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घाघ-भड्डरी से मौसम विभाग तक : नौतपा और बारिश का वैज्ञानिक रिश्ता

घाघ-भड्डरी और मारवाड़ी लोककथाओं में सदियों पुराना मौसम विज्ञान छिपा है. नौतपा, रोहिणी नक्षत्र और लू से जुड़ी कहावतें मानसून के वैज्ञानिक संकेतों की दिलचस्प व्याख्या करती हैं

गर्मी से लोगों का हाल बेहाल
25 मई से नौतपा शुरू हुए हैं
अपडेटेड 28 मई , 2026

‘तपै नवतपा नव दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय...’ जेठ की दोपहरी में जब धरती आग उगलने लगती है, कुएं का पानी तक गुनगुना हो जाता है और गांव की चौपालों पर बैठे बुजुर्ग आसमान की तरफ देखकर यह कहावत दोहराने लगते हैं, तब समझ लीजिए कि नौतपा शुरू हो चुका है. 

उत्तर भारत में मई के आखिरी सप्ताह से शुरू होने वाले इन नौ दिनों को लेकर ग्रामीण समाज में जितनी कहावतें प्रचलित हैं, उतनी शायद किसी और मौसम को लेकर नहीं मिलतीं. बुंदेलखंड, राजस्थान, मालवा, अवध और बिहार के गांवों में आज भी लोग मानते हैं कि अगर नौतपा खूब तप गया, तो सावन भी जमकर बरसेगा. 

अगर इन दिनों बारिश हो गई, तो लोग कहते हैं कि ‘नौतपा गल गया’ और इसका मतलब होता है कमजोर मानसून, कम बारिश और सूखे का खतरा. इस वर्ष 25 मई से 02 जून तक चलने वाला भीषण गर्मी का दौर यानी नौतपा एक बार फि‍र आने वाले मौसम की दशा भी बताएगा. 

नौतपा की शुरुआत ज्योतिषीय गणनाओं के हिसाब से होती है  ​
नौतपा की शुरुआत ज्योतिषीय गणनाओं के हिसाब से होती है ​

दिलचस्प बात यह है कि सदियों पुरानी ये लोककथाएं अब आधुनिक मौसम विज्ञान के कई सिद्धांतों से मेल खाती दिखाई देती हैं. यानी घाघ-भड्डरी और मारवाड़ी लोककथाओं में छिपी मौसम की समझ केवल अंधविश्वास नहीं बल्कि प्रकृति के लंबे अवलोकन से उपजा लोकविज्ञान भी है.

भारत में मौसम को समझने की सबसे मजबूत परंपरा किसानों और ग्रामीण समाज के पास रही है. आधुनिक मौसम विभाग बनने से बहुत पहले गांवों के लोग हवा की दिशा, आसमान के रंग, पक्षियों की आवाज, कीड़ों की गतिविधियों और नक्षत्रों की चाल देखकर बारिश का अनुमान लगाते थे. इन्हीं अनुभवों को कहावतों और लोकगीतों के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया.

घाघ और भड्डरी ऐसी ही लोक परंपरा के सबसे चर्चित नाम हैं. माना जाता है कि घाघ मध्यकाल के लोककवि थे, जिनकी मौसम और खेती से जुड़ी कहावतें आज भी ग्रामीण भारत में बेहद लोकप्रिय हैं. उनकी कहावतें केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मौसम विज्ञान का लोक संस्करण हैं.
घाघ कहते हैं- ‘जेठ मास जो तपे निरासा, तब जानों बरसा की आसा.’

लोकज्ञान के मुताबिक जेठ का महीना जितना ज्यादा गर्म होता है, बारिश उतनी अच्छी होती है
लोकज्ञान के मुताबिक जेठ का महीना जितना ज्यादा गर्म होता है, बारिश उतनी अच्छी होती है

यानी जेठ जितना ज्यादा तपेगा, बारिश की उम्मीद उतनी ही बढ़ेगी. यह पंक्ति आज भी किसानों के बीच मानसून का सबसे लोकप्रिय लोकसूत्र है. मारवाड़ी समाज में नौतपा को लेकर एक और कहावत प्रचलित है-

‘दोए मूसा, दोए कातरा, दोए तिड्डी, दोए ताव.
दोयां रा बादी जळ हरै, दोए बिसर, दोए बाव.’ 

इसका अर्थ बेहद रोचक है. लोकमान्यता कहती है कि नौतपा के पहले दो दिनों में लू न चले तो चूहों की संख्या बढ़ेगी. दूसरे दो दिन हवा न चले तो फसल नष्ट करने वाले कीट पनपेंगे. तीसरे दो दिनों में लू कमजोर रही तो टिड्डियों का खतरा रहेगा. चौथे चरण में गर्मी कम हुई तो बीमारियां बढ़ेंगी. पांचवें और छठे चरण में लू न चले तो जहरीले जीव-जंतु अधिक होंगे और बारिश कमजोर पड़ सकती है. 

पहली नजर में यह केवल लोकविश्वास लग सकता है, लेकिन इसके पीछे पर्यावरणीय तर्क भी मौजूद हैं. भीषण गर्मी और शुष्कता वास्तव में कई कीटों, फफूंदों और जीव-जंतुओं के प्रजनन चक्र को प्रभावित करती है. अत्यधिक तापमान उनके अंडों और लार्वा को नष्ट कर देता है. यानी किसानों ने अपने अनुभव से यह समझ लिया था कि गर्मी केवल कष्ट नहीं देती, बल्कि आने वाली फसल की रक्षा भी करती है.

खगोल शास्त्री सुभाष शुक्ल बताते हैं, “नौतपा का संबंध रोहिणी नक्षत्र से माना जाता है. भारतीय पंचांग के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तभी नौतपा शुरू होता है. आमतौर पर यह अवधि 25 मई से 2 जून के बीच रहती है. लोककथाओं में कहा जाता है कि सूर्य इन दिनों “रोहिणी को तपाता” है, इसलिए धरती पर सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है.”

रोहिणी नक्षत्र (तारों का एक विशिष्ट समूह) को लेकर एक और प्रसिद्ध कहावत है- ‘रोहण तपै, मिरग बाजै, आदर अणचिंत्या गाजै.’ अगर रोहिणी नक्षत्र (सूर्य आने पर) में खूब गर्मी पड़े और मृगशिरा नक्षत्र (सूर्य आने पर) में आंधियां चलें, तो आर्द्रा नक्षत्र (सूर्य आने पर) लगते ही बादल गरजेंगे और अच्छी बारिश होगी. यह कहावत भी मानसून पूर्व गतिविधियों की लोकव्याख्या जैसी लगती है. मई के अंतिम सप्ताह (सूर्य का प्रवेश रोहिणी नक्षत्र में होता है) और जून की शुरुआत में उत्तर भारत में तेज धूलभरी आंधियां चलती हैं. मौसम विज्ञान के अनुसार यह संकेत होता है कि वातावरण में बड़े पैमाने पर ऊर्जा और दबाव परिवर्तन हो रहे हैं, जो मानसून के लिए जरूरी हैं.

मेरठ विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल बताते हैं, “असल में नौतपा केवल धार्मिक या ज्योतिषीय अवधारणा नहीं है. इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं. मई के अंतिम सप्ताह में पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध सूर्य की तरफ अधिक झुका होता है. सूर्य की सीधी किरणें भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी हिस्सों पर लगभग लंबवत पड़ती हैं. इससे जमीन तेजी से गर्म होती है और तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.” 

नौतपा की वजह से भारत के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनता है और इस तरह हिंद महासागर से मानसूनी हवाएं चलने लगती हैं
नौतपा की वजह से भारत के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनता है और इस तरह हिंद महासागर से मानसूनी हवाएं चलने लगती हैं

इस समय उत्तर भारत की धरती भट्टी की तरह तपने लगती है. सड़कें पिघलती महसूस होती हैं, खेतों की मिट्टी चटकने लगती है और गर्म हवाएं लपटों जैसी लगती हैं. लेकिन इसी भीषण गर्मी के भीतर मानसून की शुरुआत का विज्ञान छिपा हुआ है. नौटियाल बताते हैं कि जब जमीन अत्यधिक गर्म होती है तो उसके ऊपर की हवा भी गर्म होकर हल्की हो जाती है और तेजी से ऊपर उठती है. इससे जमीन के पास कम वायुदाब यानी लो प्रेशर का क्षेत्र बनता है. दूसरी तरफ हिंद महासागर का पानी जमीन की तुलना में ठंडा रहता है, जिससे वहां उच्च वायुदाब बना रहता है. वायुमंडल का मूल नियम है कि हवा हमेशा उच्च दबाव से निम्न दबाव की तरफ बहती है. यही कारण है कि हिंद महासागर की नमी से भरी हवाएं उत्तर भारत की तरफ खिंचने लगती हैं. यही आगे चलकर दक्षिण-पश्चिम मानसून बनती हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो नौतपा की गर्मी मानसून के लिए ‘सक्शन पंप’ तैयार करती है. धरती जितनी ज्यादा तपेगी, उतना मजबूत निम्न-दाब बनेगा और मानसून की हवाएं उतनी तेजी से भारत की ओर आएंगी. यही कारण है कि लोककहावत ‘नौतपा तपे तो बरखा झमाझम’ आधुनिक थर्मोडायनामिक्स के सिद्धांतों पर काफी हद तक खरी उतरती दिखाई देती है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मई का अंतिम सप्ताह उत्तर भारत के वातावरण का सबसे शुष्क समय होता है. हवा में नमी बहुत कम होती है. सूखी हवा तेजी से गर्म होकर ऊपर उठती है और मजबूत निम्न-दाब क्षेत्र बनाती है. 

इसके विपरीत जून के मध्य तक वातावरण में नमी बढ़ने लगती है, जिससे गर्मी के बावजूद हवा उतनी प्रभावी ढंग से ऊपर नहीं उठ पाती. यही कारण है कि नौतपा मई के अंतिम सप्ताह में आता है जबकि सूर्य 21 जून को कर्क रेखा के ठीक ऊपर होता है. इसके पीछे तिब्बती पठार का भी बड़ा योगदान है. मई के अंत तक तिब्बत की बर्फ पिघलने लगती है और वहां की चट्टानें तेजी से गर्म होती हैं. इससे एशिया के ऊपर विशाल तापीय क्षेत्र बनता है, जो मानसून की हवाओं को गति देता है.

मौसम विज्ञान में ‘सबट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम’ का भी बड़ा महत्व माना जाता है. यह ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली तेज हवाओं की धारा है जो मई के अंतिम सप्ताह तक हिमालय के उत्तर की ओर खिसकने लगती है. इससे मानसूनी हवाओं के लिए रास्ता खुल जाता है. यानी नौतपा के दौरान केवल जमीन ही नहीं तपती, बल्कि पूरा वायुमंडलीय तंत्र मानसून के स्वागत की तैयारी में जुट जाता है. 

हालांकि नौतपा को लेकर समाज में दो तरह की धाराएं दिखाई देती हैं. एक वर्ग इसे पूरी तरह अंधविश्वास मानकर खारिज कर देता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे रहस्यमय चमत्कार की तरह प्रस्तुत करता है. नौटियाल बताते हैं, “वास्तविकता इन दोनों के बीच है. नौतपा न तो कोई जादुई घटना है और न ही केवल धार्मिक कल्पना. यह हजारों वर्षों के अनुभव, अवलोकन और प्रकृति की समझ पर आधारित लोकविज्ञान है.” दरअसल पूर्वजों ने नक्षत्रों का इस्तेमाल मौसम को समझने के लिए ‘खगोलीय कैलेंडर’ की तरह किया. सूर्य का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश कोई रहस्यवादी घटना नहीं, बल्कि वर्ष के उस समय का संकेत है जब भारतीय भूभाग सबसे ज्यादा गर्म होता है. 

आज आधुनिक विज्ञान जिन बातों को ‘लो प्रेशर’, ‘थर्मोडायनामिक्स’, ‘एटमॉस्फेरिक सर्कुलेशन’ और ‘मॉनसून डायनेमिक्स’ जैसे शब्दों में समझाता है, ग्रामीण समाज ने उन्हें सदियों पहले कहावतों और लोकगीतों के जरिए पहचान लिया था. नौतपा की चर्चा केवल मौसम तक सीमित नहीं है. इसका सीधा संबंध खेती, जलसंकट और आम जनजीवन से भी है. 

नौतपा में सबसे कठिन परीक्षा मजदूर वर्ग के लोगों की होती है
नौतपा में सबसे कठिन परीक्षा मजदूर वर्ग के लोगों की होती है

इस समय सबसे कठिन परीक्षा गरीबों, मजदूरों और खेतों में काम करने वाले किसानों की होती है. सड़क किनारे काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिक तपती धूप में रोजी कमाने को मजबूर रहते हैं. उत्तर भारत के कई शहरों में दोपहर के समय सड़कें सूनी पड़ने लगी हैं. अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीज बढ़ रहे हैं. मौसम विभाग लगातार लू की चेतावनी जारी कर रहा है. लेकिन गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते हैं कि ‘जेठ जितना तपेगा, सावन उतना हंसेगा.’ उनके लिए यह तपिश केवल संकट नहीं, बल्कि उम्मीद भी है.

दरअसल भारतीय लोकजीवन की सबसे बड़ी खूबी यही रही है कि उसने प्रकृति के कठोर रूप में भी भविष्य की संभावना खोज ली. नौतपा की आग में किसान केवल तपन नहीं देखते बल्कि आने वाली बारिश की आहट सुनते हैं. यही वजह है कि घाघ-भड्डरी की कहावतें आज भी गांवों में जीवित हैं. आधुनिक तकनीक, सैटेलाइट और सुपरकंप्यूटर के दौर में भी किसान आसमान की चाल, हवा की दिशा और नौतपा की तपिश को गंभीरता से देखते हैं. क्योंकि आखिरकार मौसम केवल आंकड़ों से नहीं, अनुभवों से भी समझा जाता है. और शायद इसी कारण नौतपा भारतीय लोकज्ञान और आधुनिक मौसम विज्ञान के बीच सबसे मजबूत पुल बनकर आज भी खड़ा है.

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