याद नहीं आता कि पहली बार मुझे कब यह महसूस हुआ था कि महिला होने के नाते मुझे हर वह काम करने से रोका जाएगा जो मैं करना चाहती हूं. हां लेकिन मैं एक ऐसे समाज में रहती हूं जहां ज्यादातर महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. जहां वे एक सामान से ज्यादा कुछ नहीं, जहां उन्हें हर दिन अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है. इस स्वतंत्रता दिवस पर मैंने खुद को याद दिलाया कि आजादी उपहार की तरह मुफ्त में नहीं मिलती. इसे पाने के लिए लड़ना पड़ता है.
बदकिस्मती से पाकिस्तान की ज्यादातर महिलाओं के लिए आगे की राह कठिनाइयों से भरी है. वे कट्टरवाद से पीड़ित हैं. इज्जत की खातिर उनकी हत्या कर दी जाती है, कुरान से निकाह कर देना, वत्ता सत्ता, तेजाब से हमला और घरेलू हिंसा की वे शिकार हैं. यही नहीं, किसास और दीयात कानून (आंख के बदले आंख कानून) का इस्तेमाल भी उनके खिलाफ होता है.
पुलिस और न्यायाधीश आम तौर पर घरेलू हिंसा के मामलों को या तो अनुपयुक्त बता देते हैं या फिर इसे निजी या पारिवारिक मामला मानते हैं. वे इस मुद्दे को सिविल कोर्ट का मामला मानते हैं न कि क्रिमिनल कोर्ट का. पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन में पता चला कि यहां के लगभग 80 फीसदी परिवारों में घरेलू हिंसा होती है.
मैं पाकिस्तान की हिम्मती महिलाओं को जानती हूं, जो खौफ को पीछे छोड़, आगे बढ़ती हैं. वे पर्दे के पीछे की हीरो हैं, दृढ़-निश्चयी हैं, रूढ़ियों और बेड़ियों से लोहा लेती हैं ताकि अपनी पहचान बना सकें. पुरुषों की तुलना में दोगुना ज्यादा काम करती हैं लेकिन फिर भी उसकी तुलना में आधा महत्व भी नहीं पातीं.
फिर भी इन महिलाओं ने हार नहीं मानी. आज पाकिस्तानी महिलाएं बड़े पदों पर पहुंच रही हैं. वे वकील हैं, चिकित्सक हैं, पायलट, लेखक, संगीतकार, बैंकर, उद्यमी, राजनीतिज्ञ, डिजाइनर, शिक्षक, कलाकार, अभिनेता, एथलीट हैं. पाकिस्तान पहला मुस्लिम देश है जिसकी प्रधानमंत्री एक महिला रही हैं.
पाकिस्तानी संसद की अध्यक्ष महिला है, विदेश मंत्री महिला, सूचना मंत्री और अमेरिका में पाकिस्तान की राजदूत भी महिला हैं. कार्यवाहक रक्षा मंत्री भी महिला है. हमारे यहां मेजर जनरल एक महिला हैं, ऑस्कर पुरस्कार विजेता महिला भी हैं. संसद के निचले सदन में लगभग 22 फीसदी और उच्च सदन में लगभग 16 फीसदी महिलाएं हैं, यह आंकड़ा भारत, अमेरिका या ब्रिटेन से भी ज्यादा है. सरकारी विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है. कृषि पैदावार और कुटीर उद्योगों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है. पिछले कृषि सर्वेक्षण के मुताबिक 73 फीसदी महिलाएं कृषि में योगदान देती हैं.
हमारी संघीय और स्थानीय सरकार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के प्रति प्रतिबद्घता जता रही है क्योंकि अगले साल यहां चुनाव होने हैं और 8.328 करोड़ पंजीबद्घ मतदाताओं में से रिकॉर्ड 43 फीसदी मतदाता महिलाएं हैं. पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार इसी साल अप्रैल में पंजाब महिला सशक्तीकरण पैकेज लाई है. इस साल की शुरुआत में कराची में मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट की महिला सशक्तिकरण रैली हुई थी.
बीबीसी के मुताबिक इस रैली में दुनिया की किसी भी दूसरी रैली के मुकाबले सबसे ज्यादा महिलाएं शामिल हुई थीं. कामकाज की जगहों पर शोषण, तेजाबी हमले, इज्जत की खातिर हत्या, जबरन निकाह जैसे अपराधों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए आसिफ अली जरदारी के नेतृत्व वाली संघीय सरकार ढेरों नए कानून लाई है. महिलाओं पर ज्यादती के खिलाफ पिछले माह ''दस लाख हस्ताक्षरों'' का एक अभियान चलाया गया था जिसमें अंतिम हस्ताक्षर जरदारी ने किया था, इसके साथ ही उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि अब सरकार महिला जजों की नियुक्ति करेगी.
महिलाओं के साथ हिंसा किसी क्षेत्र, संस्कृति या सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है. अनेक विकासशील देशों में ऐसे अपराधों की संख्या बहुत ज्यादा है. पाकिस्तान भी इनसे जूझ्ना सीख जाएगा. धार्मिक कट्टरवाद के स्याह पहलू और महिलाओं पर इसके प्रभाव की मुझे ज्यादा चिंता होती है.
हालांकि स्वात में सब कुछ तेजी से सामान्य हो रहा है लेकिन खैबर, पख्तूनख्वा और फाता में लड़कियों के स्कूलों पर बार-बार गोलीबारी, बमबारी होती है. पाकिस्तान में पिछले एक दशक में तालिबान ऐसे 1,200 स्कूलों को तबाह कर चुका है. आतंकवादी और धार्मिक कट्टरपंथियों ने महिलाओं के जीवन को इतना कठिन बना दिया है कि अब वे हर बात के लिए उनकी मोहताज बन गई हैं.
वे परिवार के पुरुष सदस्य के बगैर घर से बाहर कदम नहीं रख सकतीं, उन्हें नौकरी करने की इजाजत नहीं है, संगीत सुनने या सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करने की मनाही है. कई मिसालें हैं, जिस महिला ने इनमें से कोई नियम तोड़ा, उसे सार्वजनिक रूप से इसकी सजा दी गई. यह कट्टरवाद शहरों को भी शिकंजे में ले चुका है. पिछले साल अगस्त में एक पुलिस वाला नैरंग आर्ट गैलरी में धड़धड़ाता हुआ घुसा और उसने एक महिला क्यूरेटर को इसलिए पीटना शुरू कर दिया क्योंकि महिला ने बिना बाजू वाले कपड़े पहने थे.
होना यह चाहिए था कि हम इस महिला के लिए या आसिया बीबी या फखरा यूनुस जैसी महिलाओं के पक्ष में आवाज बुलंद करते. लेकिन इसकी बजाए, ''इज्जत'' और ''गैरत'' के प्रति अपने जुनून की खातिर, जिसे हमारे धार्मिक अधिकारों और बदनाम एजेंसियों ने और बढ़ावा दिया, जनता आतंकवादी आफिया सिद्दीकी और उमे हसन की हिमायती बन गई.
अधिकारों की निगरानी करने का एक ढांचा बनाया जाना जरूरी है. हालांकि अभी तो यह महज शुरुआत है. सचाई यह है कि पूरे समाज को अपने में उल्लेखनीय बदलाव लाना होगा. सरकारी और निजी क्षेत्र में महिलाओं को खुले मन से स्वीकार करना होगा. लेकिन इसके लिए महिलाओं को तेजी से सीखने के लिए और पुरुषों को वह सब भूलने के लिए तैयार रहना होगा, जो अब तक होता आया था ताकि लिंग भेद दूर किया जा सके.
इस उल्लेखनीय बदलाव का सबसे अहम हिस्सा है तालीम. सशक्तीकरण के सही मायने हैं, अपनी पसंद से चुनने का अधिकार. शिक्षा ऐसा करने का मौका हमें देती है. लैंगिक समानता लाने में, समाज को सुरक्षित और न्यायसंगत बनाने में, आय बढ़ाने में, जच्चा-बच्चा मृत्यु दर को कम करने, स्वास्थ्य, खुशी और पूरे समाज की बेहतरी के लिए तालीम अहम साबित होगी. आजादी के बाद से पाकिस्तान की शिक्षा दर में सुधार जरूर हुआ है. लेकिन आज भी, दुनिया में सबसे कम शिक्षित पाकिस्तानी महिलाएं ही हैं. पाकिस्तान सहित सभी समाजों में लड़कियों को शिक्षित करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
आगे की राह बहुत लंबी और बैेहद कठिन है. हम चार कदम आगे बढ़ाते हैं तो दो कदम पीछे लेने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन महिलाओं की एकता में जो ताकत है, बल्कि हर एक महिला की शक्ति में मुझे पूरा भरोसा है. वे हालात बदल सकती हैं और बेड़ियों की दीवारों को तोड़ने का माद्दा रखती हैं.

