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दंगे की आंच में सियासत की रोटी

गत 28 जुलाई को जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दंगा प्रभवित कोकराझार जिले के राहत शिविर का दौरा किया तो वे एक व्यक्ति की अनुपस्थिति को देखकर चकित रह गए जिसके वहां होने की उनको उम्मीद थी-असम के शिक्षा और स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिश्व सरमा.

अपडेटेड 5 अगस्त , 2012

गत 28 जुलाई को जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दंगा प्रभवित कोकराझार जिले के राहत शिविर का दौरा किया तो वे एक व्यक्ति की अनुपस्थिति को देखकर चकित रह गए जिसके वहां होने की उनको उम्मीद थी-असम के शिक्षा और स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिश्व सरमा. ''हिमंत यहां क्यों नहीं हैं?'' प्रधानमंत्री ने असम प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दिग्विजय सिंह से पूछा. इस पर अचरज करने वाले मनमोहन अकेले नहीं थे.

तरुण गोगोई के साल 2001 में मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार सरमा की इस तरह से अनुपस्थिति लोगों के मन में लंबे समय से चल रहे इस संदेह की पुष्टि करती थी कि वह अब असम के मुख्यमंत्री गोगोई के सबसे विश्वस्त सिपहसलार नहीं रहे.
अपने इस एकला अवतार में मुख्यमंत्री एक दयनीय शख्सियत बन गए हैं. कांग्रेस हाईकमान उनसे नाराज है. राष्ट्रीय मीडिया उन पर टूट पड़ा है और विपक्षी पार्टियां उन पर वार किए जा रही हैं. असम की बराक घाटी से आने वाले एक मंत्री कहते हैं, ''सरमा उनके लिए पिछले सभी वर्षों में संकटमोचन रहे हैं. अब हम यह जान गए हैं कि राज्‍य को वास्तव में कौन चला रहा था.'' राज्‍य के एक और कांग्रेसी मंत्री कहते हैं, ''हर सरकारी विभाग में उनके वफादार हैं और पूरे राज्‍य के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी अच्छा समर्थन हासिल है जिससे उन्हें मदद मिलती है.''

साल 2011 के विधानसभा चुनावों के दौरान गोगोई ने राज्‍य की कुछ चुनिंदा जगहों पर ही चुनाव प्रचार किया था क्योंकि वह हार्ट सर्जरी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे. पूरे राज्‍य में कांग्रेस के चुनाव प्रचार का जिम्मा सरमा ने ही संभाला था. सरमा की पत्नी का टीवी चैनल न्यूज लाइव अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से हमेशा आगे रहता है.

कांग्रेस के लिए समर्थन जुटाने में इसकी भी महत्वपूर्ण भूमिका थी. सरमा और गोगोई के बीच रिश्तों में दरार तब ही आनी शुरू हो गई थी जब मीडिया ने चुनाव में जीत का श्रेय सरमा को देना शुरू किया और स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उनके कामकाज की खूब तारीफ  की. मुख्यमंत्री के बेटे गौरव के राजनीति में उतरने के बाद संबंधों में दूरी और बढ़ने लगी. जब ज्‍यादातर मंत्री दौड़कर 'असम के राजकुमार' का अभिवादन करने गए, सरमा दूर ही रहे.

कांग्रेस के एक विधायक कहते हैं, ''गौरव यदि किसी मंत्री को फोन करते हैं और उनसे मिलना चाहते हैं तो मंत्री उनके घर पहुंच जाते हैं. लेकिन सरमा विनम्रता से इस युवा नेता को अपने घर या ऑफिस में आने के लिए कहते हैं.''

सरमा और गोगोई के बीच तनाव उस समय अह्ढैल में पूरी तरह गहरा हो गया जब यह खबरें आईं कि सरमा गुप्त रूप से सोनिया गांधी से मिलकर उप-राष्ट्रपति के लिए मुख्यमंत्री गोगोई का नाम सुझकर आए हैं. हालांकि, सरमा ने इसका खंडन किया लेकिन गोगोई की वन मंत्री रकीबुल हुसैन के साथ नजदीकियां बढ़ने लगी जो गौरव के बहुत करीबी हैं.

जून के अंत में मनमोहन सिंह ने सीधे सरमा को फोन कर असम में बाढ़ के हालात की जानकारी ली, तब गोगोई 10 दिन के दौरे पर अमेरिका में थे. इससे दिल्ली के कांग्रेसी दरबार में सरमा की बढ़ती हैसियत एक बार फिर साबित हुई. दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री आपदा प्रबंधन का अध्ययन करने के लिए अमेरिका गए हुए थे. -कौशिक डेका

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