
6 मई की वह शाम ओरेगन के यूजीन में किसी भी अन्य उदास शाम की तरह ही उतरी थी. आसमान से इतनी बारीक फुहार गिर रही थी मानो बादलों पर किसी ने छलनी रख दी हो. पैसिफिक नॉर्थवेस्ट की यह हल्की, ठंडी और नम उदासी यहां की लगभग स्थाई मनोदशा है. सूरज अक्सर बादलों के पीछे यूं निर्वासित रहता है जैसे किसी पुराने स्कैंडिनेवियन उपन्यास का कोई गुमसुम किरदार.
मैं मैकेंजी हॉल (जहां मैं काम करता हूं) से स्पेंसर व्यू स्थित अपने घर की ओर पैदल जा रहा था. मेरे हाथ में सेफवे से लाया गया एक थैला था जिसमें ढाई किलो आटा और सवा लीटर दूध था. दिमाग में प्रवास के बाकी बचे दस दिनों का गणित चल रहा था. मैंने ChatGPT से पूछा था कि अगर मैं एक समय में पांच रोटियां सेंकू तो दस दिन के लिए कितना आटा चाहिए होगा. परदेस के इस मशीनी जीवन में एक तरफ मैं AI से अपनी रोटियों का मामूली गणित पूछ रहा था और दूसरी तरफ मेरे दिमाग के एक कोने में उस शख्स का इतिहास गूंज रहा था जिसने कभी पूरी मानवीय चेतना का गणित ही बदल देना चाहा था.
जब आसमान हफ्तों तक काले बादलों की गिरफ्त में रहे और बारिश इतनी धीमी गिर रही हो कि छाते की दरकार न हो, पर इतनी लगातार हो कि रेनकोट पहनना लाजिमी हो जाए, तो मन अनायास ही एक गहरी उदासी में डूब जाता है. मुझे लगता है कि मेरे भीतर उदासी का एक सूखा कुआं है, जिससे गाहे-बगाहे दुख रिसता रहता है. उस दिन मैं दिन भर अपने ऑफिस में बैठकर मां आनंद शीला की किताब डोंट किल हिम पढ़ता रहा. यह किताब मैंने सात-आठ साल पहले भी पढ़ी थी और एक धर्मगुरु तथा उसके साम्राज्य के बनने-बिगड़ने की कहानी पढ़कर हतप्रभ रह गया था. सबसे ज्यादा दुख मुझे अपने 'हीरो' का वह मानवीय और स्याह चेहरा देखकर हुआ था जिसकी झलक उसके आदर्शवादी प्रवचनों में कहीं नहीं मिलती.

इस किताब के कई अध्याय ओरेगन के एक उजाड़ और वीरान शहर पर केंद्रित थे. इनमें बताया गया था कि कैसे ओशो की सबसे खास सिपहसालार, मां आनंद शीला, ने बीहड़ों के बीच एक पूरा शहर खड़ा कर दिया और फिर कैसे वह उसी शहर के मलबे के नीचे दब गईं. आठ साल पहले मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं यह किताब ठीक उसी जगह, उसी बियाबान में फिर पढूंगा. उसी शहर के आसमान के नीचे आधी रात तक जागूंगा और उस कम्यून के दरवाजे पर खड़ा होऊंगा जहां 'भगवान रजनीश' ने एक 'नया मनुष्य' गढ़ने की प्रयोगशाला स्थापित की थी.
ओरेगन और मेरा निजी भूगोल
भारत से अमेरिका आने से पहले जब मैं गूगल मैप पर ओरेगन को जूम-इन करता था तो एक नाम बार-बार उभर कर आता था, रजनीशपुरम. इसी जगह 1980 के दशक की शुरुआत में ओशो के अनुयायियों ने 64,000 एकड़ के एक विशाल रैंच पर अपना शहर बसाया था. ये लोग खुद को संन्यासी कहते थे, गेरुआ वस्त्र पहनते थे और एक नए मानव में तब्दील होने का ख्वाब देखते थे. 1985 तक यह कम्यून पांच हजार से अधिक निवासियों वाला एक पूरा नगर बन चुका था.
2014 के आसपास जब मेरे हाथ में पहला स्मार्टफोन आया था तो मैं जिन लोगों के प्रभाव में आया उनमें से एक था 'सब आसान है' की रट लगाने वाला एक मोटिवेशनल स्पीकर जो शब्दों की चरस बेच रहा था. दूसरा शख्स वह था जो गो-मूत्र से कैंसर ठीक करने का दावा करता था, पेट की जठराग्नि प्रज्वलित रखने और एल्युमिनियम के बर्तनों में खाना न खाने की सलाह देता था. उसने एक हद तक मुझे यह विश्वास दिला दिया था कि हम झूठी आजादी मना रहे हैं और हमारा संविधान महज एक नकल है. और तीसरा आदमी, जिसे मैं 3gp क्वालिटी में डाउनलोड करके लूप मोड में बार-बार सुनता था, ओशो रजनीश.
मुझे नहीं पता कि मैंने उसकी कितनी बातों को अपने जीवन और व्यवहार में उतारा मगर दोस्तों के बीच हवा बांधने के लिए मैं अक्सर उसके उद्धरण दिया करता था. फिर कहीं से जुगाड़ करके संभोग से समाधि पढ़ी तो दिमाग और भी चकरा गया. उस समय मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ओरेगन कहां है. सच कहूं तो तब मुझे यह भी नहीं पता था कि पूना (पुणे) कहां है, वहां जाने का किराया तो दूर की बात थी. यह किसी बेतहाशा जंगली सपने से भी परे की बात थी कि कुछ साल बाद मैं उसी राज्य में पढ़ने जाऊंगा, बड़ी शिद्दत से सीखी गई उन 3gp क्वालिटी वाली सीखों पर खुद ही सवाल खड़े करूंगा और आखिरकार किसी छुट्टी वाले दिन उस धूल भरे रास्ते पर गाड़ी दौड़ाऊंगा जिस पर कभी भगवान रजनीश की 93 रोल्स रॉयस कारें दौड़ा करती थीं.
सुबारू, डग और दो अलग-अलग ओरेगन
मैं पिछले कुछ सालों से यहां रह रहा हूं और उतने ही समय से रजनीशपुरम जाने की योजना भी बना रहा हूं. आखिरकार पिछले वीकेंड यह योजना सिरे चढ़ ही गई. मैं और मेरा एक दोस्त डग, जो एक बेहतरीन इतिहासकार होने के साथ-साथ एक उम्दा इंसान भी है, और जिसकी ओशो में दिलचस्पी नेटफ्लिक्स की 'वाइल्ड वाइल्ड कंट्री' डॉक्यूमेंट्री देखकर जगी थी, ने तय किया कि हम एंटिलोप चलेंगे.

यात्रा की सुबह डग अपनी पुरानी सुबारू कार लेकर मेरे घर के बाहर आ खड़ा हुआ. डग पर्यावरण-इतिहास का शोधार्थी है तो जाहिर है कि वह ओरेगन के जंगलों, नदियों, बांधों और वन्यजीवों का एक चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया है. हम अपना दो दिन का तामझाम समेटकर निकले. हाइवे 126 से होते हुए जैसे ही हम विलमेट नेशनल फॉरेस्ट में घुसे, यूजीन की बारिश धीरे-धीरे पीछे छूट गई और डगलस फ़िर के घने, नम जंगल हमारी कार की खिड़की में भर गए.
मगर जैसे ही हमने कैस्केड रेंज पार की, मौसम ने अचानक करवट ली. पेड़ों की जगह अब पोंडरोसा पाइन ने ले ली. सामने खुला नीला आसमान, चटक धूप और ऊंचा रेगिस्तानी इलाका था. यह वही वृष्टिछाया क्षेत्र है जिसकी वजह से पश्चिमी ओरेगन हरा-भरा और नम रहता है जबकि पूर्वी हिस्सा सूखा और धूल भरा. उसी सूखे, वीराने में कहीं हम 'बिग मडी रैंच' की तरफ जा रहे थे, जिसे 1981 में ओशो के अनुयायियों ने खरीदा और उसे एक नया नाम दिया- रजनीशपुरम.
रास्ते में हम साल्ट क्रीक फॉल्स और ओडेल लेक के पास भी रुके. यह ओरेगन का वह चेहरा था जो पर्यटन के पोस्टरों पर छपता है. जंगल, झरने, नीली झीलें, साफ आसमान, ताजी हवा और पगडंडियां. लेकिन हम अपने मन में जो नक्शा लेकर चले थे वह किसी टूरिस्ट ब्रोशर का नहीं बल्कि 1980 के दशक की अमेरिकी राजनीति, उसके खौफ और उसकी महत्वाकांक्षाओं का नक्शा था.
एक भारतीय गुरु का अमेरिकी सपना
भारत में शायद ही किताबों की कोई ऐसी दुकान हो जहां ओशो की किताबें न बिकती हों. रेलवे स्टेशन से लेकर फुटपाथ तक, और अकादमिक किताबों की दुकानों से लेकर एयरपोर्ट और महंगे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तक. मेरी नजर में वे भारत के पहले सेलिब्रिटी गॉडमैन हैं. आप यूट्यूब पर ओशो सर्च कीजिए, आपको हजारों प्रवचन, वीडियो क्लिप, ऑडियोबुक, पॉडकास्ट, सच्चे-झूठे चमत्कारी किस्से, साजिश के सिद्धांत और दुनिया के लगभग हर मुद्दे पर ओशो का नजरिया मिल जाएगा.

मेरे अपने दोस्तों में शायद ही कोई ऐसा हो जो ओशो को न जानता हो या जिसने जीवन में कभी उनका प्रवचन न सुना हो. इनमें 12वीं में पढ़ाई छोड़ देने वाले लड़कों से लेकर सब्जी मंडी में काम करने वाले मजदूर और पीएचडी रिसर्चर्स से लेकर कई किताबें लिख चुके शिक्षाविद तक शामिल हैं. आज की इस डिजिटल दुनिया में शायद ही कोई ऐसा हो जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ओशो के विचारों की नकल न करता हो. और ऐसा हो भी क्यों न! एक ऐसा धर्मगुरु, जिसने अपने सफर की शुरुआत विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के शिक्षक के रूप में की और जिसने दुनिया के तमाम स्थापित धर्मों से लेकर इंसान के अंतर्मन की सबसे जटिल संवेदनाओं तक पर अपनी बेबाक राय रखी.
सेक्स जैसे विषय पर उन्होंने इतने बेबाक और क्रांतिकारी तरीके से बात की कि उनकी पहचान ही एक 'सेक्स गुरु' के रूप में बन गई. उस दौर में, जब इंटरनेट और संचार के साधन आज की तरह सुलभ नहीं थे, ओशो का प्रभाव अचंभित करने वाला था. उनके ऐसे-ऐसे अनुयायी हुए जिन्होंने अपना करोड़ों का कारोबार छोड़ दिया, अपने चमकते करियर को दांव पर लगा दिया और न जाने दुनिया के किन-किन कोनों से आकर उनके दर पर रमता जोगी हो गए.
उनके इसी बेतहाशा प्रभाव के चलते भगवान ओशो रजनीश के पंथ की मुश्किलें भी शुरू हो गईं. मां आनंद शीला अपनी किताब में लिखती हैं कि 1970 के दशक के अंत तक पुणे के पहले आश्रम की सफलता के साथ-साथ उनका विरोध भी गहराने लगा था. हिंसक थेरेपी ग्रुप, सेक्स पर केंद्रित भाषा और मीडिया की सनसनी ने ओशो को 'सेक्स गुरु' और 'रोल्स रॉयस गुरु' के रूप में कुख्यात कर दिया. भारत सरकार, स्थानीय प्रशासन और टैक्स कानूनों के बढ़ते दबाव के बीच, उन्होंने अपने आंदोलन के लिए एक नया भूगोल तलाशने का फैसला किया. एक ऐसी जगह जहां बाहरी दखलंदाजी के बिना 'नई मनुष्यता' का प्रयोग किया जा सके.
यह जिम्मेदारी तीस साल की सेक्रेटरी शीला अंबालाल पटेल को सौंपी गई, जिनका नाम रजनीश ने बदलकर मां आनंद शीला रख दिया था. शीला ने बड़ौदा विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान और अमेरिका की मॉन्टक्लेयर स्टेट यूनिवर्सिटी से कला की पढ़ाई की थी. पिता के माध्यम से वे रजनीश के संपर्क में आईं और खुद को पूरी तरह उनके प्रति समर्पित कर दिया. खैर, मेरा मकसद यहां ओशो या शीला की जीवनी सुनाना नहीं है इसलिए मैं केवल उतने ही ब्योरे दूंगा जो इस कहानी के लिए जरूरी हैं.

मई 1981 में मां आनंद शीला और उनकी टीम ने सक्रिय रूप से एक नई जगह की तलाश शुरू की. इससे ठीक पहले कि ओशो गुप्त रूप से पुणे छोड़कर अमेरिका के लिए निकलते, शीला ने चुपचाप एक धनी अनुयायी को संभावित जमीन तलाशने भेजा. अंततः उनकी नजर ओरेगन के बिग मडी रैंच पर जाकर टिकी. एक विशाल, सूखा और कम आबादी वाला इलाका जो खेती और पशुपालन के पारंपरिक तरीकों से जूझ रहा था.
इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार, जुलाई 1981 में शीला ने व्यक्तिगत रूप से इस 64,000 एकड़ के रैंच का सौदा 5.75 मिलियन डॉलर (करीब 57.5 लाख डॉलर यानी आज के हिसाब से करीब 54-55 करोड़ रुपए) नकद चुकाकर पक्का किया था. यह भारी-भरकम रकम दुनिया भर में फैले संन्यासियों द्वारा अपना सब कुछ बेचकर जुटाए गए चंदे का नतीजा थी. शीला बताती हैं कि यह खरीद ओशो के दबाव के चलते इतनी जल्दबाजी में हुई थी कि जमीन के कानूनी अधिकारों और दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिमों की वैसी जांच-पड़ताल नहीं हो पाई जैसी आम तौर पर होती है. लेकिन शायद आध्यात्मिक परियोजनाएं जमीनी हकीकतों की बुनियाद पर नहीं बल्कि महत्वाकांक्षाओं की हवा में ही परवान चढ़ती हैं.
यहां मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि शीला की किताब में दर्ज ब्योरे उनका 'अपना सच' हैं. एक शोधार्थी के तौर पर मैं जानता हूं कि किसी भी आत्मकथा में नायक अक्सर अपनी कहानी को सही ठहराता है. शीला का सच, अमेरिकी न्याय व्यवस्था का सच और ओशो के बाकी अनुयायियों का सच, ये तीनों अलग-अलग दिशाओं में भागते हैं.
शीला इसे एक यूटोपिया के निर्माण और ओरेगन के स्थानीय निवासियों की कट्टरता की कहानी बताती हैं जबकि अमेरिकी एजेंसियां इसे एक आपराधिक कल्ट मानती हैं. वास्तविक सत्य शायद इन दावों के बीच कहीं गहरे दफ्न है. मैं यहां किसी का बचाव करने नहीं आया था, मैं तो बस उस इतिहास के मलबे को अपनी आंखों से देखना चाहता था.
जमीन खरीदे जाने के महज कुछ ही महीनों में वहां सड़कें, प्रीफैब घर, जलाशय, सीवेज सिस्टम, बिजली और एक एयरस्ट्रिप खड़ी कर दी गई. सैकड़ों सालों से बंजर पड़े वीराने में कुछ ही दिनों में एक पूरा शहर आबाद हो गया. इस पूरे दौर में ओशो लगभग मौन रहे और उनकी प्रमुख कर्ता-धर्ता मां शीला मीडिया के सवालों का डटकर सामना करती रहीं. लेकिन कोई भी यूटोपिया सिर्फ अपनी ही हदों में सिमट कर नहीं रह सकता, उसके चारों तरफ एक बाहरी दुनिया भी होती है, जो उसे देखती है, उससे डरती है और कभी-कभी उससे चिढ़ती भी है.

एंटिलोप: 34 लोगों का शहर और हजारों की परछाइयां
डग और मैं जब एंटिलोप पहुंचे तो शाम ढलने को थी. इस वीराने के सबसे नजदीक अगर कोई ऐसा शहर है जिसे सच में एक कस्बा कहा जा सके तो वह है 'मद्रास'. एंटिलोप से करीब 35 मील दूर. ओरेगन के इस बीहड़ में 'मद्रास' नाम सुनना किसी भी भारतीय के लिए एक अचरज भरा अनुभव होता है. दिलचस्प बात यह है कि इस अमेरिकी शहर का भारत से गहरा ऐतिहासिक संबंध है. इसका नाम उस मशहूर सूती कपड़े ('मद्रास चेक') से प्रेरित होकर रखा गया था जो खुद हमारे भारतीय शहर मद्रास (अब चेन्नई) के नाम पर था. यह इतिहास की एक खूबसूरत विडंबना ही है कि भारत का एक रहस्यमयी गुरु यहां अमेरिका में अपना यूटोपिया बसाने आया और उसके ठीक बगल में एक शहर पहले से ही भारत की एक पुरानी पहचान ओढ़े बैठा था.
जहां मद्रास की आबादी लगभग दस हजार है, वहीं 2025 के ताजा आंकड़ों के अनुसार एंटिलोप में बमुश्किल 34 लोग रहते हैं. हम दो दोस्तों ने इस छोटे से टाउन को 10-15 मिनट में ही नाप लिया. मुख्य सड़क के किनारे लगा एक बोर्ड बता रहा था कि यह कभी पशुपालकों का एक छोटा-सा कस्बा हुआ करता था. आज यहां के लगभग सभी मकान जर्जर अवस्था में हैं. उन्हें देखकर लगता है कि जरा सी तेज हवा का झोंका आया तो ये भरभरा कर गिर पड़ेंगे.

शीला लिखती हैं कि जब रजनीशी (ओशो के अनुयायी) यहां आए थे तो आधे से ज्यादा घर पहले से ही वीरान पड़े थे. युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर चुके थे और पीछे छूट गए थे केवल उम्रदराज किसान और उनकी असुरक्षा की भावना. शुरू-शुरू में कम्यून की टीम ने एंटिलोप में सिर्फ एक घर लिया ताकि वहां से फोन-लाइन और डाक सुचारू रखी जा सके. पर धीरे-धीरे जब सैकड़ों संन्यासी आसपास बसने लगे तो स्थानीय लोगों को लगा कि उनका छोटा-सा संसार किसी अनजानी और विदेशी विचारधारा के कब्जे में जा रहा है.
शीला के मुताबिक, विरोध इतना बढ़ा कि रजनीशियों को मजबूरन स्थानीय चुनाव लड़ना पड़ा. उन्होंने एंटिलोप की सिटी काउंसिल पर नियंत्रण कर लिया और शहर का नाम बदलकर 'रजनीश' रख दिया. यह सब अमेरिकी लोकतंत्र के नियमों के दायरे में रहकर किया गया सत्ता-हस्तांतरण था लेकिन भावनात्मक तौर पर वहां के लोगों ने इसे एक 'कब्जा' ही माना. एक ओर ओशो के अनुयायी इसे अपनी 'रचनात्मक राजनीति' की जीत मान रहे थे तो दूसरी ओर ग्रामीण ओरेगन के श्वेत निवासियों के लिए यह सीधे तौर पर एक सांस्कृतिक अतिक्रमण था.
आज जब हम एंटिलोप की मुख्य सड़क पर चल रहे थे तो ऐसा लगा मानो शहर के बाशिंदों ने रजनीश के वजूद का हर निशान मिटा देने की कसम खा रखी हो. मगर इतिहास की फितरत है कि कुछ चीजें मिटाए नहीं मिटतीं. ओशो और उनके आश्रम के अवशेष आज भी यहां यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं.
मुख्य सड़क के ही साथ एक छोटा-सा पोस्ट ऑफिस है. उसके पास तांबे की एक प्लेट लगी है, जिस पर एक हिरण की मुहर है और नीचे लिखा है, "यह उन लोगों को समर्पित है जिन्होंने रजनीशी आक्रमण का डटकर सामना किया."
उससे थोड़ा आगे चलकर एक म्यूजियम बना हुआ है जिसके दरवाजे पर 'मैककॉर्मैक्स रजनीश म्यूजियम' लिखा है. स्थानीय लोगों ने बताया कि यह 2018 से बंद पड़ा है. यह हमारी बदकिस्मती थी कि हम चाहकर भी अंदर नहीं जा सके मगर हमने उसके सामने तस्वीरें जरूर खिंचवाईं.

वहां से कुछ घर छोड़कर हम एक पुराने हाई स्कूल की जर्जर इमारत की तरफ गए, जो अब बंद पड़ी है और जिसके गेट पर अमेरिका का झंडा लहरा रहा था. स्कूल के ठीक सामने वाले घर की खिड़की के शीशे के पीछे से एक बूढ़ा आदमी हमें घूर रहा था. मुझे अचानक डर लगा कि कहीं वह बंदूक निकालकर सामने न आ जाए. एक गली घूमकर आने पर हमें एक और नोटिस बोर्ड दिखा, जिस पर ओशो अपनी खुली छत वाली महंगी गाड़ी में दाढ़ी लहराते हुए बैठे हैं मगर उस तस्वीर के ऊपर एक बड़ा सा लाल घेरा बना था, ठीक 'नो एंट्री' के निशान की तरह. इस वीरान बस्ती में घूमते हुए महसूस होता है कि यह महज ईंट-गारे का एक जर्जर ढांचा नहीं है बल्कि यह आज भी किसी गहरी आशंका और अनिश्चितता के भंवर में गोते खाता हुआ वह वीराना है, जिसे कभी रजनीशियों ने आबाद करने का ख्वाब देखा था.
सुरक्षा, षड्यंत्र और एक टूटता यूटोपिया
रजनीशपुरम की कहानी सिर्फ ध्यान-शिविरों और मेडिटेशन तक सीमित नहीं है. यह कहानी जितनी रजनीश की है उतनी ही अमेरिकी न्याय व्यवस्था, धार्मिक आजादी और सत्ता के आंतरिक टकराव की भी है. शीला अपनी किताब में याद करती हैं कि कैसे कुछ ही दिनों के भीतर कम्यून को नफरत भरे पर्चे, खून से सने खत और वास्तविक हिंसा की धमकियां मिलने लगी थीं. उनके रैंच में आग लगाने की कोशिश की गई और पोर्टलैंड के होटल रजनीश पर बम से हमला हुआ.
इसी के चलते उस शांतिप्रिय कम्यून में सैन्य स्तर की ट्रेनिंग और स्वचालित हथियारों ने दस्तक दी. शीला लिखती हैं कि उन्होंने इजरायल, स्विट्जरलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे सैन्य रूप से ताकतवर देशों से चार प्रशिक्षकों को बुलवाया था. कम्यून के सबसे बेहतरीन, मजबूत और भरोसेमंद संन्यासियों को चुनकर उन्हें रोजाना चार से छह घंटे की कड़ी ट्रेनिंग दी जाने लगी. ट्रेनिंग में फिटनेस के साथ-साथ हर तरह के हथियार चलाना सिखाया जाता था.
इसी के समानांतर, कम्यून के भीतर एक दूसरा और गहरा संकट आकार ले रहा था. एक तरफ दूर-दराज से ओशो के चाहने वाले वहां खिंचे चले आ रहे थे, एक बियाबान को आबाद कर रहे थे और उस पथरीले रेगिस्तान में भोजन से लेकर बैंकिंग तक की व्यवस्था खड़ी कर रहे थे. लेकिन दूसरी ओर, ओशो के घर, लाओत्से हाउस, में उनके निजी डॉक्टर और सहायकों द्वारा उन्हें दी जा रही दवाओं का संदिग्ध सिलसिला चल रहा था. फर्जी नामों पर वेलियम और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी दवाओं की भारी खेप मंगवाई जा रही थी. शीला को जब पता चला कि केवल ओशो के लिए मंगवाई जा रही वेलियम की मात्रा कम्यून के बाकी तीन हजार लोगों की कुल खपत से भी ज्यादा थी तो वे सिहर उठीं. उन्हें डर था कि यह सब किसी भी दिन संघीय एजेंसियों की छापेमारी का पुख्ता आधार बन सकता है.

शीला अपनी किताब में यह भी बताती हैं कि इस मसले पर ओशो का रवैया बिल्कुल स्पष्ट नहीं था. सार्वजनिक मंचों से वे लगातार 'पूर्ण चेतना' और 'नशा-मुक्त' जीवन का उपदेश देते रहे. यहीं पर आकर शीला की निजी निष्ठा और उनकी सत्यनिष्ठा के बीच एक गहरा टकराव पैदा हुआ. एक तरफ वह शख़्स था जिसके लिए उन्होंने एक पूरा शहर खड़ा कर दिया था और दूसरी तरफ वही शख्स कानून और नैतिकता के साथ एक बेहद खतरनाक खेल खेलता नजर आ रहा था.
इसके बाद की घटनाओं की आधिकारिक फाइलें केवल एक-दूसरे पर आरोपों का पुलिंदा हैं. बायोटेररिज्म, वायरटैपिंग, हत्या के प्रयास और इमिग्रेशन फ्रॉड. शीला अपने संस्मरण में इनमें से कई आरोपों को सिरे से नकारती हैं, कुछ की जिम्मेदारी आंशिक रूप से स्वीकार करती हैं और बाकी को अमेरिकी न्याय व्यवस्था की राजनीति का हिस्सा करार देती हैं. सच जो भी हो, यह बिल्कुल साफ है कि 1985 आते-आते वह यूटोपिया जो कभी प्रेम और ध्यान की भाषा बोलता था, अब अदालती दस्तावेजों और एफबीआई की फाइलों में तब्दील होकर बिखर रहा था.
शीला का प्रस्थान और कम्यून का पतन
इस पूरी कहानी में सबसे नाटकीय मोड़ तब आया, जब सितंबर 1985 में शीला ने ओशो की निजी सचिव और कम्यून प्रमुख के पद से इस्तीफा दिया और रजनीशपुरम हमेशा के लिए छोड़ दिया. वे लिखती हैं कि यह कोई 'पलायन' नहीं था. उन्होंने खुले तौर पर पत्र के जरिए अपनी विदाई की घोषणा की थी. अपनी टिकट रजनीश ट्रैवल एजेंसी से ही बुक करवाई थी और बकायदा विदा लेकर गई थीं.
शीला के मुताबिक उनके जाने के बाद ओशो ने उन पर और उनकी टीम पर पैसे चुराने और जहर फैलाने जैसे दर्जनों संगीन आरोप लगा दिए. ऐसे आरोप जो पहले कभी आधिकारिक तौर पर नहीं लगाए गए थे. शीला लिखती हैं कि यह सिर्फ उनका व्यक्तिगत टूटना नहीं था बल्कि यह उस गुरु-शिष्य परंपरा का भी पतन था जिसे उन्होंने अपना रहस्यमय मार्गदर्शक माना था.
इसके बाद रजनीशपुरम ताश के पत्तों की तरह ढह गया. ओशो पर इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन का मुकदमा चला. उन्होंने समझौते के तहत दो आरोप स्वीकार कर लिए. जुर्माना भरा और निर्वासन की शर्त पर उन्हें कम सजा मिली. दर्जनों देशों ने उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी और आखिरकार वे 1986 में वापस पुणे लौट आए, जहां 1990 में उन्होंने अंतिम सांस ली. ओरेगन में उनका बसाया वह शहर, जो कभी एक 'नई दुनिया' का वादा लेकर खड़ा हुआ था, आज 'निजी संपत्ति' के बोर्ड और एक 'क्रिश्चियन यूथ कैंप' के साइनबोर्ड तले कहीं दफ्न हो चुका है.
उस रात जब हम एंटिलोप के बेस कैंप में थे तो डग ने मुझे बताया कि यह पूरा इलाका 'डार्क स्काई' क्षेत्र कहलाता है. शहर की रोशनी और प्रदूषण से कोसों दूर होने के कारण यहां का आसमान इतना साफ होता है कि लोग दूर-दूर से बड़े टेलीस्कोप लेकर यहां तारों को निहारने आते हैं. डग की रिसर्च का एक हिस्सा इसी डार्क स्काई से जुड़ा था इसलिए उसके लिए यह किसी पेशेवर उत्सव से कम नहीं था. लेकिन मेरे लिए यह महज दिन भर की थकान के ऊपर ओढ़ा गया एक खगोलीय आवरण था. मैंने आसमान की ओर देखा. दूधिया आकाशगंगा की लकीरें, स्थिर तारों की अपार भीड़ और नीचे पसरी बंजर पहाड़ी, वीरान घर, एक बंद म्यूजियम, और एक टूटा हुआ यूटोपिया.
अगले दिन जब हम जॉन डे नदी के किनारे-किनारे लौट रहे थे तो रास्ते से हमने कुछ छोटे-छोटे जीवाश्म भी उठाए. मानो पत्थरों में कैद किसी प्राचीन जीव की अनगिन परछाइयां हथेली में हो. मुझे महसूस हुआ कि रजनीशपुरम की पूरी कहानी भी कुछ-कुछ ऐसी ही है. समय और स्मृतियों की चट्टान में दबी हुई. कुछ स्पष्ट, कुछ धुंधली.
(इतिहास के अध्येता रविन्द्र कुमार ओरेगन विश्वविद्यालय, अमेरिका से संबद्ध हैं)

