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समलैंगिक शादी : अधिकारों का गुलदस्ता

अगर सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक शादी को स्वीकृति दे देता तो मानवाधिकारों के लिहाज से यह काफी प्रगतिशील कदम माना जाता

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक शादी का मान्यता देने से इनकार कर दिया है
सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक शादी का मान्यता देने से इनकार कर दिया है
अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2023

- किंशुक गुप्ता 

एक महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित पत्रिका के संपादक ने मेरी किताब पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी. कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते हुए उन्होंने अनायास ही कहा (या गलती से कह गए) कि चाहे साहित्यिक जीवन में वे इस विषय का समर्थन करते हैं, व्यक्तिगत जीवन वे इसे सही नहीं मानते. मैंने मज़ाक की तर्ज़ पर कहा - यही गनीमत है कि आप इसे विकृति नहीं मानते.

अब जब शीर्ष न्यायालय ने क्वियर समुदाय की शादी के समानाधिकार की अर्जी खारिज कर दी है, मुझे यही बात सबसे पहले याद आई. शायद इसलिए भी क्योंकि पांच न्यायाधीशों की पीठ ने जिस तरह लगभग चार सौ पृष्ठ के निर्णय में एल. जी. बी. टी. क्यू. समुदाय पर होते भेदभाव को रेखांकित तो किया पर साथ ही ढिठाई से यह भी जाहिर कर दिया कि कानून में संशोधन करना उनके कार्यक्षेत्र में सम्मिलित नहीं, सहानुभूति बनाम स्वानुभूति का उदाहरण बनकर उभरता है. 

यह निर्णय संपादक महोदय के व्यक्तित्व की उसी फांक का व्यापक रूप बनकर रेखांकित होता है. उसी मानसिकता का परिचायक बन जाता है जिस तरह हम एनाटॉमी म्यूज़ियम में फॉर्मेलिन भरे कांच के डिब्बे में ‘स्यामी जुड़वां’ को देख उन्हें इंसान तो मानते थे पर अपने से कमतर. 

भारत में शादी जटिल संस्था है. पश्चिमी देशों से अलहदा यहां पर यह दो व्यक्तियों के दांपत्य के बजाय एक सामाजिक संस्था है. हम कहते हैं कि शादी दो परिवारों की होती है. हम शादी से निर्मित परिवार को सबसे ‘अपना’ मानते है. हम शादी को परस्पर प्रेम और जुड़ाव से कहीं अधिक बच्चे पैदा कर अपने वंश को आगे बढ़ाने का सुविधाजनक तरीका समझते हैं. 

हालांकि नई पीढ़ी इन मान्यताओं का खंडन तो कर रही है, रिश्तों को अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश भी कर रही है, पर इस कंडीशंड सोच की जड़ें इतने गहरी तक धंसी होती हैं और सामाजिक स्वीकार्यता से अपना खाद-पानी खींचती हैं कि अभी भी इस घोर पितृसत्तात्मक, पूंजीवाद संस्था में कोई ज्यादा बदलाव नहीं दिखाई पड़ता. 

रिश्तों के नए विकल्पों को तलाशने के बजाय समलैंगिक रिश्ते भी ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ के बाइनरी खांचे से अपने आपको मुक्त नहीं कर पा रहे. रुथ वनिता की किताब ‘लव'स राइट’ (पेंगुइन, 2005) में अनेक ऐसे लेस्बियन जोड़ों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने अपनी पहचान आदमी और औरत के रूप में की. इन संबंधों में ज्यादा सबल व्यक्ति - शरीर, दिमाग और भावनात्मक रूप से-पुरुष कहलाता है. और कमज़ोर व्यक्ति, स्त्री. 

क्वियर लोगों का मज़ाक बनाने के लिए सिसहेट लोग अक्सर यह फिकरा कसते हैं, "हू इज़ द मैन इन द रिलेशनशिप?"  हालांकि केवल अनुकूलन को ही इसका जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इस विषमता का एक कारण कानूनी नियम भी हैं जो शादी की संस्था को तभी वैध मानते हैं जब वह स्त्री और पुरुष के बीच में होती है. यही कारण है कि दीपू आर. दर्शन  (पहले अर्चना राज) पेरुवन्नामुझी और आरव कुंतल (पहले अर्चना कुंतल) जैसे अनेक ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जिन्होंने शादी की स्वीकार्यता के लिए लिंग परिवर्तन किया.

समझना यह भी होगा कि शादी की सामाजिक और संवैधानिक परिभाषाएं आपस में गुत्थमगुत्था हैं. यही कारण है कि शीर्ष न्यायाधीश जस्टिस  चंद्रचूड़ और जस्टिस भट्ट बहुत सारे बिंदुओं पर एक दूसरे से असहमत दिखाई देते हैं. इसी पेचीदगी का कारण है कि परस्पर विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जमीयत के विचारों का स्वागत करते हैं. 

भूलना यह भी नहीं चाहिए कि शादी की कानूनी परिभाषा से - जैसा मेनका गुरुस्वामी ने कहा था - दो व्यक्तियों को अधिकारों का गुलदस्ता मिलता है. बैंक खाता खोलने, जायदाद में नामित करने, और आपात स्थिति में निकटतम परिजन के रूप में घोषित करने जैसे अनेक अधिकार कानूनी रूप से केवल शादी के बाद ही दोनों पार्टनर को मिल पाते हैं. 

मानवाधिकारों का पूरी तरह से संरक्षण तभी संभव था जब न्यायालय समलैंगिक विवाह को स्वीकृति देता. वैश्विक परिदृश्य में भी यह निर्णय भारत को सबसे प्रगतिशील देश के रूप में दर्ज़ कर सकता था क्योंकि जिन 34 देशों में समलैंगिक शादी वैध है, उनमें से किसी भी देश में ‘गे सेक्स’ के गैर-अपराधीकरण के पांच सालों में शादी को स्वीकार्यता नहीं प्राप्त हुई. विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत ऐसा करना बहुत कठिन नहीं था. केवल ‘औरत’ और ‘आदमी’ को जेंडर न्यूट्रल शब्द ‘पार्टनर’ से बदलकर एक ऐतिहासिक निर्णय संभव था. हालांकि ऐसा करने पर दूसरे सौ से ज्यादा नियमों में संशोधन की आवश्यकता होती. यह उम्मीद इसलिए भी बढ़ गई थी क्योंकि निर्णायक पीठ में प्रगतिशील, विवेकशील और तार्किक मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ शामिल थे. 

दस दिन तक चली इस ‘मैरॉथन सुनवाई’ में सिविल यूनियन का मुद्दा भी पेश किया गया था. शादी की तर्ज़ पर विकसित सिविल यूनियन दो समलैंगिक व्यक्तियों को सभी कानूनी हक देते हुए उन्हें शादी की जटिल सामाजिक संरचना का भुक्तभोगी नहीं बनाता. हालांकि इसका ईजाद तो संभवत: एल. जी. बी. टी.क्यू. समुदाय को हक देने (पर पूरी तरह से नहीं) के लिए किया गया था पर विश्वभर के अनेक विषमलैंगिक जोड़े अपनी मर्ज़ी से शादी के बजाय सिविल यूनियन को चुन रहे हैं क्योंकि यह संरचना न केवल उन्हें पितृसत्तात्मक कंडीशनिंग के गड्ढे में गिरने से बचाती है बल्कि अपने ढंग से रिश्तों को परिभाषित करने की आज़ादी देती है. 

इक्कीसवीं सदी के इस अति-आधुनिक और अति-बौद्धिक समय में शादी जैसी बुर्जुआ व्यवस्था को सिविल यूनियन के लचीलेपन और स्वायत्तता की आवश्यकता है. हालांकि शीर्ष न्यायालय ने सिविल यूनियन पर भी चुप्पी साधकर सारा दारोमदार बिना किसी प्रारूप और समय सीमा के संसद पर डाल दिया है. भारतीय संस्कृति प्रेमी सांसदों के इस जमघट से, जहां भारत के दस फीसदी क्वियर समुदाय का एक भी प्रतिनिधि नहीं, किसी भी तरह की उम्मीद रखना कोयले को न्यूकैसल तक ले जाने जैसी बात है. 

मैंने अपने दोस्त से पूछा कि वह अपनी गर्लफ्रेंड से कितना प्यार करता है, उसने कहा इतना कि मैं उससे शादी करना चाहता हूं. हालांकि बहुत मायनों में यह बात बेवकूफाना लग सकती है, पर समलैंगिकों के पास अभी भी ऐसा कोई मापदंड नहीं जिससे वे अपने प्यार को व्याख्यायित कर सकें. तब केवल 377 का निराकरण कर शादी का अधिकार न देना वैसा ही लगता है जैसे कोई बढ़ई चार पाए वाली कुर्सी में एक पाया लगाना भूल जाए. गनीमत केवल यही है 2013 की तर्ज़ पर कोई पाया तोड़ा नहीं गया. 

-  किंशुक गुप्ता, लेखक और कथाकार हैं

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