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बीजेपी के निशाने पर कांग्रेस का साफ चेहरा

बीजेपी जानती है कि अभी नहीं तो कभी नहीं. वह संसद से सड़क तक विरोध की मुद्रा में है.

अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

लालकृष्ण आडवाणी के निवास 30, पृथ्वीराज रोड पर 20 अगस्त को हुई बैठक में चार घंटे तक चली चर्चा के बाद योजना बनी. पार्टी के शीर्ष नेताओं ने तय किया कि वे यूपीए सरकार के सबसे नाजुक अंग पर चोट करेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमला.

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, वरिष्ठ नेता मुरली मनेाहर जोशी, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, जसवंत सिंह और रविशंकर प्रसाद सबने मिलकर संसद के दोनों सदनों को नहीं चलने देने का फैसला किया. इन्होंने कहा कि कोयला घोटाले पर कैग की रिपोर्ट पर सरकार भले ही संयुक्त संसदीय समिति बना दे या फिर लोक लेखा समिति की जांच बैठा दे, वे पीछे नहीं हटेंगे. यह रणनीति बहुत विस्तृत तो नहीं थी, लेकिन बीजेपी इसमें मजबूती से कूद पड़ी.

जरूरत के हिसाब से बदल रही इस रणनीति में फिलहाल बीजेपी ने दोतरफा रास्ता अपनाया है--संसद को लगातार बाधित किए रहना और साथ ही सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करना. संसद के भीतर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में जेटली और स्वराज हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, आडवाणी जी दोनों के ही करीबी हैं. वे जानते हैं कि दोनों के बीच मनमुटाव है इसलिए उन्होंने दोनों की भूमिकाएं स्पष्ट कर रखी हैं.”

एक ओर, जेटली सरकार के खिलाफ अपनी दलीलें मजबूत कर संसद को ठप करने को सही ठहराने का काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर सुषमा इस बात को सुनिश्चित कर रही हैं कि पार्टी की आवाज सड़कों पर सुनी जाए. इसी का नतीजा था कि उन्होंने बयान दिया, ‘’कांग्रेस ने मोटा माल बनाया, ताकि यह बात जनता के बीच पहुंच सके और लोगों में चर्चा का विषय बने.

पार्टी के एक नेता का कहना है, ‘’वे जानते हैं कि अभी नहीं तो कभी नहीं.” संसद के भीतर आडवाणी के कमरे में रोजाना बैठकें होती हैं, कभी-कभार दिन में दो बार. ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर परिवार के साथ कनाडा छुट्टियां मनाने गए गडकरी वहीं से दूसरे नेताओं के संपर्क में रहते हैं.

बीजेपी के पास सरकार को घेरने के लिए इससे बेहतर तरीका और नहीं हो सकता था क्योंकि कोयला घोटाला सीधे प्रधानमंत्री को दागदार करता है, भ्रष्टाचार के मुद्दे से जाकर जुड़ता है, जिस पर प्रचार अब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के हाथ में जा चुका है साथ ही आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी को एक जीवंत मुद्दा पकड़ा देता है क्योंकि हिमाचल और गुजरात जैसे अहम राज्यों में उसे अपनी सरकार भी बचाए रखनी है.

अब जबकि बीजेपी ने संसद के भीतर अपने विरोध को उस स्तर पर ला दिया है जहां से पीछे हटना संभव नहीं, अगला चरण सड़कों पर देखने को मिलेगा. यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना थी. 24 अगस्त को आरएसएस नेता और बीजेपी में संगठन सचिव रामलाल ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, राज्य प्रभारियों और विभिन्न इकाइयों के संयोजकों के साथ बैठक कर उनसे राज्यों में रैली आयोजित करने और प्रधानमंत्री के पुतले फूंकने को कहा.

बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन कहती हैं, हंसराज अहीर (चंद्रपुर के सांसद) जैसे लोगों ने कोयला आवंटन पर आंकड़े इकट्ठा करने में दिन-रात बिता दिए हैं. हम बड़े तरीके से काम कर रहे हैं. मामला सिर्फ संसद में जुमलेबाजी का नहीं है जैसा कि कांग्रेस को लगता है कि लोग उस पर भरोसा कर ही लेंगे.”

इस सब के बावजूद सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री को संसद में बोलने न देकर बीजेपी ने नैतिक स्तर पर नुकसान उठाया है? जेटली इससे सहमत नहीं, ‘’यह कहना कि सिर्फ संसद में इस पर बहस हो, देश के इतिहास के सबसे बड़े घोटाले पर परदा डालने जैसा होगा. हम सिर्फ एक दिन संसद में बहस कराने में दिलचस्पी नहीं रखते. यदि आज किसी बहस का इस्तेमाल जवाबदेही पर मिट्टी डालने के लिए किया जा रहा है, तो एक वैकल्पिक रणनीति बहुत जरूरी है. अड़ंगा लगाने से फायदा भी मिलता है, भले ही ऐसा दुर्लभ मामलों में होता हो.”

इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं, ‘’पिछले दो-तीन साल में कांग्रेस विपक्ष से संवाद नहीं कर पाई है. संसदीय गतिरोध को हल किया ही जाना चाहिए.”

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