भारत में ऑपरेशनल शॉपिंग सेंटर्स का करीब पांचवां हिस्सा असल में ‘वीरान मॉल’ हैं. इनमें फ्लोर खाली पड़े हैं, ब्रांड मिक्स खराब है साथ ही कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर के चलते कंज्यूमर यहां रुख करना नहीं चाहते.
जिन 32 शहरों में सर्वे के आधार पर यह नतीजा निकला है उनमें 365 में से 74 और 1.55 करोड़ वर्ग फुट में ये मॉल फैले हैं. यह निष्कर्ष नाइट फ्रैंक इंडिया के नए अध्ययन ‘थिंक इंडिया, थिंक रिटेल 2025—वैल्यू कैप्चर: अनलॉकिंग पोटेंशियल’ का हिस्सा है, जिसने देशभर में खुदरा रियल एस्टेट को मैप किया है.
मॉल सूने होने की बात विरोधाभासी लग सकती है क्योंकि भारत उपभोग आधारित बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जहां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह के ब्रांड बाजार में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहते हैं. हालांकि मॉल के तंत्र में इनके गैर-जरूरी होने का एक कारण यह है कि 10-15 साल पहले, जब भारत में धड़ाधड़ निर्माण हो रहे थे तो बहुत सारे मॉल बनते गए. लेकिन, उनमें से कई खराब डिजाइन, पुराने लेआउट, अपने इलाके की आबादी में बदलाव, खराब मैनेजमेंट या महज बुनियादी चीजों को अपग्रेड न करने के कारण प्रचलन से बाहर होते गए.
नाइट फ्रैंक इंडिया में नेशनल डायरेक्टर-रिसर्च अंकिता सूद कहती हैं, “मॉल को लगातार मॉनिटरिंग, अपग्रेडेशन, फिट-आउट, प्लानिंग और ब्रांड की समूची मार्केटिंग रणनीति की जरूरत होती है. अगर इनमें से कोई भी चीज अपनी जगह पर नहीं है तो मॉल का पतन तय है.”
यह सिर्फ छोटे शहरों की समस्या नहीं है. रिपोर्ट कहती है कि बड़े शहरों में इस ठप रियल एस्टेट का 1.19 करोड़ वर्गफुट हिस्सा है. इससे संकेत मिलता है कि भारत के शुरुआती और सबसे ज्यादा जमे-जमाए कुछ मॉलों को ग्राहकों की बदलती उम्मीदों, ब्रांडों की नई बनती रणनीतियों और अनुभव आधारित रिटेल फॉर्मेट के उभार के साथ तालमेल बिठाने में मुश्किल हुई है.
कई पुराने मॉलों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह थी कि उन्हें ‘स्ट्रेटा सोल्ड’ किया जाता था, जहां डेवलपर अलग-अलग ब्रांड को टुकड़ों में जगह बेचते थे. इसका मतलब था कि रिटेल यूनिट यानी खुदरा दुकान अक्सर सोच-समझकर चुने जाने के बजाय सबसे अधिक बोली लगाने वाले को मिल जाती थी. सूद बताती हैं कि लेकिन मॉल तब सबसे अच्छा काम करते हैं जब एक ही ऑपरेटर पूरी संपत्ति का प्रबंध करता है और अलग-अलग तरह के ग्राहकों को लुभाने और खरीदार बढ़ाने के लिए ब्रांड मिक्स पर निगाह रखता है.
पुराने होते इन्फ्रास्ट्रक्चर ने भी गिरती परफॉर्मेंस को और बिगाड़ा है. पार्किंग और वॉशरूम से लेकर सामने के हिस्से तक हर चीज को समय-समय पर नयापन देने की जरूरत होती है. यहां तक कि मल्टीप्लेक्स या किसी बड़े ब्रांड जैसे एक प्रमुख किरायेदार के जाने से भी मॉल का ग्राहक आकर्षण काफी घट सकता है.
रिपोर्ट में 48 लाख वर्गफुट के कुल एरिया वाले 15 मॉल की पहचान की गई है, जिनमें बहुत संभावनाएं हैं और अगर उन्हें ठीक से नया जीवन दिया जाए तो वे हर साल रेंटल रेवेन्यू-किराया कमाई- से 357 करोड़ रुपये तक कमा सकते हैं. सूद कहती हैं, “आज मॉल को होटल की तरह चलाने की जरूरत है, जिसमें सेंसर वाला एक्सपीरियंस, कंसीयज-स्टाइल की सर्विस (लोगों की मदद के लिए असिस्टेंट हों) और बहुत अच्छी तरह से मेंटेन हाउसकीपिंग हो. ग्राहक इसी स्तर की आवभगत की उम्मीद करते हैं.”

