पाकिस्तान का न्यायिक इतिहास इस देश के राजनैतिक इतिहास जैसा ही पैबंदों से पटा पड़ा है. जिस संस्थान की शुरुआत न्याय की ब्रिटिश परंपरा के वाहक के तौर पर सेकुलर और निष्पक्ष तरीके से हुई थी, आज सत्ता की दौड़ में उसका राजनीतिकरण और सांप्रदायीकरण हो चुका है. बस औपनिवेशिक दिनों के कुछ पैबंद बचे रह गए हैं (जैसे कि हम अब भी जजों को ''माइ लॉर्ड'' या ''योर लॉर्डशिप'' कह कर संबोधित करते हैं). पाकिस्तान की न्यायपालिका के विकास को यहां के सांस्थानिक ढांचे के तीन अन्य खंभों के संदर्भ में देखना होगा-संसद/कार्यपालिका, फौज और मजहब.
नया गणराज्य बनने के शुरुआती वर्षों में न्यायपालिका का सेकुलर और आधुनिक चरित्र उसके दिए कई ऐतिहासिक फैसलों से अपने आप स्पष्ट होता है, जैसा कि उसने 1953 में पंजाब के अस्थिर हालात की जांच करने के लिए पंजाब एक्ट-ह्यह्य, 1954 के तहत गठित कोर्ट ऑफ इनक्वायरी की कार्यवाही के मामले में दिया था.
पंजाब के हालात के पीछे मजहबी आधार पर काम करने वाली कुछ सियासी पार्टियां थीं, जैसे मजलिस-ए-अहरार और जमात-ए-इस्लामी. इनकी जड़ें 1946 के चुनाव में मौजूद थीं जिसमें इन पार्टियों ने मुस्लिम लीग की सरकार को मुसीबत में डालने के लिए अहमदिया मुसलमानों का विरोध किया था. इन इस्लामी पार्टियों के निशाने पर मुस्लिम लीग कैबिनेट के सदस्य और तत्कालीन विदेश मंत्री सर जफरुल्ला खान थे जो अहमदिया थे.
कोर्ट ऑफ इनक्वायरी ने अपनी सुनवाई काफी विस्तार और व्यापक तरीके से की जिसमें दो न्यायाधीशों जस्टिस मुनीर और जस्टिस कयानी ने इस्लाम की तकरीबन हर धारा के मुस्लिम विद्वानों से बातचीत की. इस जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद दिलचस्प हैं: 1. मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को सेकुलर राज्य बनाने की कल्पना की थी. 2. इस्लामीराज्य की अवधारणा एक मरीचिका है जिसका पीछा करना व्यर्थ है. 3. मुसलमान कौन है, इसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है इसलिए तार्किक आधार पर यह तय करना राज्य का काम नहीं होना चाहिए. 4. पंजाब का असंतोष मुस्लिम लीग सरकार को मुसीबत में डालने के लिए क्षेत्रीय नेताओं द्वारा की गई भड़काऊ राजनीति का नतीजा था.
आज इस किस्म की किसी न्यायिक रिपोर्ट की कल्पना भी नहीं की जा सकती जब पाकिस्तान ने अपनी स्थापना के पीछे वैचारिक तौर पर इस्लामिक राज्य का एक आख्यान गढ़ कर स्थापित कर लिया है और संवैधानिक तौर पर उसने अहमदिया मुसलमानों को गैर-मुसलमान करार दिया है.
पाकिस्तान में लोकतंत्र को पहला झ्टका तमीजुद्दीन मामले (मुकदमा पीएलडी 1955 एफसी 240) में लगा था, जिससे वहां की न्यायपालिका ने सक्रिय रूप से निबटने की कोशिश भी की. लेकिन मामला कुछ ऐसा पलटा कि इसके बाद से इस मुल्क में जम्रियत लगातार पतन की ओर बढ़ती चली गई. यह मामला जहां जाकर पलटा, वह बिंदु दरअसल तकनीकी था. 1954 में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने संविधान सभा भंग करके इसकी जगह एक मंत्रिपरिषद बैठा दी.
संविधान सभा के अध्यक्ष तमीजुद्दीन खान ने इस कार्रवाई के खिलाफ सिंध हाइकोर्ट में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 की धारा 223 ए के तहत एक याचिका दायर कर दी. दरअसल, पाकिस्तान की विधायिका ने हाइकोर्ट में रिट के लिए धारा 223 ए को ही अपनाया था, लेकिन इस रिट के खिलाफ फेडरल कोर्ट में अपील की गई. कोर्ट ने ब्रिटिश साम्राज्य और राष्ट्रकुल देशों में लागू संविधानों की पड़ताल करने के बाद व्यवस्था दी कि चूंकि धारा 223 ए पर पाकिस्तान के गवर्नर जनरल की मुहर नहीं लगी थी, लिहाजा हाइकोर्ट में यह रिट अमान्य है.
इसके बाद बलूचिस्तान में सीमांत अपराध नियमन की वैधता के संदर्भ में दोसो मुकदमा आता है (पीएलडी 1958 एससी 553). इसे यह कहते हुए चुनौती दी गई थी कि वह 1956 के संविधान के अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज है और वह अनिवार्यता के सिद्धांत की जमीन तैयार करता है (जो तब से लेकर अब तक देश के संवैधानिक इतिहास के साथ प्लेग की तरह चिपटा है). सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले के रास्ते चुनी गई सरकार के जनरल अयूब खान द्वारा तख्तापलट को वैध ठहराया था और इसका आधार बताया था कव्ल्सन की क्रांति के सिद्धांत और न्यायिक सक्रियता को, जिसमें सरकार को बदलने के लिए क्रांति को वैध तरीका बताया गया है.
जनरल अयूब खान का मानना था कि संसदीय लोकतंत्र पाकिस्तान की जनता के लिए उपयुक्त नहीं है और देश में राष्ट्रपति शासन होना चाहिए जहां गणराज्य के राष्ट्रपति का चुनाव ''बेसिक डेमोक्रेट'' कहलाने वाले मतदाताओं का समूह करेगा. बेसिक डेमोक्रेसी की यह व्यवस्था दरअसल तत्कालीन सामंती व्यवस्था को बनाए रखने का एक मुखौटा थी क्योंकि बेसिक डेमोक्रेट का चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों के कद्दावर लोगों में से किया जाना था जो अपरिहार्य तौर पर यथास्थिति का ही समर्थन करते.
1962 में अयूब खान ने इस व्यवस्था को लागू कर दिया लेकिन बांग्लादेश की आजादी के दौरान 1969 से 1971 के बीच के अस्थिर वर्षों में यह संविधान और इसके प्रावधान दफन हो गए. एक बार फिर पाकिस्तान में संसदीय लोकतंत्र की बहाली हो गई.
दोसो फैसले को असमा जिलानी के मामले में (मुकदमा पीएलडी 1972 एससी 139) पलट दिया गया जिसमें कव्लसन के क्रांति के सिद्धांत को अवैध कानूनी सिद्धांत ठहरा दिया गया. बदकिस्मती से यह फैसला कुछ ही दिन टिक पाया क्योंकि जनरल जिया उल हक द्वारा जुल्फिकार अली भुट्टो की चुनी हुई सरकार के तख्तापलट को एक बार फिर अनिवार्यता के सिद्धांत के रास्ते नुसरत भुट्टो मामले में (मुकदमा पीएलडी 1977 एससी 657) वैध ठहरा दिया गया. पहली बार इस सिद्धांत को तख्तापलट के मामले में कोट किया गया था, लेकिन प्रभावी तौर पर देखें तो यह कव्लसन के सिद्धांत का ही एक संस्करण था. 1979 में जुल्फिार अली भुट्टो की न्यायिक हत्या का मामला खुद न्यायपालिका के हाथों में आ गया.
जनरल जिया उल हक को अपना शासन वैध ठहराने के लिए इस्लाम की जरूरत थी, लिहाजा 1980 में राष्ट्रपति की ओर से जारी एक अध्यादेश के रास्ते संघीय शरीयत अदालत का गठन कर दिया गया. इसे बाद में संविधान के आठवें संशोधन के रूप में संविधान में शामिल भी कर लिया गया. शरीयत अदालत आज न्यायपालिका के समानांतर अपना काम कर रही है जो शरीयत से जुड़े मामलों को देखती है. इस संस्थान के मनमर्जी गठन को चुनौती देने की अन्य संस्थानों की नाकामी ने पाकिस्तान में कानून और संवैधानिक तौर पर एक मजहबी तंत्र की स्थापना कर डाली है.
राज्य में इस्लाम की भूमिका के बरक्स न्यायपालिका के चरित्र में इन बुनियादी बदलावों का असर हमें शर्मसार करने वाले दो ऐतिहासिक फैसलों में देखने को मिलता है-कजलबाश वक्फ मामला (पीएलडी 1990 एससी 99) और जहीरुद्दीन मामला (1993 एससीएमआर 1718). कजलबाश वक्फ मामले में आए फैसले ने इस्लाम को आधार बनाते हुए भूमि सुधार को गैर-कानूनी ठहरा दिया तो जहीरुद्दीन बनाम राज्य मामले में कोर्ट ने संवैधानिक तौर पर परिभाषित मुस्लिमों द्वारा संविधान में अस्वीकृत गैर-मुस्लिमों या अहमदियों के खिलाफ हिंसा किए जाने को वैध करार दे दिया.
नब्बे का दशक बेन.जीर भुट्टो और नवाज शरीफ की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों और न्यायपालिका के बीच खींचतान का गवाह रहा जब न्यायपालिका ने अल जेहाद ट्रस्ट मामले में (पीएलडी 1996 एससी 324) न्यायिक स्वतंत्रता को बहाल करते हुए जजों के वरिष्ठता क्रम को निर्णायक दर्जा दे दिया तथा हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश से 'परामर्श' को इस तरह पुनर्परिभाषित किया कि उसे वीटो लगाने का अधिकार मिल गया.
जनरल परवे.ज मुशर्रफ ने जब 1999 में तीसरा फौजी तख्तापलट किया, तो एक बार फिर न्यायपालिका ने न सिर्फ इसे वैध ठहराया बल्कि मुशर्रफ को संविधान संशोधन का भी अधिकार दे डाला. अगले आठ साल तक न्यायपालिका यहां फौजी शासक की मुहर का पुराना काम करती रही लेकिन तस्वीर उस वक्त बदली जब 2007 में मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने दबाव के बावजूद इस्तीफा देने से मना कर दिया जिसके बाद तथाकथित ''वकीलों का आंदोलन'' भड़क गया.
चीफ जस्टिस चौधरी को 16 मार्च, 2009 को पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार ने दोबारा उनके पद पर बहाल किया और यहीं से कुख्यात एनआरओ मामले (पीएलडी 2010 एससी 265) को लेकर पाकिस्तान की न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच ताजा जंग छिड़ गई.
एनआरओ मामला नेशनल रीकैंसीलिएशन ऑर्डिनेंस, 2007 से जुड़ा था जो कुछ महत्वपूर्ण लोगों को पुराने अदालती मामलों से रियायत देता था, जिसमें राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का भी नाम था. सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को रद्द कर दिया और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को आदेश दिया कि वे जरदारी के खिलाफ एक पुराना मामला खोलने का आग्रह करते हुए स्विस बैंक अधिकारियों को पत्र लिखें. गिलानी ने ऐसा करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ऐसा कदम संविधान की धारा 248(2) के तहत गणराज्य के राष्ट्रपति को मिली छूट का उल्लंघन होगा.
इसी के चलते 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री की नेशनल असेंबली की सदस्यता खत्म कर दी और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए एक प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रभावी तौर पर न्यायिक तख्तापलट कर डाला. नए प्रधानमंत्री राजा परवे.ज अशरफ भी सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से अब तक इनकार करते रहे हैं. देखना होगा कि वे सुप्रीम कोर्ट की मार से आने वाले दिनों में बच पाते हैं या फिर उन्हें भी आने वाले दिनों में अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा.
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पाकिस्तान की न्यायपालिका कुल मिला कर एक प्रतिक्रियावादी संस्था रही है जिसके पास नागरिक अधिकारों के संरक्षण या प्रोत्साहन के नाम पर देने को कोई मिसाल नहीं है. इसके उलट इसने फौजी तख्तापलट को वैध ठहराया है, प्रधानमंत्रियों को बर्खास्त किया और सूली पर लटकाया है, मजहबी आजादी को दफना दिया है, आय और भूमि के पुनर्वितरण की राह में रोड़ा अटकाया है और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मोर्चे पर सबसे आगे रही है.
हाल के वर्षों में न्यायपालिका कहीं ज्यादा आत्मविश्वास से भर गई है और इसीलिए पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए असली खतरा बनकर उभरी है. इसने आशंका पैदा कर दी है कि कहीं पाकिस्तान उस कुख्यात बांग्लादेशी मॉडल की ओर तो नहीं बढ़ रहा जो वहां तो आजमाया जा चुका और अपनी मौत मर भी चुका है.

