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न्‍यायपालिका: इंसाफ को साहस की दरकार

सुप्रीम कोर्ट ने अच्छे कामों से अपनी पहचान बनाई है, पर पिछले दसेक साल में न्यायिक सुधार के मोर्चे पर खास बदलाव न होने के कारण न्यायिक व्यवस्था से लोगों का भरोसा घटा.

अपडेटेड 11 अगस्त , 2012

हमारी न्यायिक संस्थाएं पुरानी घड़ियों की तरह हैं जिन्हें तेल पिलाने, चाबी भरने और सही समय पर लाने की जरूरत है.'' (लॉर्ड हैरी वूल्फ, लॉर्ड चीफ  जस्टिस ऑफ  इंग्लैंड, 2000-2005)
भारत की सर्वोच्च अदालत की पहुंच देश में सर्वव्यापी है. न सिर्फ  राज्‍यों के हाइकोर्टों (28 राज्‍यों और संघ शासित प्रदेशों के लिए कुल 18 हाइकोर्ट हैं) के अंतिम फैसलों पर बल्कि देशभर की पंचाटों (राज्‍यस्तरीय और केंद्रीय) पर इसका इख्तियार है. ऐसी सैकड़ों पंचाट देश में काम कर रही हैं. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए कानून और मौजूदा कानूनों की वैधता पर इसकी व्याख्या देश की सभी अदालतों और अधिकरणों पर संविधान के तहत बाध्यकारी है. वास्तव में विधायिका या कार्यपालिका के दायरे में आने वाला ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जो सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो. सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में 20 लाख वर्ग मील का भारतीय इलाका और 1.2 अरब की आबादी आती है. आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए भारत का सुप्रीम कोर्ट जबरदस्त काम कर रहा है और इसने अपनी अलग पहचान बनाई है.
इसके बावजूद पिछले 10 साल के दौरान हमारे स्थापित कानूनी तंत्र पर लोगों का भरोसा कम हुआ है क्योंकि कानून तो तमाम बने, लेकिन न्याय उस अनुपात में नहीं मिला. बातें तमाम की गईं, लेकिन न्यायिक सुधार नहीं हुए. हमें अब आगे बढ़ना होगाः कुछ हट के करना होगा, ऐसा जो हमने पहले कभी नहीं किया. मोटे तौर पर मैं कुछ सुझाव दे रहा हूं.
*न्याय देने में लगने वाले लंबे समय में कटौती होः हमारे यहां जैसी त्रिस्तरीय पिछले फैसलों पर आधारित न्याय व्यवस्था है, उसमें मुकदमे लंबे खिंचते चले जाते हैं. इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि वकील अपने मुकदमे से जुड़े पुराने फैसले और कानूनों को कोट करने में काफी वक्त बरबाद करते हैं. पिछले कुछ वर्षों के दौरान हमारे यहां जो कानूनी रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं, उनमें कुछ उपयोगी फैसले हैं तो अधिकतर अनुपयोगी भी हैं. अमेरिका में भी पहले ऐसी ही दिक्कत थी, लेकिन पूर्व निर्णयों की बाढ़ को थामने के लिए वहां कड़ाई से एक न्यायिक उपकरण को लागू किया गया है जिसे ''फैसलों का अप्रकाशन'' कहते हैं. अप्रकाशन का मतलब यह हुआ कि किसी मुकदमे से संबद्ध फैसला या न्यायिक राय सिर्फ  उसी मामले के तथ्यों तक सीमित है, लिहाजा उसे सरकारी लॉ रिपोर्ट में प्रकाशन के उपयुक्त नहीं माना जाता है. इसे जब वेबसाइट पर 'अप्रकाशित' फैसले की श्रेणी में डाल दिया जाता है, तब कोई भी वकील उसका उद्धरण कोर्ट में नहीं दे सकता. यह अमेरिका में काफी कारगर साबित हुआ है. अमेरिका की संघीय अदालतों के 'अप्रकशित फैसलों' की दर फिलहाल 80 फीसदी है. भारत में ऐसा करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी. हजारों फैसलों की पड़ताल कर के उन्हें 'अप्रकाशित' घोषित करना पड़ेगा, लेकिन यह प्रयास काफी कारगर होगा. इससे मुकदमों को निबटाने में होने वाली देरी से बचा जा सकव्गा.
*न्यायिक तंत्र के भीतर पंचाटों के गठन की प्रवृत्ति पर रोक लगेः ज्‍यादातर याचिकाकर्ताओं को यही लगता है कि उन्हें सिर्फ  हाइकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में ही इंसाफ  मिल पाएगा, बावजूद इसके कि अपीली अधिकरणों में ऊंची अदालतों के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश ही फैसला देते हैं. ऐसे अधिकरणों में आने वाले अधिकतर मामलों पर दिए गए फैसले को याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय में चुनौती देता है (अनुच्छेद 226 में वर्णित रिट याचिकाओं के तहत) और आखिरकार उसे सुप्रीम कोर्ट में ले जाता है (अनुच्छेद 136 के तहत). इस तरह अंतिम फैसला होने में काफी देर हो जाती है और इस प्रक्रिया में ये अपीली अधिकरण अप्रासंगिक हो जाते हैं.
*गलत याचिकाओं पर हर्जाना लगेः हमारी न्यायिक व्यवस्था की एक बड़ी विफलता यह है कि कानून में व्यवस्था होने के बावजूद गलतियों के लिए कीमत नहीं मांगी जाती. किसी भी आशंका के तहत की गई अपुष्ट याचिका और जनहित याचिका डालने वाले के मन में दंड भुगतने का डर अदालतों को पैदा करना चाहिए. मसलन, सरकारों द्वारा बनाई गई परियोजनाएं और कायर्क्रम सिर्फ  भ्रष्टाचार की आशंका पर हाइकोर्ट (और सुप्रीम कोर्ट में) में डाली गई याचिकाओं के चलते बरसों अटके रहते हैं और ऐसे मामलों में याचिकाकर्ताओं का कोई प्रत्यक्ष हित नहीं होता. जब त्रासद न्यायिक प्रक्रिया के अंत में ऐसी जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया जाता है, तो इस दौरान समुदायों को परियोजना के लागू न होने से जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई करना ही असंभव होता है.
*न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायाधीशों की सिफारिश की प्रक्रिया पर रोक लगेः ऊंची अदालतों में जजों की नियुक्ति का जो मौजूदा तरीका है, वह अप्रासंगिक हो चुका है. हाइकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अपने सामने आए मुकदमों को निबटाने में सक्षम हैं, लेकिन अनुभव दिखाता है कि हायर ज्‍यूडिशियरी की नियुक्ति की बाध्यकारी सिफारिश करने के मामले में उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
*हाइकोर्टों में जहां पहले ही मुकदमों का अंबार लगा हुआ है, बार के प्रतिष्ठित और अनुभवी सदस्यों को दो, तीन या पांच साल के लिए जज नियुक्त किया जा सकता है और इस पद से मुक्त होने के बाद वे उसी कोर्ट में दोबारा वकालत कर सकें, ऐसी व्यवस्था दी जा सकती है. हाइकोर्टों में मामलों को निबटाने की गति पर इससे काफी फर्क पड़ेगा.
*जज (संरक्षण) कानून 1985 को खत्म करें: इस कानून ने पहली बार व्यवस्था दी थी कि अपने न्यायिक कार्य निष्पादन के दौरान किसी भी वर्तमान या पूर्व जज द्वारा की गई किसी भी गतिविधि, काम, कहे गए शब्द के लिए कोई भी अदालत दीवानी या फौजदारी मामले की सुनवाई नहीं करेगी. ''माननीय न्यायाधीशों'' (यकीन मानिए, ऐसे बहुत हैं) को ऐसी अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत नहीं है. इसके अलावा 1985 का यह कानून जिस सदिच्छा से बनाया गया था, उस हिसाब से यह अब अप्रासंगिक हो चुका है क्योंकि यह कुछ मुट्ठी भर गलत करने वालों के लिए ढाल का काम कर रहा है. पहले से ही कार्यरत न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए 1968 का जजेज इनक्वायरी एक्ट मौजूद है और मेरा मानना है कि इस कानून को बनाए रखना चाहिए क्योंकि यह ऊंची अदालतों के जज को हटाए जाने की प्रक्रिया की आखिरी कड़ी को बेहद जटिल बना देता है-और ऐसा ही होना भी चाहिए ताकि जजों की स्वतंत्रता को बचाए रखा जा सके. इसकी जगह जिस जुडिशियस स्टैंडर्ड्स ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल 2010 को लाने की बात की जा रही है, वह काफी खराब विकल्प होगा. इस बिल ने समस्या सुलझने की बजाए कहीं ज्‍यादा दिक्कतें खड़ी कर दी हैं. इसलिए इसे वापस ले लिया जाना चाहिए या खारिज कर दिया जाना चाहिए.
अंतिम बात यह है कि न्यायिक सुधार का मतलब सिर्फ  मुकदमों के तीव्र निबटारे से नहीं है. 21वीं सदी की न्याय व्यवस्था को आत्मानुशासन के मामले में भी नजीर कायम करनी होगी यानी उसके सामने जो कानूनी समस्याएं पैदा हों (जो कि अकसर कानूनी और राजनैतिक दोनों होती हैं) उनके प्रति अनुशासन बरते. इसे अलावा न्यायाधीशों की जीवन शैली में भी ज्‍यादा पारदर्शिता और सार्वजनिक आलोचना के प्रति सहिष्णुता पैदा करने की जरूरत है. पहले याचिकाकर्ता जिस तरह से जज का फैसला मान लिया करता था, अब ऐसा नहीं है. न्याय व्यवस्था पर कभी जो सर्वाधिक शुचिता और सर्वसत्ता वाली धारणा की चादर थी, वह उतर चुकी है. अब फैसले देना मुश्किल काम हो चला है. किसी पक्ष के मुकदमा हार जाने पर उसके द्वारा जज को सामान्य इनसान के तौर पर जिम्मेदार मान लेने का चलन बढ़ा है. लोग उसे अब व्यवस्था का निष्पक्ष और बिना लाग-लपेट वाला एजेंट नहीं मानते. यानी निशाना अब गेंद पर नहीं, खिलाड़ी पर लगाया जा रहा है. इसीलिए कुछ नैतिक उपदेशों और ऊपर से नीचे की ओर जाने वाले दिशा-निर्देशों की जरूरत आन पड़ी है (जिसे 'शीर्ष' पर बैठे लोगों को भी मानना होगा).
जिस तरह का हमारा देश है और जैसा वक्त चल रहा है, उस लिहाज से न्यायपालिका को कार्यपालिका और अन्य बाहरी प्रभावों से सिर्फ  स्वतंत्र रखना ही पर्याप्त नहीं है. जिस ऊंचे पद पर हमारे न्यायाधीश होते हैं और जैसे अधिकार उन्हें प्राप्त हैं, उसके हिसाब से उन्हें दिल और दिमाग दोनों के स्तर पर बेहतरीन गुणवत्ता वाला होना चाहिए. इससे भी ज्‍यादा उन्हें साहसी होना चाहिए. सबसे बड़ी अदालत में सज्‍जनता और साहस हो, तो नीचे की ओर ये गुण अपने आप छन-छनकर चले आते हैं. इस देश में न्यायपालिका का जितना महत्व है, उसे देखते हुए बाइबिल की एक सूक्ति और उसके ठीक बाद दी गई चेतावनी सटीक बैठती है जिसका अर्थ कुछ यूं बनता है-''तुम ही धरती की आस हो, लेकिन अगर तुमने ही आस छोड़ दी तो फिर तुम्हें आस कौन बंधाएगा?''

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