आप जब बिहारी भोजन के बारे में सोचते हैं तो आपके ख्याल में क्या आता है?
जब हम बिहार की बात करते हैं तो अक्सर एक बड़ी गलती कर बैठते हैं. हमें हमेशा आज का संकुचित बिहार याद आता है. मैं पाटलीपुत्र या अशोक के जमाने की बात नहीं कर रहा, न ही बौद्ध या जैन युग की.
औपनिवेशिक काल में बिहार, बंगाल, असम और उड़ीसा (ओडिशा) सब एक साथ थे. झारखंड भी उसी में शामिल था. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि बिहार कहां शुरू होता है और कहां खत्म होता है। खाने-पीने के मुद्दे पर जब भी मैंने बिहार की बात की है, तो मैं गुत्थियों में उलझता चला गया हूं.
मैं सोचता हूं कि बिहारी खाना क्या है? क्या वह भोजपुरियों का खाना है, वह मैथिल खाना है, वह मगही खाना है, या फिर वह भागलपुरी खाना है. पूर्णिया-किशनगंज का खाना या संथालों का खाना, जिनमें मुंडा-उरांव बैगा जनजातियां शामिल हैं.
थोड़ा विस्तार से बताइए, आप इसके बारे में क्या सोचते हैं?
देखिए, यहां मैथिल ब्राह्मण भी मांस-मछली खाते हैं. इसके अलावा, कायस्थ और दलित मुशहर भी नॉनवेज खाते हैं. आदिवासियों के लिए भी कोई खास वर्जनाएं नहीं हैं, लेकिन यह तो अलग बात है.
जैसे पूरे देश में वर्ग विभाजन है, हर जाति में कुछ संपन्न और सक्षम लोग हैं. वैसे ही बिहार में भी है. बिहार के कुछ श्रेष्ठ वर्ग के लोग जो सदियों से नौकरशाही में बने रहे, उनके खाने और आम लोगों के खाने में फर्क नहीं है क्या?
जो लोग इंजीनियर बने, सरकारी नौकरी पा गए और बंगलों में रहने लगे, उनके खाने में मूल बिहारी खाना कितना बचा रह गया है? अगर आप मैथिल हैं और दरभंगा राज के कर्मचारी रहे हैं, तो आपका खाना एक तरह का था. जबकि उसी मिथिलांचल में जो लोग मखाना निकालने का काम करते थे, क्या उनका खाना भी वैसा ही था?
सीधी बात यह है कि खाना सिर्फ जाति से नहीं, वर्ग से भी तय होता है. जो लोग बाहर जाते थे, वे वहां के स्वाद भी साथ लाते थे और वे स्वाद धीरे-धीरे बिहार के व्यंजनों में शामिल होते गए.
क्या सचमुच यहां संपन्न वर्ग और अभावग्रस्त वर्ग के भोजन में फर्क रह गया है?
एक अनुभव बताता हूं. पिछले दिनों मैं सीवान के एक जमींदार के घर खाना खाने गया था. कभी उनके दरवाजे पर हाथी बंधता था. उन्होंने पारंपरिक भोजन कराया. परवल इतना नरम था कि मुंह में घुल जाता था.
वहीं एक सज्जन ने चूड़ा-मटर खिलाया तो दूसरे ने पूछा- “चूड़ा बासमती का था या काला जीरा वाला? मटर कहां का था?” मतलब वे बारीक सूत काट रहे थे. इससे मुझे समझ आया कि लोग खाने को लेकर कितने सचेत और परिष्कृत थे.
मगर अभावग्रस्त लोग भी कुछ न कुछ तो खाते ही होंगे. मुझे लगता है कि बिहार के खाने की कई परतें हैं. एक भौगोलिक, दूसरी जातीय और तीसरी वर्गीय. गरीब का खाना और अमीर का खाना अलग-अलग है.
मैंने एक गरीब आदमी को देखा था जो खीर खाना चाहता था, तो वह शकरकंद की खीर खा रहा था. उसमें चीनी डालने की जरूरत भी नहीं थी. मुझे यह बहुत अच्छा लगा तो कुल मिलाकर अलग-अलग परतें हैं. मैं काफी समय से इस विषय पर विचार कर रहा हूं. आरा के मेरे एक मित्र भी इस काम में मेरी मदद कर रहे हैं.
बिहार में रेडीमेड फूड की पुरानी परंपरा रही है, जैसे भोजपुर के इलाके में लोग सत्तू खाते हैं और मिथिला में दही-चूड़ा. यह हमारे समाज के बारे में क्या बताता है?
यह अच्छा प्रयोग है. आपको कुछ भी पकाने की जरूरत नहीं पड़ती. यह भोजन टिकाऊ भी है और पौष्टिक भी है. एक तरह से यह सर्वगुण संपन्न है, लेकिन यह हमारे समाज के बारे में यह भी बताता है कि हमारी अधिकांश जनता अभावग्रस्त रही है.
जजमानी व्यवस्था में जो कुछ मिल जाता, उसे खा लिया और काम चला लिया. दूसरी तरफ, मिथिला के भोज की बड़ी चर्चा होती है कि वहां खाने की ढेर सारी विविधताएं दी जाती हैं, मगर भोजन की बर्बादी भी बहुत होती है. ऐसा क्यों?
यह सिर्फ मिथिला में नहीं है. कश्मीर में भी वाजवान की परंपरा है, जहां लोग खाते हैं, उगलते हैं और फिर खाते हैं. यह आदमी का अहंकार है कि उसके यहां 56 व्यंजन बने हैं. हालाँकि वास्तव में 21 या 30 ही होते हैं. उसमें सामिष भी होते हैं और निरामिष भी.
यह खाने के ऐश्वर्य का प्रदर्शन है. एक अवध के बाबर्ची हमारे गुरु थे. उन्होंने कहा था, “गुरु, ये सब अमीरों के चोचले हैं और गरीबों की रोटियां हैं.” पंगत कितनी बड़ी थी, वेरायटी कितनी थी, कितने लोग आए थे. इन सबमें ऐश्वर्य का प्रदर्शन किया जाता है.
हां, साथ में गरीब कुछ खा लेता था. बिहार में मुशहर जाति के लोग पहले चूहा खाते थे और निषाद जाति के लोग केकड़ा खा लेते थे. इससे उनका मुफ्त में पोषण हो जाता था. मगर बाद में वे कंठी लेकर वैष्णव बनने लगे और इस मुफ्त मांसाहार को त्यागने लगे.
अब उनमें कुपोषण की समस्या बढ़ गई है. जब दलितों को लगता है कि सवर्णों के तौर-तरीके अपनाकर वे जाति व्यवस्था में ऊपर उठ सकते हैं, तो वे कुछ चीजें त्याग देते हैं. इससे उनका उच्चीकरण हो जाएगा. होता है या नहीं, यह अलग विषय है.
मेरा मानना है कि यह मरीचिका है. कंठी धारण करके वैष्णव बन जाने से बराबरी नहीं मिल जाती. इससे पहले दलित इसाई और मुसलमान बनकर भी देख चुके हैं. आज भी सिखों, मुसलमानों और ईसाइयों में दलित हैं. इसका कोई लाभ नहीं, नुकसान ही है.
हाल के वर्षों में बिहार में चंपारण मटन काफी लोकप्रिय हुआ है. जगह-जगह इसकी दुकानें खुलने लगी हैं. यह कैसी परिघटना है?
आपको कुछ भी बेचने के लिए एक कहानी चाहिए. यह उसी का उदाहरण है. पहले जो अहूना मटन था, उसे आपने नया नाम दे दिया. अब उसी कहानी के सहारे सब चल रहा है. ठीक ऐसा ही मुरादाबादी बिरयानी के नाम पर हो रहा है. आज हर जगह इसकी दुकानें हैं, लेकिन मैंने 15 साल पहले तक मुरादाबादी बिरयानी का नाम तक नहीं सुना था, जबकि उस इलाके में मैं पिछले 50 साल से आता-जाता रहा हूं,
अब बिहारी भोजन को लेकर आपका अंतिम कमेंट क्या है?
बिहार का खाना बेहद विविधरंगी है. इसमें भूगोल की भिन्नता है, जाति का अंतर है और वर्ग का भेद भी है. इसलिए इसमें गहन शोध की जरूरत है. जो लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उन्हें सबसे पहले अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए.

