इन दिनों 'ज्ञान भारत मिशन' के तहत पूरे भारत में बिखरी दुर्लभ पांडुलिपियों के सर्वेक्षण का काम चल रहा है. इस मिशन में बिहार सरकार भी सक्रिय है और अब तक राज्य में सात लाख से अधिक पांडुलिपियां खोजी जा चुकी हैं. सर्वेक्षित पांडुलिपियों की संख्या के लिहाज से मध्य प्रदेश और राजस्थान के बाद बिहार देश में तीसरे स्थान पर है.
मगर इस बीच 14वीं सदी के महाकवि विद्यापति की एक दुर्लभ पांडुलिपि के चोरी होने का मामला फिर से चर्चा में आ गया है. इसको लेकर राज्य की निगरानी इकाई सक्रिय है और राजभवन ने दरभंगा के संस्कृत विश्वविद्यालय को इस मामले पर तेजी से कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.
राजभवन सचिवालय से संबंधित पत्र 17 अप्रैल को जारी हुआ है. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति को लिखे इस पत्र में 15 लंबित मामलों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं. इसके दसवें नंबर पर शिकायतकर्ता पंकज कुमार की तरफ से उठाए गए इस मामले का जिक्र है. वहीं, 21 जनवरी, 2026 को गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को भी सरकार की तरफ से इस मामले में कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था.
महाकवि विद्यापति द्वारा हस्तलिखित भागवत पुराण समेत दूसरी कई पांडुलिपियों की चोरी की यह घटना 2003 में हुई थी. उस वक्त विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे पंकज कुमार ने इसको लेकर आंदोलन शुरू किया था. पंकज बताते हैं, “पहले ये पांडुलिपियां कई स्तरों की सुरक्षा में रखी जाती थीं. मगर चोरी की घटना से एक दिन पहले किसी विद्वान अतिथि को दिखाने के लिए इन्हें बाहर निकाला गया और फिर बाहर ही छोड़ दिया गया. ऐसे में अगले दिन इनकी चोरी हो गई. तब 29 नवंबर, 2003 को इस संबंध में एफआईआर दर्ज हुई थी.”
पंकज बताते हैं कि उस वक्त छात्रों ने इस घटना के खिलाफ आंदोलन और आमरण अनशन शुरू किया था. तब विश्वविद्यालय के कुलपति और पूर्व आईएएस किशोर कुणाल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि चोरी की इस घटना की जांच इंटरपोल से करवाने की सिफारिश की जाएगी. मगर फिर कुछ नहीं हुआ. पंकज के मुताबिक, "इसके बाद हमें फिर से आंदोलन करना पड़ा. आंदोलन को दबाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने हम पर हमले करवाए और मेरे ऊपर झूठा मुकदमा किया गया. मगर मैं आज भी इसकी लड़ाई लड़ रहा हूं."
पंकज आरोप लगाते हैं कि यह सब विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ है. वे दावा करते हैं, “2010 में हाजीपुर में कस्टम विभाग ने कुछ लोगों को इनमें से कुछ पांडुलिपियों के साथ पकड़ा भी था. अगर उस वक्त ठीक से जांच हुई होती तो पांडुलिपियां मिल जातीं. मगर विश्वविद्यालय प्रशासन ने न तब सक्रियता दिखाई और न ही अदालत में. ऐसे में आरोपी छूटते चले गए.”
हालांकि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ब्रजेशपति त्रिपाठी कहते हैं, “यह सच है कि पांडुलिपियां चोरी हुई थीं और अभी इसकी जांच निगरानी विभाग कर रहा है. मगर राजभवन की तरफ से आज की तारीख तक हमें इस मामले में कोई पत्र नहीं मिला है. वैसे इस मामले की जांच समिति के प्रभारी शोध-प्रकाशन और लाइब्रेरी के इंचार्ज प्रोफेसर दिलीप झा हैं.” त्रिपाठी मसले पर इसके अलावा और कोई जानकारी नहीं देते.
ये कोई आम पांडुलिपि नहीं हैं
विद्यापति की इस हस्तलिखित पांडुलिपि का क्या महत्व है, यह जानने के लिए हमने मिथिला की धरोहरों के विशेषज्ञ शिव कुमार मिश्र से बातचीत की. वे कहते हैं, “महाकवि विद्यापति पूर्वी भारत की सांस्कृतिक परंपरा के सबसे बड़े स्तंभ माने जाते हैं. मैथिली के साथ-साथ उनका संस्कृत का ज्ञान भी अद्भुत था. उन्होंने भागवत पुराण को अपने हाथों से तिरहुता लिपि में लिखा था. यह पांडुलिपि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे समझ आता है कि 14वीं शताब्दी में भी तिरहुता लिपि का प्रयोग होता था.”
शिव कुमार मिश्र कहते हैं, “जिस तरह आज भारत सरकार पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए सर्वेक्षण करवा रही है, उसी तरह 1916 में राज दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह ने भी मिथिला क्षेत्र की पांडुलिपियों का सर्वेक्षण कराया था. इसी दौरान जोगियारा गांव के एक पंडित के घर में यह पांडुलिपि और विद्यापति के समकालीन पक्षधर मिश्र द्वारा लिखित विष्णु पुराण मिली थी. विष्णु पुराण बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना को दिया गया था जो अब तक सुरक्षित है. भागवत पुराण को उन्होंने अपनी लाइब्रेरी राजनगर में रखा था, जिसे बाद में दरभंगा लाया गया. जब संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उनके उत्तराधिकारी महाराजा कामेश्वर सिंह ने कई दुर्लभ ग्रंथों को विश्वविद्यालय को दे दिया था. विद्यापति की हस्तलिखित पांडुलिपि को हम सुरक्षित नहीं कर पाए, यह दुर्भाग्य की बात है.” शिव कुमार मिश्र बिहार रिसर्च सोसाइटी से जुड़े रहे हैं.
रामेश्वर सिंह द्वारा कराए गए पांडुलिपियों के सर्वेक्षण में हजारों ग्रंथ मिले थे. इनकी बाद में कैटलॉगिंग कराई गई, जिसे चार खंडों (वॉल्यूम) में प्रकाशित किया गया. इनमें से 12,500 ग्रंथ दरभंगा की मिथिला रिसर्च सोसाइटी को दिए गए, 5500 संस्कृत विश्वविद्यालय को और 125 पटना के बिहार रिसर्च सोसाइटी को दिए गए. शिव कुमार मिश्र बताते हैं, “इन ग्रंथों में सबसे महत्वपूर्ण विद्यापति की वह पांडुलिपि थी, जो चोरी हो गई. हालांकि इससे पहले मिथिला रिसर्च सोसाइटी में भी कुछ ग्रंथों की चोरी हुई है. अगर सरकार अब भी गंभीरता से प्रयास करे तो उन ग्रंथों का पता लगाया जा सकता है.”
ज्ञान भारत मिशन से अब तक क्या-क्या मिला
इस बीच बिहार सरकार का कला-संस्कृति विभाग, जो ज्ञान भारत मिशन की नोडल एजेंसी है, लगातार पूरे राज्य में सर्वेक्षण करा रहा है. इस दौरान बोधगया के महाबोधि मंदिर में दलाई लामा द्वारा लाए गए तिब्बती ग्रंथ, नवादा में उदासीन संप्रदाय के पास 350 साल पुराना गुरु ग्रंथ साहिब और कई महत्वपूर्ण ग्रंथ मिले हैं. बिहार में पहले से खुदाबख्श लाइब्रेरी में अरबी और फारसी के दुर्लभ ग्रंथ, बिहार रिसर्च सोसाइटी के पास राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लाए गए बौद्ध धर्म से जुड़े हजारों ग्रंथ और नव नालंदा महाविहार के पास कई दुर्लभ ग्रंथ सुरक्षित हैं.
इस अभियान के बिहार नोडल अधिकारी और पुरातत्व निदेशक कृष्ण कुमार बताते हैं, “सबसे अच्छी बात है कि हमारे मुख्य सचिव लगातार इस अभियान में दिलचस्पी ले रहे हैं. अब तक सात लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं. इनमें सबसे अधिक मधुबनी जिले के सौराठ महासभा में मिली हैं, जिन्हें पंजी कहा जाता है. विद्यापति की पांडुलिपि के बारे में हमें अभी पता चला है. हम इस पर भी ध्यान देंगे.”

