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टीनएज में भी हाइपरटेंशन! क्या भारत एक गंभीर महामारी की तरफ बढ़ रहा है?

किशोरों यानी टीनएजर्स में बढ़ती हाइपरटेंशन की समस्या जीवनशैली में बड़े बदलाव का असर दिखाती है

सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 12 दिसंबर , 2025

हाल में The Lancet Child & Adolescent Health के एक विश्लेषण से सामने आया कि दुनियाभर में एक अनुमान के मुताबिक हर 10 में से एक टीनएजर (13 से 19 साल तक के लड़के-लड़कियां) पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर के साथ जी रहा है. यह इस पूरी पीढ़ी के लिए शुरुआती चेतावनी है कि आने वाले समय में उसकी सेहत किस कदर खतरे में पड़ सकती है. 

भारत में बच्चों की सेहत पहले ही एक तरफ मोटापे और दूसरी तरफ कम पोषण की चुनौती से जूझ रही है, ऐसे में ये नतीजे और भी चिंता बढ़ाने वाले हैं. देशभर के डॉक्टरों का कहना है कि टीनएज हाइपरटेंशन के आंकड़े यही दिखाते हैं कि क्लीनिक में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

स्कूल जाने वाले बच्चों में ऐसे लक्षण सामने आ रहे हैं जो पहले सिर्फ अधेड़ उम्र के लोगों में दिखते थे. हरियाणा के गुरुग्राम स्थित सी.के. बिरला हॉस्पिटल में एसोसिएट डायरेक्टर, इंटरनल मेडिसिन डॉ. तुषार तायल कहते हैं, “देश में बच्चों और टीनएजर्स में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ना एक चेतावनी है जिसे हम और नजरअंदाज नहीं कर सकते. पहले जो बीमारी कभी बड़ों की होती थी, अब स्कूलों तक पैर पसार रही है. यह बीमारी मोटापा, प्रोसेस्ड फूड, स्ट्रेस और आरामतलब जीवनशैली से शुरू होती है.”

डॉ. तायल आगे कहते हैं कि शुरुआती मेटाबोलिक गड़बड़ी- खासकर जब खानपान खराब हो और बच्चे खेलकूल जैसी गतिविधियों से दूर रहते हों- आगे चलकर समय से पहले डायबिटीज, दिल की बीमारी और स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ा सकती है. Lancet का अध्ययन वैश्विक स्तर पर एक स्पष्ट बदलाव को दिखाता है: आजकल बचपन का मतलब ज्यादा से ज्यादा समय तक घर के अंदर रहना, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स छककर खाना, खेलों में कोई खास रुचि न होना और बढ़ता साइको-सोशल तनाव है. 

भारत के शहरी इलाकों में यह पैटर्न और भी ज्यादा स्पष्ट नजर आता है. किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले रहे, पढ़ाई में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं, और बाहर निकलने के बजाय ऑनलाइन सोशलाइज हो रहे हैं. यही नहीं, अच्छी-खासी मात्रा में नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट वाली चीजें खा रहे हैं. विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि कुल मिलकर इन सब वजहों से उनकी कार्डियोमेटाबॉलिक बेसलाइन (ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर और BMI के पैरामीटर)  उस उम्र में बदल रही है जब शरीर को सबसे मजबूत होना चाहिए.

नई दिल्ली स्थित मधुकर रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में पीडिएट्रिक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट कंसल्टेंट डॉ. स्वाति कनोडिया कहती हैं, “नए नतीजे बेहद चिंताजनक हैं और इन्हें एक चेतावनी की तरह देखना चाहिए. हाइपरटेंशन को कभी बड़ों की बीमारी माना जाता था लेकिन अब किशोरों में तेजी से बढ़ रही है. ये सब बदलती जीवनशैली का नतीजा है- जैसे आराम की आदत, ज्यादा स्क्रीन टाइम, प्रोसेस्ड फूड का भरपूर इस्तेमाल और शारीरिक गतिविधियों में कोई रुचि न होना. इस सबका बच्चों की सेहत पर काफी गहरा असर पड़ रहा है.” वे कहती हैं कि किशोरावस्था में बढ़ा ब्लड प्रेशर आगे चलकर कार्डियोवस्कुलर और किडनी की बीमारियों का खतरा काफी बढ़ा देता है.

भारत में पोषण संबंधी हालात स्थिति को और जटिल बना देता है. स्कूली बच्चों में जहां एक तरफ मोटापे की समस्या बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ कुपोषण भी लगातार बढ़ रहा है. और, दोनों ही स्थितियां युवाओं में मेटाबोलिक संतुलन बिगाड़ रही हैं. शुरुआती हार्मोनल बदलाव, अच्छी नींद का माहौल न होना, गंभीर तनाव और पढ़ाई का जरूरत से ज्यादा दबाव खतरे को और बढ़ाता है. फिर भी, किशोरवय में हाइपरटेंशन के बारे में अक्सर पता नहीं चल पाता क्योंकि स्कूल हेल्थ प्रोग्राम या बच्चों के डॉक्टर से सलाह लेने में ब्लड प्रेशर नियमित तौर पर चेक करने पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है.

डॉक्टर इस पर जोर देते हैं कि इस चुनौती से निपटा जा सकता है, बशर्ते परिवार, स्कूल और हेल्थकेयर सिस्टम मिलकर काम करें. डॉ. तायल के मुताबिक, रोकथाम दैनिक विकल्पों के साथ शुरू होती है- “घर का बना स्वास्थ्यकर खाना खाना, स्क्रीन टाइम घटाना, नियमित सक्रियता बढ़ाना और एक्सरसाइज करना. बच्चों में न सिर्फ डायबिटीज बल्कि किसी भी असाध्य बीमारी की रोकथाम के लिए ये सब जरूरी है.” डॉ. कनोडिया भी इससे सहमति जताते हुए कम उम्र से ही बचाव के उपाय करने और दिल के लिए सेहतमंद मानी जाने वाली आदतें अपनाने की सलाह देती हैं- नियमित एक्सरसाइज़, संतुलित आहार का सेवन, प्रोसेस्ड फूड का कम से कम इस्तेमाल और भरपूर नींद.”

टीनएज हाइपरटेंशन की समस्या अभी भले ही उतनी गंभीर नजर न आ रही हो लेकिन लंबे समय में काफी घातक साबित हो सकती है. लैंसेट डेटा भारत को एक चेतावनी की तरह है, जिस पर समय रहते ध्यान देना होगा नहीं तो यह ऐसी महामारी बन सकती है जिस पर काबू पाना शायद आसान न हो.

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