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देश के छोटे शहरों की हसीन रातें

डीजे नाइट, बॉलीवुड स्पेशल, पूल पार्टी, नाइटक्लब और डिस्कोथेक! इसके लिए अब महानगरों का रुख करने की क्या जरूरत? अब वीकेंड की मस्ती का नया ठिकाना बन रहे हैं हिंदुस्तान के छोटे शहर.

शिलॉंग की नाइट लाइफ
शिलॉंग की नाइट लाइफ
अपडेटेड 11 अक्टूबर , 2012

छत्तीसगढ़ की राजधानी और उनींदा-सा शहर रायपुर पिछले दिनों अचानक सुर्खियों में आ गया. मामले का मजमून कुछ यूं था कि यहां के नाइटक्लब वीडब्ल्यू केनयन में 25 अगस्त को हुई एक पूल पार्टी में जमकर जाम छलके और सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाती लड़कियों ने नियम-कानूनों और सामाजिक मान्यताओं को अपनी जूती की नोक पर रख दिया. Nightlife शहर के एक वर्ग को लगा कि यह उनकी महान सांस्कृतिक परंपरा और विरासत को झटका है और शहर की महापौर 46 वर्षीया किरणमयी नायक ने अचानक उस पूल पार्टी पर धावा बोल दिया. उस वक्त तो छत्तीसगढ़ की नैतिकता की रक्षा के लिए बहुतों ने उनकी पीठ थपथपाई, लेकिन अब नैतिकता के अलंबरदार इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कहीं उनकी यह 'नैतिक’ कार्रवाई हजारों युवा मतदाताओं को उनसे दूर न कर दे.

युवा भारत की आंखों के तारों की रंगीन महफिल

आखिर हकीकत उनसे भी छिपी तो नहीं है. वे भी इसके गवाह हैं कि हिंदुस्तान के छोटे शहर किस तूफानी गति से बदल रहे हैं. हाथों में जाम और उंगलियों के बीच सिगरेट फंसाए चमचमाती रंगीन बत्तियों के बीच बजती धुनों पर थिरकते नौजवान कदमों को रोकना अब आसान नहीं है. रायपुर के 25 वर्षीय अभिषेक गोस्वामी कहते हैं, 'मॉल, पांचसितारा होटल और नाइटक्लब खोलने का फायदा ही क्या, जब आप नौजवानों की मस्ती की राह में रोड़े अटका दें?'

युवाओं की जानलेवा महत्वाकांक्षाएं

सरकारी अधिकारियों और बाबुओं का शहर कहे जाने वाले भोपाल के बारे में मशहूर था कि यह शाम आठ बजे ही सो जाता है. दिल्ली-मुंबई की हवा खा चुकी इस शहर की युवा पीढ़ी हिकारत से अपने शहर को देखती और कहती कि यहां तो लोग साढ़े पांच बजे दफ्तर से आते हैं, सात बजे खाना खाते हैं, आठ बजे समाचार सुनते हैं और नौ बजे सो जाते हैं. लेकिन यह दो साल पहले की बात है, जब इस शहर की रातें बदमजा और उबासियों में डूबी होती थीं.

युवाओं देखो, ये है कमाई का नया नजरिया

शहर अब भी वैसा ही है, मगर रातों की रूमानियत बदल गई है. भोपाल में दो साल पहले खुले शॉपिंग मॉल में टेन डाउनिंग स्ट्रीट (टीडीएस) नाम के नाइटक्लब और पब में शनिवार और रविवार की रात अब पैर रखने की जगह नहीं होती. डीजे की धुनें पूरे हॉल में गूंज रही हैं. युवा लड़के-लड़कियां हाथों में बियर की बोतल थामे एक-दूसरे की बांहों में गुम हैं.

बॉलीवुड में बरकरार है नशा विदेशी बालाओं का

थिरकते बदन मानो हर नियम, हर बंधन को मुंह चिढ़ा रहे हों. इस वक्त उन्हें किसी की परवाह नहीं है. लड़कियों को मां की उस ताकीद की याद नहीं, जिसमें शादी से पहले पराए मर्द को न छूने की बात बड़े करीने से समझाई गई थी. परवाह न अपने फिसलते कपड़ों की, न बहकते कदमों की, न घर की, न दुनिया की, न आने वाली सुबह की.

यह जिंदादिल सपनों से भरी भोपाल के वीकेंड की रात है. एक दशक पहले देश के महानगरों में जमकर काम करने और पार्टी करने की जो संस्कृति जम चुकी थी, आज छोटे शहरों में वह अपने तरीके से पैर जमा रही है.

बॉलीवुड सिनेमा में नौजवानों का नया रंग-ढंग

अब इंदौर, लखनऊ, कानपुर, रांची, लुधियाना सरीखे छोटे शहर और सुदूर पूर्वोत्तर का खूबसूरत शहर शिलांग तक रातों के शबाब से अछूता नहीं रहा. विन्सेंट वैन गॉग की सितारों भरी रातें छोटे शहरों में जवान हो रही हैं. अमेरिकी नृत्यांगना इजाडोरा डंकन ने अपनी आत्मकथा माइ लाइफ में लिखा है, 'रात की जिंदगी किसी भी शहर की आजादख्याली को मापने का सबसे सटीक पैमाना है.' इस पैमाने पर परखें तो हिंदुस्तान के कई छोटे-छोटे शहर आजादी का स्वाद चख रहे हैं.

भोपाल: आजादी का स्वाद चखतीं छोटे शहरों की लड़कियां

 इस शहर का नाइटक्लब टीडीएस रात की रंगीनियों और शहर के बदलते सांस्कृतिक मिजाज़ का मुख्य केंद्र है. हर वीकेंड यहां आने वाली 18 वर्षीया इंजीनियरिंग की स्टुडेंट काम्या को बियर पीकर डांस फ्लोर पर बेलगाम नाचने में आजादी का एहसास होता है. वह कहती है, 'मैं दीपिका पादुकोण की तरह बनना चाहती हूं. जैसे वह कॉकटेल और लव आजकल फिल्म में बिलकुल टल्ली होकर आती है, मैं भी वैसा ही करना चाहती हूं.'

काम्या को अपनी पारंपरिक मां जैसी जिंदगी नहीं चाहिए, जिसमें पापा और दादा-दादी का रिमोट कंट्रोल लगा हुआ है. 19 साल की भावना भदौरिया (नाम परिवर्तित) मध्य प्रदेश के एक छोटे कस्बे गंजबसौदा के ऐसे परिवार में पैदा हुई, जहां बिना दुपट्टा घर से बाहर जाने की भी छूट नहीं थी. इसलिए जब वह एमए करने के लिए पहली बार भोपाल आई तो मानो पंख ही लग गए. वह पेइंग गेस्ट में रहती है और हर वीकेंड किसी दोस्त के साथ डिस्को जाती है. दोस्त जरूरी नहीं, ब्वॉयफ्रेंड ही हो, बस ब्वॉय होना जरूरी है. एक बार पब के अंदर जाने के बाद दोनों के अपने-अपने साथी होते हैं और अपनी-अपनी दुनिया.

ऐसे ही विदिशा, रायसेन, देवास और उज्जैन जैसे छोटे-छोटे शहरों और कस्बों से आई ढेरों लड़कियां अपनी आजादी के साथ शहर की आजादख्याली में इजाफा कर रही हैं. घर पर जींस पहनने की भी इजाजत नहीं थी और यहां अपने पर्स में ट्यूब ड्रेस रखकर लाती हैं और पब के लेडीज टॉयलेट में जाकर कपड़े बदलती हैं, चेहरे पर मेकअप लगाती हैं. पब के दरवाजे के भीतर एक दूसरी ही दुनिया है, जहां घरवालों के नियम-कानूनों का डंडा नहीं है. यहां आजादी है.

night life 2जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर और चिंतक निवेदिता मेनन इस आजादी को बहुत कीमती मानती हैं, 'हर वह चीज जो सामंती पारिवारिक संरचना को तोडऩे का काम कर रही है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए. आज 18 साल की उम्र में वह लड़की दीपिका पादुकोण होना चाहती है, लेकिन मुमकिन है, 23 साल में वह ऐसा नहीं सोचेगी. यह नई जिंदगी लड़के-लड़कियों में कंपल्सिव मैरिज (शादी की मजबूती) के आइडिया को तोड़ने का काम कर रही है, इसलिए अच्छी है.'

छोटे शहरों की बदलती जिंदगी में सिनेमा की भी बहुत बड़ी भूमिका है. भोपाल टीडीएस के मालिक अभिमन्यु कहते हैं, 'फिल्म, टेलीविजन और इंटरनेट के जरिए अब छोटे शहरों में भी लोगों का लाइफस्टाइल बदल रहा है. उनकी परचेजिंग कैपेसिटी भी बढ़ी है.' भोपाल के अलावा टीडीएस की ब्रांच रायपुर, बिलासपुर, नागपुर, जबलपुर और रांची जैसे छोटे-छोटे शहरों में है. टीडीएस भोपाल के मैनेजर निर्भय कहते हैं, 'अब छोटे और बड़े शहरों में कोई फर्क नहीं रह गया है. छोटे शहरों में नाइटक्लब का ज्यादा स्कोप है. सब नाइट लाइफ एंजॉय करना चाहते हैं.'

लेकिन छोटे शहरों की नाइट लाइफ में संस्कृति और नैतिकता के कुछ टेढ़े पेंच भी हैं. युवा नाइट क्लब जाने की बात पैरेंट्स से छिपाते हैं और माता-पिता बच्चों को बताए बगैर आते हैं. लोग करना तो चाहते हैं पर जताना नहीं.

सामाजिक चिंतक और अंग्रेजी के विद्वान प्रो. आलोक राय कहते हैं, 'किसी भी डेमोक्रेटिक सोसाइटी में इतना असंतुलन नहीं होता, जितना हिंदुस्तानी समाज में है. फिल्मों से लेकर विज्ञापन, पोस्टर और चारों ओर मौजूद हर चीज बहुत सेक्सुअलाइज्ड है और असल जिंदगी में वह उतनी ही प्रतिबंधित.' अरमान सबके दिलों में हैं, लेकिन कितने लोग इसे स्वीकारने का साहस रखते हैं?

फिल्मकार अनुराग कश्यप कहते हैं, 'नैतिकता का सारा लबादा दरअसल खुद वह सब न कर पाने की चिढ़ है. नैतिकता की सारी जंग तो सेक्सुअल लिबर्टी के खिलाफ ही है.'

हालांकि सेक्सुअल लिबर्टी को लेकर भी छोटे शहरों की मौजूदा पीढ़ी में बड़ा कन्फ्यूजन है. भोपाल में गारमेंट शोरूम चलाने वाले 43 वर्षीय किशोर सेवानी नाइटक्लब में जाते हैं. उनका बेटा भी जाए, उन्हें आपत्ति नहीं. लेकिन अपनी बेटी के नाइटक्लब जाने के सख्त खिलाफ हैं.

18 साल की इंजीनियरिंग स्टुडेंट नूपुर कंगम को यह डबल स्टैंडर्ड पाखंड लगता है. पब में थिरक रहे एमबीए के 23 वर्षीय छात्र गौरव शादी के पहले या शादी के बगैर सेक्स को बुरा नहीं मानते, बल्कि कहते हैं, 'गॉड, इट्स सो नॉर्मल. जो नहीं करते, उन्हें अपना चेकअप कराना चाहिए.' इसी क्लब में गौरव की बगल की टेबल पर बैठे 42 वर्षीय मि. ऐंड मिसेज विकास अग्रवाल को अपने बच्चों के नाइटक्लब जाने, शराब या सिगरेट पीने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सेक्स का सवाल आते ही उनका चेहरा लाल पड़ जाता है. 'नहीं, नहीं, ये ठीक नहीं.'

अपना जिम चलाने वाली और वीकेंड में नाइटक्लब में डांस करने वाली 28 वर्षीया काकोली मुखर्जी इस बात पर चिढ़ते हुए कहती हैं, 'सिगरेट पी लो, ड्रिंक कर लो, डांस कर लो, लेकिन 'नो टू सेक्स’. अब यहां भी क्या मम्मी-पापा की गाइड बुक लेकर आएंगे?'

छोटे शहरों की डिस्को, पब और नाइटक्लब जनरेशन ने मम्मी-पापा की गाइड बुक को टॉयलेट में फ्लश कर दिया है और अपनी गाइड बुक खुद बना रहे हैं. फिल्मकार इम्तियाज अली नई पीढ़ी की गाइड बुक को एक बड़े सामाजिक बदलाव के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं, 'नई पीढ़ी की गाइड बुक ही फिल्मों की मुख्य प्रेरणा है. अगर लड़कियां दीपिका पादुकोण बनना चाहती हैं तो इसमें बुरा क्या है?'

लखनऊ: तहजीब के शहर की रातें हसीन हैं

Night Lifअदब और तहजीब के शहर लखनऊ में जो कुछ महीनों पहले गूगल पर सबसे ज्यादा सेक्स शब्द सर्च करने के कारण अचानक सुर्खियों में आ गया था, पिछले एक साल के भीतर आधा दर्जन से ज्यादा डिस्को क्लब और बार खुल गए हैं. कानपुर रोड पर फीनिक्स यूनाइटेड मॉल में चलने वाले क्लब रॉयल (सीआर) में आने वालों की संख्या 500 से ज्यादा है.

हर वीकेंड में अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ 'सीआर-5Ó आने वाली सिमरन लखनऊ के रायबरेली रोड पर मौजूद एक इंजीनियरिंग कॉलेज में बीटेक की छात्रा है. सिमरन कहती है, 'मुझे शराब-सिगरेट से कोई गुरेज नहीं. इससे डिस्को का मजा बढ़ जाता है.'

छोटे शहरों के तकरीबन सभी नाइटक्लबों में अलग से लेडीज ड्रेसिंग रूम होता है. सिमरन हॉस्टल से सलवार-कुर्ता पहनकर आती है और डिस्को में ट्यूब ड्रेस पहन लेती है. वह कहती है, 'इस ड्रेस का फील ही अलग है. जो कंजर्वेटिव लोग क्लीवेज को गंदा मानते हैं, वे ही सबसे ज्यादा उसे देखने के लिए बेताब रहते हैं.'

इसी क्लब में अपने पति के साथ हर वीकेंड आने वाली 43 वर्षीया प्रतिभा देवनानी 40 पार करने के बाद पहली बार नाइटक्लब गईं. शरीर बेडौल हो गया है, लेकिन फिर भी जींस पहनकर खुश होती हैं. वे मॉडर्न दिखने का कोई मौका छोडऩा नहीं चाहतीं.

सीआर-5 लखनऊ का इकलौता डिस्को क्लब है, जहां 'मेल’ के साथ 'फीमेल’ डीजे अपनी धुनों से युवाओं में मस्ती घोल देती हैं. डीजे शीरीन बताती हैं, 'डिस्को क्लब में पंजाबी और बॉलीवुड रिमिक्स म्युजिक की मांग काफी होती है. हम लोग ऐसा म्युजिक चुनते हैं, जो लाउड हो. बदलाव सिर्फ म्युजिक में ही नहीं आ रहा. युवा अब शराब के नए और महंगे ब्रांड भी चुनने लगे हैं. जीरो डिग्री के इवेंट मैनेजर ईश कहते हैं, 'डिस्को क्लब में आने वाले अब मार्टिनी और जर्मन बियर और वाइन की भी मांग करने लगे हैं.' लखनऊ बदल गया है.

लखनऊ के होटल ताज में स्थित बार में हर बुधवार 'लेडीज नाइट’ का आयोजन होता है. इस दिन यहां आने वाली महिलाओं को बार की ओर से पहला 'ड्रिंक’ मुफ्त पेश किया जाता है. सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो लखनऊ में बार की कुल संख्या 117 है, जिसमें आधे से ज्यादा पिछले दो साल के भीतर खुले हैं. पांच साल में यहां एक दर्जन नए क्लब भी खुले हैं, जहां कॉर्पोरेट पार्टियां होती हैं.

स्कॉर्पियो क्लब के मालिक मीसम अब्बास कहते हैं, 'बड़ी कंपनियों के आने से एक दूसरी तरह की संस्कृति पनपी है. ये लोग हफ्तेभर पसीना बहाते हैं और वीकेंड में क्लबों में पहुंच जाते हैं, जहां देर रात तक पार्टियों का दौर चलता है. क्लब में डिस्को से लेकर स्वीमिंग पूल तक होते हैं, जहां रात 2-3 बजे तक लोग देश-दुनिया से बेखबर अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं.'

रायपुर:नैतिकता के ठेकेदार को ठेंगा

बीते 26 अगस्त को रायपुर के क्षेत्रीय समाचार चैनलों ने चीख-चीखकर एक खबर चलाई: 'अश्लीलता का नंगा नाच! जाम छलके!' नजारा बिलकुल आम था.

रायपुर के इकलौते पंचसितारा होटल वीडब्ल्यू केनयन में एक रात पहले आयोजित एक निजी पूल पार्टी में 20 से 30 साल के नौजवान बियर के ग्लास लिए थिरक रहे थे. खबर आने के एक घंटे के भीतर नैतिकता की रक्षक महिला फौज टूट पड़ी. इस बार यह कांग्रेस का महिला संगठन था, जिसकी कमान यहां की महापौर किरणमयी नायक के हाथ में है.

वे बोलीं, 'घटिया और वाहियात. कम कपड़े पहने शराब और सिगरेट पीती लड़कियों की तस्वीरें हमने देखीं. यह सब छत्तीसगढ़ की संस्कृति का हिस्सा नहीं है.'

इनमें से कई युवाओं को पुलिस ने तलब भी किया. इसके बाद जिलाधिकारी सिद्धार्थ कोमल परदेसी ने सभी पूल पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया और शहर के बार और पबों को दस बजे तक बंद करने का आदेश दे डाला.

सिविल सर्विस की तैयारी कर रही 26 वर्षीया स्वाति वर्मा कहती हैं, 'मेरे लिए पूल पार्टी का मतलब बस इतना है कि रायपुर के नौजवान इस दुनिया का हिस्सा बनने को बेताब हैं.'

10 लाख की आबादी पार कर चुका रायपुर काफी तेजी से महानगर बनने की ओर कुलांचे भर रहा है. शहर में चार मॉल हैं और पांच निर्माणाधीन हैं. यहां मॉल और मल्टीप्लेक्स ही मनोरंजन के इकलौते साधन हैं. शहर के नौजवानों पर केनयन मामले में प्रशासन की कार्रवाई का कोई असर नहीं पड़ा. इस घटना को एक पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मैग्नेटो मॉल की छत पर 10 डाउनिंग स्ट्रीट में फिर से नौजवानों का जमावड़ा होने लगा है.

शिलांग: पूरा हफ्ता शांत, लेकिन वीकेंड तूफानी

चीड़ के शांत पेड़ों के बीच अगर चर्च के संगीत, स्थानीय खासी के बोल और बॉब डाइलन के प्रति प्रेम का मिश्रण देखना हो तो शिलांग आएं, जहां के लोग अब इस शहर के प्रति पारंपरिक धारणा को बदलने में लगे हैं. हर शनिवार की रात यहां जो धूम मचती है, वह इतवार भोर तक चलती रहती है.

Night34 वर्षीय लारसिंग सॉयन बंगलुरू के सेंट जोसफ कॉलेज ऑफ कॉमर्स में पढ़े हैं. वे चाहते थे कि बंगलुरू में जो जिंदगी उन्होंने गुजारी है, वह शिलांग में भी जारी रहे. इसलिए उन्होंने अपने पिता प्रभात सॉयन के होटल सेंटर प्वॉइंट में डिस्कोथेक नाइट का आयोजन शुरू किया.

उग्रवाद से प्रभावित एक शहर, जो शाम सात बजे तक सो जाने को मजबूर हो, वहां नाइटक्लब की शुरुआत दुस्साहसिक लगती है. लेकिन 1999 में पहला आयोजन करते वक्त उन्होंने दो मशहूर डीजे युधिष्ठिर और एवन को बुलाया. कार्यक्रम बेहद कामयाब रहा.

लारसिंग याद करते हैं, '350 से ज्यादा लोग रातभर नाचते रहे.' यहीं से उन्हें ताकत मिली और 2002 में उन्होंने पूर्वोत्तर के पहले डिस्कोथेक क्लाउड 9 की शुरुआत शिलांग में की.

बाकी शहरों के नाइटक्लबों में आम तौर पर संपन्न तबका ही आता है, लेकिन शिलांग में क्लाउड 9 के मालिकों ने शहर के हर वर्ग के लिए दरवाजे खोल रखे हैं. यहां से लैतुम्ख्रा बहुत दूर नहीं है. वहां भी कुछ ऐसे ही नजारे देजा वू नाम के एक नाइटक्लब और लाउंज में देखने को मिल सकते हैं. यहां आने वालों में मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा भी हैं.

माइक्रोसॉफ्ट की मार्केटिंग मैनेजर रह चुकीं 29 वर्षीया रश्मि लिंगदोह का 2009 में शुरू किया गया यह क्लब आज शिलांग के पेज 3 तबके की ऐशगाह बन चुका है. यहां हर शनिवार को लाइव संगीत का आयोजन होता है, जिसमें लिंगदोह और मार्टिन लूथर क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी में पर्यटन के प्रोफेसर 31 वर्षीय फ्रांग कूपर ब्लूज, जैज और यहां के पसंदीदा संगीत रॉक म्युजिक का मिश्रण पेश करते हैं. लेकिन शिलांग में अब भी यह चलन शनिवार से आगे नहीं जा सका है. बाकी दिनों में अधिकतर बार और क्लबों के दरवाजे रात दस बजे ही बंद हो जाते हैं.

शनिवार रात के तीन बज चुके हैं और शिलांग विमेन्स कॉलेज की अंडरग्रेजुएट छात्राएं 19 वर्षीया जेनिफर वेरी और 20 वर्षीया मिताली राभा अपनी कार में घर जाने की तैयारी कर रही हैं. मिताली ने क्लाउड 9 में आज शकीरा जैसा डांस कर लोगों को चकित कर दिया. वेरी कहती हैं, 'यहां महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कभी कोई चिंता नहीं रही है.'

कानपुर:लोकल एलीट को मस्ती की राह में रोड़ा पसंद नहीं

उमस भरे एक शनिवार की रात है. दो बजने को हैं और कानपुर के बिंदास युवा अभी वार्म-अप हो रहे हैं. पुराने कैंटोनमेंट के बीचोबीच टैगोर रोड नाम के पॉश इलाके में पार्टी का नया पता है धुआं, जिसके बाहर महंगी कारों और एसयूवी की कतारें जमा हो रही हैं. प्राइवेट पार्टियों के लिए धुआं शहर का इकलौता मेडिटेरेनियन बार और ग्रिल है. आज यहां तीन पार्टियां होने वाली हैं.

nightछोटे शहरों की अय्याशी से अगर रश्क करना हो तो आप यहां आ सकते हैं. नोटों की गड्डियों से भारी जेब, फ्रेंच बाजार को टक्कर देने वाले डिजाइनर लेबल, बॉलीवुड के प्रति उमड़ता प्यार और महंगी विदेशी शराब की बहती नदियां.

45 वर्षीया सोशलाइट रोनिता मोदी कहती हैं कि यहां पहले फार्महाउसों में पार्टियां होती थीं. हालांकि नया चलन नाइटक्लब और एक्सक्लूसिव पार्टियों का है. यहां रात भर के लिए फ्लोर बुक करने की कीमत है ढाई लाख रु.

गुच्ची और कवाली के परिधानों में लिपटी किशोरियों के लुई विटन या हर्मीज ब्रांड वाले क्लच बैग काउच पर फैले हुए हैं. धुएं में उमड़ी यह भीड़ गवाह है कि कानपुर बदलने को मचल रहा है. डीजे ने इनकी सलामी में म्युजिक तेज कर दिया है. लास वेगास के कसीनो की तर्ज पर यहां का माहौल निर्मित करने से लेकर रूसी डांस बालाओं को न्यौता देने या इमरान हाशमी और अभय देओल जैसे बॉलीवुड सितारों को बतौर गेस्ट बुलाने तक मनोरंजन के तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं.

भूटानी कानपुर के सबसे लोकप्रिय डीजे हैं. वे रेव 3 नाम के मॉल में स्थित शहर के सबसे पुराने नाइटक्लब फेलिक्स में बड़ी शख्सियतों को अकसर बुलाते रहते हैं. हाल ही में पांचवीं बार इस नाइटक्लब को अभिनेता जॉन अब्राहम ने लॉन्च किया था. कानपुर के चमड़ा, पान मसाला और डिटर्जेंट कारोबारी ऐसे नाइटक्लबों में भारी पैसा बहाते हैं.

कानपुर के युवाओं के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था, जहां परंपरा और आधुनिकता दोनों का मेल होता है. 23 वर्षीया शगुन मल्होत्रा लंदन से इंटीरियर डिजाइन की पढ़ाई करके लौटीं तो उन्होंने नाइटक्लब धुआं खोलते वक्त यही सोचा था कि यह शहर में 'सम्मानित' तरीके से नाइट आउट करने के लिए जगहों की कमी को पूरा करेगा.

मल्होत्रा के माता-पिता गीता और विकास ने 17 साल पहले कानपुर का पहला डिस्को हील्स खोला था. गीता बताती हैं, 'तब अधिकतर विवाहित दंपति ही आते थे. अब तो युवा भी खूब आते हैं.' स्थानीय कारोबारी अंकित नागोरी हाल ही में न्यूयॉर्क से कानपुर लौटे हैं. वे लोगों के नजरिये में आए इस भारी बदलाव से काफी उत्तेजित हैं.

वे कहते हैं, 'जब मैं यहां से गया था, तो लोग सिर्फ अपने घरों में शराब या सिगरेट पीते थे. अब ऐसा नहीं रहा.' कानपुर पिछले 30 साल में औद्योगिक शहर की जगह एजुकेशन हब बन गया. कानपुर की रातों पर इस बदलाव का असर देखा जा सकता है.

लुधियाना: यहां की पार्टियां मेलबर्न से भी ज्यादा कूल

पंजाब के शहर आज एक नई सेक्स क्रांति की दहलीज पर खड़े हैं. यहां के युवाओं ने पारंपरिक मूल्यों को धता बताते हुए अपने रिश्तों के लिए एक नई और सुरक्षित जगह बना ली है: लुधियाना की ट्रैफिक से जाम सड़कों के बीचोबीच एक एक्सक्लूसिव चिल आउट जोन!

Night Life 1अकाल स्प्रिंग्स नाम के एक खानदानी कारोबार में मैनेजर 25 वर्षीया सिफ्ती रियात कहती हैं, 'जीने के लिए इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता.' कभी बेहद उबाऊ रहा उनका शहर कैसे बदला है, इस बारे में वे बोलती हैं तो चुप नहीं होतीं और यह सब कुछ सिर्फ पांच साल के भीतर हुआ है, जब वे दिल्ली और ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में अपनी पढ़ाई कर रही थीं. वे कहती हैं, 'आज लुधियाना मेलबर्न जितना कूल है.'

रियात और उनके देस्त शहर के सबसे ट्रेंडी नाइटक्लब बार 148 में हर वीकेंड जाना कभी नहीं भूलते. फिरोजपुर रोड पर स्थित ए-होटल की छत पर यह जगह यहां के नौजवानों की आकांक्षाओं को पूरा करती है, जिसे रियात कुछ ऐसे बयां करती हैं, 'अच्छा म्यूजिक, ऐसा फ्लोर, जहां आप खुलकर बेधड़क नाच सकते हों और ऐसा माहौल, जहां किसी लड़की के शराब या सिगरेट पीने से उसके करेक्टर का अंदाजा न लगाया जाता हो.'

30 वर्षीय जावेद ग्रेवाल के दिमाग की उपज है-बार 148. ग्रेवाल कहते हैं, 'पहले ऐसी पार्टियों के लिए दिल्ली या मुंबई जाना पड़ता था.' ग्रेवाल ने लुधियाना का पहला नाइटक्लब कपल्स ओनली खोला है, जिसमें एक लाउंज है, धूम्रपान की जगह है और पंजाब के अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए प्राइवेट डाइनिंग की व्यवस्था है.

ट्रांसपोर्टर सनी जौहर (42) और वेयरहाउस के मालिक जसदीप बिंद्रा (30) ने काफी सोचने के बाद जून में द हब नाम का नाइटक्लब शहर में खोला था. बेहद भीड़भाड़ वाले इलाके कुम्हार मंडी में होने के बावजूद इस चार मंजिला नाइटक्लब ने उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जहां एक बार, मल्टीक्यूजीन रेस्तरां, कैफे लाउंज और रूफ टॉप डाइनिंग है. साथ ही एक डिस्कोथेक भी है, जहां पायनियर का अपने किस्म का इकलौता मिक्सर सीडीजे 2000 है.

दोनों पार्टनरों को अपने खानदानी कारोबार से जितनी कमाई नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा अकेले इस नाइटक्लब से आ रहा है. जौहर कहते हैं, 'इसे लगाने में हमें आठ महीने लगे हैं. सिर्फ चार करोड़ रु. की लागत आई.'

द हब में हर शनिवार कोई मशहूर डीजे आता है. इसकी बुकिंग हफ्तों पहले हो जाती है. क्लब की शुरुआत ही पंजाब के सबसे लोकप्रिय डीजे हरि और सुखमणि से हुई. इसके बाद से यहां डीजे शैरन, जया और ट्रेंड सिस्टर्स आ चुके हैं.

अब तक की सबसे बड़ी रात रब्बी शेरगिल की रही, जब वे 4 अगस्त को यहां आए थे. बिंद्रा याद करते हैं, 'पांच हजार वर्गफुट स्पेस में हर इंच भरा हुआ था.' बार 148 के ग्रेवाल को कमाई के बारे में बात करना पसंद नहीं, लेकिन एक बात वे जरूर कहते हैं कि वे 'इससे ज्यादा खुश नहीं हो सकते थे.'

शहर बहुत तेजी के साथ बदल रहे हैं और लोग बदल जाने की इस दौड़ में शामिल हैं. रोल मॉडल है सिनेमा, जिसे देखकर लखनऊ मुंबई होना चाहता है तो रायपुर की मीना बनना चाहती है करीना कपूर. छोटे शहरों के दिन छोटे हो गए हैं और रातें लंबी. ये रातें नैतिकता के पहरेदारों को अभी और रुलाएंगी. शहरों के बदलते मिजाज का रुख बहुत कुछ बयां कर रहा है.

साथ में आशीष मिश्र, असित जॉली, कौशिक डेका, ओलिना बनर्जी, संजय दीक्षित और विजयदेव झा

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