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मीडिया शोर करता है, पर इसे गोली न मारें

शातिर टेलीविजन ऐंकर, प्रतिबद्ध लेकिन सीमित प्रिंट मीडिया और एक सोशल मीडिया नेटवर्क जो राजनैतिक बहस से भरा पड़ा है. पाकिस्तानी मीडिया मुखर और बेसब्र है.

अपडेटेड 11 अगस्त , 2012

आजादी के 65 साल बाद पाकिस्तान का मीडिया तेज और अस्त-व्यस्त बदलाव के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ लोकतांत्रिक ढांचा है जो मीडिया में सूचनाओं के मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करना चाहता है, वहीं एक ऐसा तंत्र भी है जिसका बरताव मीडिया की आजादी के लिए अपशकुन साबित हो सकता है.

इनमें से एक समस्या जो 2012 में लोकतांत्रिक व्यवस्था की फिर से बहाली के साथ जुड़ी हुई है, वह है साफ नजरिए का अभाव. आजाद प्रेस में मीडियाकर्मियों और पाठक वर्ग में यह चीज कभी विशिष्टता होती थी. मीडिया के संदर्भ में इस स्पष्टता की कमी को आबादी की संरचना के साथ जोड़कर देखना गलत नहीं होगा, जिसके नतीजतन इस दशक के अंत तक पाकिस्तान के दो-तिहाई नागरिक 27 साल से भी कम उम्र के होंगे.

देश की आबादी की औसत उम्र घटने के साथ ही लोकहित और सुशासन जैसे मुद्दों को लेकर मीडिया में उलझ्न बढ़ी है. युवा पाठकों की राय बनाने में सक्षम गहरे विश्लेषणों का अभाव दिखने लगा हैं. यह प्रक्रिया 21वीं सदी की शुरुआत में पाकिस्तान में इंटरनेट यूजर्स की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ जुड़ी हुई है.

फेसबुक और ट्विटर की दुनिया में, सोशल मीडिया के प्रति पाकिस्तान के उत्साही यूजर्स हाजिरजवाबी और व्यंग्य दोनों का जोरदार प्रदर्शन कर रहे हैं, और साथ ही प्रशासन के कामकाज और नागरिक नैतिकता पर अपने विचार नैतिक आग्रहों के साथ बेधड़क रख रहे हैं. लेकिन पाकिस्तानी युवा मीडियाकर्मियों में उफनते इस नए उत्साह की परख इस बात से स्पष्ट हो सकती है कि ग्लोबल विलेज में रिहाइश की प्रक्रिया बहुत तेज होती है और इसी का नतीजा होता है कि मीडिया के परिप्रेक्ष्य में ढेर सारे विषयों और मुद्दे पर हल्के-फुल्के तरीके से बहुत कुछ बताने की जरुरत की वजह से महत्वपूर्ण विषयों की गहराई तक जाने का काम छोड़ दिया जाता है-इसे पाकिस्तान में पिछले 30 वर्षों में औपचारिक शिक्षा में उल्लेखनीय गिरावट की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है.

और इसका नतीजा क्या हुआ? युवा श्रोताओं और युवा पाठक वर्ग-जिसके लिए सोशल मीडिया नेटवर्क राजनैतिक विमर्श और अपनी राय बनाने का का मुख्य माध्यम है-दोनों में ही संतुलित नजरिए की खासी कमी पाई गई. यहां कोई भी इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि 2012 में पाकिस्तान का मीडिया वाचडॉग पहले की तुलना में लगभग बेजान हो गया है. मीडिया रेगुलेटर पहले ज्‍यादा समझ्दार हुआ करते थे.

इसकी वजह कुछ और नहीं, कुटिल आर्थिक मंशा के कारण अनियंत्रित ऊर्जा और न्यून योग्यता वाले नैतिक फैसले लेना है, जो पाकिस्तान के लगभग तीन दर्जन न्यूज चैनलों की चारित्रिक विशेषता बन गया है. यह मसला हालिया सार्वजनिक बहस में उभरकर सामने आया, जब एक देशव्यापी न्यूज नेटवर्क से जुड़े चैनल के दो मशहूर ऐंकर टॉक शो के एक कार्यक्रम के दौरान सियासत में उतरने की हसरत रखने वाले रियल एस्टेट अरबपति से ब्रेक के बीच साठ-गांठ करते और शो में उनके द्वारा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देने के तरीके 'सिखाते' यूटूब पर नजर आए.

यह मामला इन नए न्यूज ऐंकर का आनन-फानन में अमीर बनने की चाहत का नहीं है, हालांकि यह बात एक आध ऐंकर के मामले में सही भी हो सकती है. यह सीधे-सीधे टीवी ऐंकर में नए किस्म की धूर्तता का मसला लगता है, जो वास्तव में सरोकारों से बेखबर और जनहित के मानकों के बारे में व्यावहारिक रूप से अनजान हैं, जिसे रोकना एक अच्छे मीडिया वाचडॉग के कामकाज का अहम हिस्सा होना चाहिए.

2012 में पाकिस्तान में यह सोचना बेमानी होगा कि वहां किसी एक मीडिया का बोलबाला रहेगा. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डॉट कॉम के क्षेत्र में विकास पूरी तरह से असमान है. महानगरों की अर्थव्यवस्था लगभग धराशायी होने के कगार पर पहुंच गई है-इससे भाषायी मीडिया में खबरों की गुणवत्ता में गंभीर गिरावट आई है. हालांकि अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में कड़ी प्रतिस्पर्धा की वजह से उनके स्तर में गिरावट किसी हद तक रुकी है.

न्यूज चैनलों के भरे बाजार में शोध और स्क्रिप्ट लेखन में गिरावट आई है. यह गिरावट मुख्य रूप से राजनैतिक मुद्दों पर आधारित टॉक शो और खबरों पर आधारित डाक्युमेंटरी में देखी जा सकती है. न्यूज डॉक्युमेंटरी जिनका लक्ष्य नुक्कड़ के आदमी तक से उसकी राय मांगने का है, वह समझने में आसान नजरिया पेश करने की बजाए भीड़ को खुश करने वाले या उसे नियंत्रित करने वाले व्यवहारों में लिप्त हो जाती है. राजनैतिक मुद्दों से जुड़े टॉक शो में टाल-मटोल, वाक्‌पटुता और इन दोनों से अधिक अहम शो में आमंत्रित नेताओं का ऊंचा स्वर सामूहिक रूप से जनहित मुद्दों पर विमर्श की कमियों को उजागर कर देता है.

अगर यह सब सीमापार भारत में हो रहे हालात से मिलता-जुलता है तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1947 से हम दोनों को अलग हुए ज्‍यादा वक्त नहीं बीता है. सूचना के माध्यम के रूप में टेलीविजन पिछले दशक की निराशाओं में से एक है लेकिन जैसा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नए विश्लेषक लगातार हमें बता रहे हैं कि इसका वक्त अभी आया नहीं है बल्कि आने वाला है.

प्रिंट मीडिया में न्यूजरूम बजट घटने और बाजार से होने वाली आय में कमी ने प्रिंट जर्नलिज्म के विकास को बाधित करके रख दिया है. हालांकि मैं समझ्ता हूं कि मेरा यह कहना ठीक होगा कि पाकिस्तान में अंग्रेजी के दैनिक अखबार भारतीय अखबारों की तुलना में जनकल्याण के अपने सरोकारों, बड़े कॉर्पोरेट घरानों की कारगुजारियों का पर्दाफाश करने और सुरक्षा मामलों में सरकार की खामियों का खुलासा करने में कहीं ज्‍यादा तेज और आजाद हैं.

जनरल परवेज मुशर्रफ के अर्द्धसैनिक शासनकाल के व्यापक, असमान, निजी सैटेलाइट चैनलों के बड़े पैमाने पर उदारीकरण की तुलना में पाकिस्तान सरकार ने 2012 में मीडिया के साथ ज्‍यादा सौम्य भूमिका निभाई है. मीडिया समूहों के साथ तीखी झ्ड़पें, जो राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के शुरुआती शासनकाल की खासियत हुआ करती थीं, उनमें एक नफासत आ गई है. इससे तुच्छ स्तर के विरोध परिदृश्य से ओझल हो गए हैं.

अपने वजूद के लिए जूझ्ते सरकारी टेलीविजन माध्यम पीटीवी ने फिर से शहरी श्रोता-दर्शकों में अपनी पैठ बना ली है, लेकिन अब भी यह जनमत बनाने की बजाए संसदीय समिति की आलोचनाओं की ज्‍यादा परवाह करता है और कार्यपालिका के सख्त अंकुश से मुक्त नहीं हो पाया है.

साल 2012 में पाकिस्तानी मीडिया के समक्ष सूचनाओं के अबाध प्रवाह में मुख्य रूप से दो अड़चनें हैं. इनमें पहली तो जानी-पहचानी है, बड़े कॉर्पोरेट का विज्ञापन बजट, जो मीडिया के कंटेंट को भी प्रभावित करना चाहते हैं. आजाद मीडिया के लिए दूसरा मुख्य खतरा कबाइली इलाकों में तालिबान द्वारा संचालित राजनैतिक अतिवाद और ऐसी संस्थाएं हैं जो पंजाब और सिंध में अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं.

एक निजी टीवी चैनल पर हाल ही में गोलियां बरसाई गई थीं क्योंकि उसने दहशतगर्दों के हिसाब से घटनाओं का ब्योरा पेश नहीं किया था. यह एक अलग तरह की सेंसरशिप है जिसे सरकार लागू नहीं करती. खुद थोपी गई इस सेंसरशिप ने पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक जगहों में से एक बना दिया है. स्वतंत्र मीडिया के भविष्य के लिए यहां काफी कुछ किया जाना बाकी है.

पाकिस्तान की ये सारी बातें भारत के लिए क्या मायने रखती हैं? पहला, पाकिस्तान में आजाद मीडिया की मौजूदगी, यहां के अतिवादी तत्वों को पड़ोसी लोकतांत्रिक देशों में अपना प्रभाव फैलाने से रोकव्गी. दूसरा यह कि पाकिस्तानी मीडिया को निडर रहकर विदेशी और घरेलू नीतियों में छिपे कुछ खतरनाक पहलुओं का, जो धार्मिक कट्टरता के कारण फैल रहे हैं, विश्लेषण करते रहना चाहिए. खराब प्रशासन जो अकसर पड़ोसियों, खासकर भारत के साथ बढ़ते कारोबार और सियासी रिश्तों के माहौल में खटास पैदा कर देता है, उसकी आलोचना करना जरूरी है. इन सबसे न सिर्फ पाकिस्तान के प्रशासन में सुधार आ सकता है बल्कि आएगा और यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत से रिश्ते सुधरेंगे.

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