बांद्रा-वर्ली सी लिंक पर एक साइन बोर्ड गाड़ी चलाने वालों का स्वागत करता है जिस पर लिखा है 'दक्षिण मुंबई.' दिलचस्प बात यह है कि इस पर बना तीर असल में उत्तर की ओर इशारा करता है. इस तरह गाड़ियां करीब 150 मीटर तक गलत दिशा में बढ़कर एक ट्रैफिक सर्कल से यू टर्न लेने के बाद फिर उस दिशा में बढ़ती हैं, जिधर उन्हें जाना होता है. 2009 में जब से यह पुल आम लोगों के लिए चालू हुआ है, मुंबई के एक खास तबके और मिजाज के लोग इसे शहर की संभावनाओं का प्रतीक मानते रहे हैं. लेकिन यह सी लिंक मुंबई के लिए असलियत से ज्यादा सजावटी मुहावरा ही साबित हुआ है.
इस पुल की लागत अनुमान से पांच गुना ज्यादा रही है और इसे बनने में भी 10 साल का समय लग गया-अनुमान से पांच साल ज्यादा. यह पुल सिर्फ इस वजह से शहर की प्रशासनिक अक्षमता का प्रतीक नहीं है कि इसे बनाने में ज्यादा समय और पैसा खर्च हुआ. मुंबई में रहने वाले 1.25 करोड़ लोगों में से 72 लाख लोग रोजाना भारी भीड़ वाली लोकल ट्रेनों से सफर करते हैं. महज 40,000 वाहन ही हर कामकाजी दिन सी लिंक से होकर गुजरते हैं. सार्वजनिक यातायात की जगह निजी वाहनों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर देना गलत शहरी नीति और अलोकतांत्रिक राजनीति, दोनों का ही परिचायक है.
बेशक इस पुल के लिए तमाम उत्साह दिखाने के बावजूद मुंबईवासी इसके इस्तेमाल के लिए अपनी जेब ढीली करने के लिए कतई तैयार नहीं हैं. जब सी लिंक को खोला गया तो ट्रैफिक इतना कम था कि प्रशासन को टोल टैक्स घटाने के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे बेपरवाह प्रशासन अब भी इस सी लिंक को बढ़ाकर इसे शहर के दक्षिण छोर नरीमन प्वाइंट तक ले जाने की योजना बना रहा है.
हालांकि पुल के बांद्रा छोर पर लगा साइन बोर्ड ज्यादा सही है, लेकिन इसके आसपास रहने वालों के सामाजिक-आर्थिक संकव्तक बहुत खुश होने की वजह नहीं देते. वैसे तो एक सर्वे बताता है कि इस इलाके में रहने वाले करीब 40 फीसदी परिवारों की आय 10 लाख रु. से ज्यादा है, लेकिन चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि एच (वेस्ट) म्युनिसिपल वार्ड के 78 फीसदी लोग झोपड़पट्टी में रहते हैं. बांद्रा इसी वार्ड में है. मुंबई के पैरोकार अकसर यह तर्क देते हैं कि सभी बड़े शहरों में ऐसे अनुभवों की पराकाष्ठा पाई जाती है. अगर पारिभाषिक रूप से देखें तो सबसे अमीर और सबसे गरीब की खाई यहां बेहद गहरी है. 2001 की जनगणना के मुताबिक मुंबई के 54 फीसदी लोग झोपड़पट्टी में रहते हैं. भारत की वाणिज्यिक राजधानी में हाशिए का जीवन वास्तव में सबसे ज्यादा नुमायां है.
लेकिन हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे. पिछली सदी के ज्यादातर वर्षों में मुंबई ऐसा शहर था जो भारत की कल्पनाओं में सबसे ज्यादा हिलोरें भरता था. दशकों तक शहर की जनसंख्या उन प्रवासियों की बाढ़ की वजह से बढ़ती रही जो महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों या समूचे भारत के विभिन्न इलाकों से आए थे. मिथक रचने वालों के शब्दों में कहें तो प्रवासियों की भीड़ मुंबई में अमीर बनने के ख्वाब संजोए आ रही थी. लेकिन असलियत में वे ज्यादा व्यावहारिक थे, वे शहर के विभिन्न कारखानों या उनसे जुड़े उद्यमों में से किसी एक में स्थायी रूप से काम की चाह में आ रहे थे. 1951 में संगठित क्षेत्र में मुंबई के 72 फीसदी श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ था. लेकिन उदारीकरण के बाद से इसमें तेजी से बदलाव शुरू हो गया. 1981 से 2007 के बीच औपचारिक क्षेत्र के रोजगार में 0.83 फीसदी की हर साल गिरावट आई. इसका नतीजा यह निकला कि प्रवास की यह धारा-शहर के आकर्षण का प्रबल संकव्त-कम हो गई. अब मुंबई की ग्रोथ में प्राकृतिक बढ़त सबसे बड़ा कारक है.
अनौपचारिक क्षेत्र का अब भी शहर के रोजगार में करीब दो-तिहाई योगदान है. उदारीकरण के साथ आए 'श्रम नियमों के लचीलेपन' के दबाव ने सब-कॉन्ट्रैक्ट, कॉन्ट्रैक्ट जॉब और कैजुअल रोजगार में भारी बढ़ोतरी की है. काम के क्षेत्र के इस तरह से अनौपचारिक होते जाने ने शहर के भौतिक परिदृश्य पर भी असर डाला है. एक मुंबई स्टील और कर्टेन ग्लास से चमचमाती है तो दूसरी मुंबई के हिस्से तिरपाल और टीन की छप्पर है. यह शहर नव-उदारवादी असमानताओं का प्रतीक है.
मुुंबई के इस दर्द में शहर के सबसे दुर्लभ संसाधन जमीन से जुड़े सौदों में घोटालों के विलक्षण स्तर ने कई गुना इजाफा किया है. पिछले दो दशकों के परमिट राज ने नियम बनाने वाले नेताओं, उन्हें लागू करने वाले अफसरशाहों और उन्हें तोड़ने-मरोड़ने की चाहत रखने वाले बिल्डरों के आपसी गठजोड़ को बढ़ावा दिया है. कभी-कभार ही उनका भंडाफोड़ हो पाता है जैसा कि कोलाबा के आदर्श अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स मामले में हुआ. यह इमारत 'रक्षा सेवाओं के सेवारत और रिटायर्ड कर्मियों के कल्याण के लिए' मंजूर की गई थी, लेकिन कई नेताओं और अफसरशाहों के परिवार वालों ने इसमें अपार्टमेंट हासिल कर लिए. आरोप है कि यह अपार्टमेंट उन्हें बाजार भाव से काफी कम कीमत पर दिए गए. इस घोटाले की वजह से एक मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है और दो अन्य के खिलाफ जांच चल रही है, और तीन आइएएस अधिकारियों पूर्व नगरपालिका आयुक्त जयराज पाठक, पूर्व शहरी विकास सचिव रामानंद तिवारी और शहर की जमीन के रिकॉर्ड के प्रभारी पूर्व जिला कलेक्टर प्रदीप व्यास को गिरफ्तार किया गया है.
लेकिन नियमों के ऐसे कई उल्लंघन जांच एजेंसियों या जनता की नजरों में नहीं आ पाए हैं. इनमें से कुछ शहर के स्लम रिहैबिलिटेशन स्कीम के तहत चल रही कई निर्माण परियोजनाएं हैं. इस योजना के तहत डेवलपर्स को झोपड़पट्टीवासियों की खातिर मुफ्त मकान बनाने के लिए दिल खोलकर सुविधाएं दी जाती हैं. लेकिन ऐसी कई परियोजनाओं के लाभार्थियों ने शिकायत की है कि उनसे रजामंदी लेने के जो पत्र दिखाए जा रहे हैं, वे फर्जी हैं. डेवपलर्स को काफी बड़े प्लॉट दिए गए हैं, जबकि इनके बहुत छोटे हिस्से पर झोपड़पट्टीवासियों को मकान दिए गए हैं और मंजूरी से ज्यादा मकान बनाने के इरादे से कई प्लॉट में डेवलपर्स ने झोपड़पट्टीवालों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई है.
पिछले साल, नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट की नेता मेधा पाटकर ने गोलिबार की एक झोपड़पट्टी पुनर्वास बस्ती में नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर अनशन किया था. गोलिबार खार पूर्व में स्थित 140 एकड़ में फैली झुग्गी बस्ती है. उन्होंने यह धरना तब खत्म किया जब राज्य सरकार ने उनके आरोपों की जांच के लिए दो सदस्यीय समिति बनाने पर अपनी सहमति जताई थी. लेकिन इसके कुछ हफ्तों बाद ही मुख्यमंत्री ने पैनल को भंग कर दिया. जब 1995 में स्लम रिहेबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) मंजूर हुई थी, तब महाराष्ट्र सरकार ने अनुमान लगाया था कि पुनर्वास के लिए करीब आठ लाख मकान बनाने की जरूरत है. इसके 15 साल से भी ज्यादा समय बाद इस साल अप्रैल में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने जानकारी दी कि वास्तव में सिर्फ 1.27 लाख मकान ही बनाए गए हैं, जबकि इस बीच झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है. इसके अलावा झुग्गी-झोपड़ीवासियों के संगठनों का भी जोर है कि शहर की आधी से ज्यादा जनसंख्या को मुफ्त मकान देने का विचार खोटा अर्थशास्त्र है, जिसने मुंबई के प्रॉपर्टी बाजार को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है.
साफ है कि यह योजना किसी के लिए भी कारगर नहीं है-सिवाय बिल्डरों, अफसरशाहों और नेताओं के जो इसे जारी रखे हुए हैं. साफ तौर से एसआरए सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने का प्रभावी तंत्र है. विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) और खनन परियोजनाओं के साथ ही अब समाज विज्ञानी एसआरए को भी 'बेदखली के जरिए पूंजी बटोरने' का एक और उदाहरण बताने लगे हैं.
आमची मुंबई की समस्या जितनी विशालकाय है, उतनी विशिष्ट भी. लेकिन इस उपमहाद्वीप का एक और शहर इतनी ही तीव्र चुनौतियों का सामना कर रहा है. मुंबई की तरह समुद्र के किनारे बसा कराची प्रवासियों और शहरी विस्तार के बोझ से दब गया है. मुंबई में धारावी की झोपड़पट्टियों को जहां एशिया की दूसरी सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती माना जाता है, वहीं कराची के ओरांगी स्थित कच्छी आबादी में ऐसी झुग्गियों की संख्या और भी ज्यादा है. हालांकि ये दोनों विशाल शहर एक ही तरह की राजनैतिक अंतर्धारा को साझ करते हैं: कुछ महाराष्ट्रवासी जहां मुंबई की बहु-जातीय सांस्कृतिक विशिष्टता से असहज महसूस करते हैं, वैसे ही सिंधी अपने प्रांत के इस छोर में बढ़ते प्रवासियों को लेकर ऐसा ही दुराव रखते हैं.
वैसे कराची ऐसा स्थान नहीं लगता जहां से किसी समस्या का समाधान तलाशा जाए, लेकिन 2001 में स्वीकार किए गए सिंध स्थानीय निकाय अध्यादेश में ऐसा तरीका पेश किया गया है जिसे मुंबई अपना सकती है बशर्ते मुंबई यह चाहे कि उसके शहरी मामलों के बारे में फैसला करने से जुड़े अधिकारों का विकेंद्रीकरण किया जाए. इस अध्यादेश के नतीजतन, कराची को 18 टाउन और 178 यूनियन काउंसिल में विभाजित कर दिया गया. प्रत्येक के प्रमुख नाजिम (मेयर) और नायब नाजिम (डिप्टी मेयर) थे.
हालांकि, प्रांतीय सरकार के इससे खतरा महसूस करने की वजह से पिछले साल इस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया. लेकिन जब तक यह व्यवस्था रही, इन चुने हुए निकायों ने शहर की प्लानिंग, वित्तीय प्रबंधन और परियोजनाओं के क्रियान्वयन के कार्य को जमीनी स्तर तक लेकर संयोजित किया. लेकिन अब लगता है कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम साबित हो सकता है.

