद पड़ी है.' उन्होंने कहा, 'मौजूदा संकट का इस्तेमाल ईमानदारी को बढ़ावा देने की बजाए वफादारी दिखाने के लिए किया जा रहा है.' वैसे, इस तथ्य से कांग्रेस को थोड़ी राहत मिली है कि बीजेपी ने इस पारिवारिक स्कैंडल को जोर-शोर से नहीं उठाया है. असल में बीजेपी की अपनी अलग समस्याएं हैं. वह नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार को उजागर करने का श्रेय केजरीवाल को मिले, खासकर उसे यह भी डर है कि केजरीवाल खुद उसके एक नेता को निशाना बना सकते हैं. कांग्रेस यह लड़ाई पूरी तरह अपनी नाकामियों से हार रही है. केजरीवाल द्वारा हर कुछ दिन के बाद नया खुलासा कर सुर्खियों में बने रहने की कोशिश पर सवाल उठाकर वे असल में बस शिकायत करते ही रह जा रहे हैं.

केजरीवाल का कहना है कि वह पीछे हटने वाले नहीं हैं. उन्होंने कहा, 'मुझे इन सबकी पुष्टि करनी होगी और उनकी क्रॉस चेकिंग करनी होगी. इसके बाद ही मैं उन्हें सार्वजनिक कर सकता हूं. आखिर यह मेरी विश्वसनीयता का सवाल है.'

कांग्रेस इसी विश्वसनीयता को नष्ट होते देखना चाहती है. कांग्रेस के रणनीतिकार अहमद पटेल को 5 अक्टूबर को ही पता चल गया था कि केजरीवाल वाड्रा को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं. टीम केजरीवाल ने इस बारे में संकेत दे दिया था कि वे 'कांग्रेस से जुड़े किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में खुलासा करने जा रहे हैं जिनके पास कोई राजनैतिक पद नहीं है.'

पटेल ने सोनिया और राहुल से बात की. उस दिन राहुल कश्मीर में थे. पटेल, सोनिया, राहुल, प्रियंका और राहुल के सहयोगी कनिष्क सिंह ने मिलकर पार्टी के लिए बचाव की रणनीति तैयार की. यह निर्णय लिया गया कि परिवार का कोई भी व्यक्ति प्रतिक्रिया नहीं देगा. इसकी जगह पार्टी वाड्रा का आक्रामक तरीके से बचाव करेगी और यह दावा किया जाएगा कि यह परोक्ष रूप से सोनिया पर हमला है.

इसके मुताबिक, पटेल ने पार्टी के बचाव के लिए नेताओं के नाम तय किए: सलमान खुर्शीद, संसदीय कार्यमंत्री राजीव शुक्ला और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी. उन्होंने पार्टी के मीडिया सेल के प्रभारी जनार्दन द्विवेदी से भी बात की. समस्या यह थी कि पार्टी के लोगों को खुद यह जानकारी नहीं थी कि वाड्रा किस हद तक कारोबार में लिप्त हैं और किसी की यह पूछने की हिम्मत भी नहीं थी.

कांग्रेस का बचाव दो तरह के रुख के बीच में घूम रहा था. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि वाड्रा एक आम आदमी हैं, वे नेता नहीं हैं. इसके जवाब में केजरीवाल ऐंड कंपनी ने कहा कि वाड्रा भारत की सबसे ताकतवर नेता के दामाद हैं. अगले दिन कांग्रेस ने अपना रुख बदल लिया और दावा किया कि वाड्रा और उनकी रियल एस्टेट कंपनी को डीएलएफ द्वारा दिए गए कर्ज के बदले में कोई फायदा नहीं पहुंचाया गया. 

कांग्रेस ने 6 अक्टूबर को एक दूसरे तरह की खबर जारी कर मीडिया का ध्यान भटकाने की कोशिश की थी. उस दिन दोपहर प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी एक बयान में इस बात का जोरदार तरीके से खंडन किया गया कि सोनिया गांधी के विदेशी दौरों के लिए सरकार ने पैसे खर्च किए हैं. उसी दिन शाम 4 बजे द्विवेदी अचानक बिना तय कार्यक्रम के 24 अकबर रोड पर होने वाले पार्टी के दैनिक मीडिया ब्रीफिंग में पहुंच गए और केजरीवाल के इंडिया अगेंस्ट करप्शन द्वारा बीजेपी प्रमुख नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी.
 
लेकिन एक बार जब साढ़े पांच बजे केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सोनिया के दामाद पर निशाना साधना शुरू किया तो मीडिया में बस एक ही हेडलाइन बची थी. टिप्पणीकारों (खासकर कांग्रेस का विरोध करने वालों) ने गांधी परिवार की बखिया उधेडऩा शुरू कर दिया. राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने वाड्रा सिंड्रोम के बारे में एक पत्र में लिखा, 'राजनैतिक उद्यमिता जिसमें लोग नेताओं से जुड़ते हैं या मुख्यत: राजनीति में शामिल इसलिए होते हैं कि एक नए तरह का वेंचर कैपिटल तैयार किया जा सके.' यह क्रोनी कैपिटलिज्म से एक कदम ऊपर है.

इसका गंभीर राजनैतिक असर हुआ है. यूपीए सरकार को बचाने वाले उसके सहयोगी दल जैसे मायावती और मुलायम सिंह यादव वाड्रा-डीएलएफ गठजोड़ की जांच करने की मांग का साथ देने को मजबूर हुए हैं. इसका सबसे तीखा असर खुद कांग्रेस की साख पर हुआ है जो मतदाताओं के छिटक जाने की आशंका से पस्त हो गई है. एक ऐसी पार्टी जो फिर से सत्ता में आने की तैयारी कर रही थी, उसे अब अगले आम चुनाव में बर्बादी की गंभीर आशंका दिखने लगी है. लोगों की प्रतिक्रिया साफ तौर पर देखी जा सकती है और लोग चुटकुलों से लेकर एसएमएस तक और अरविंद केजरीवाल द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों के आधार पर पीआइएल दाखिल करने जैसी कई तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. अब जबकि कीचड़ ज्यादा फैल चुका है, एक चीज नजदीक आती दिख रही है: लोकसभा चुनाव.
 -- साथ में प्रिया सहगल और श्रव्या जैन

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