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कोविड वैक्सीन और उस दौर की कितनी सच्चाई दिखाती है 'द वैक्सीन वॉर'?

अनुभव सिन्हा की 'भीड़' और विवेक रंजन अग्निहोत्री की 'द वैक्सीन वॉर' को एक-दूसरे में गूंथ दें तो कोरोना काल की एक मुकम्मल फिल्म बन सकती है क्योंकि दोनों ही फिल्में एक पक्ष को दिखाती हैं और दूसरे को छूती भी नहीं

कोविड वैक्सीन बनने की कहानी दिखाती है द वैक्सीन वॉर
कोविड वैक्सीन बनने की कहानी दिखाती है द वैक्सीन वॉर
अपडेटेड 30 सितंबर , 2023

एक महिला साइंटिस्ट अपने सीनियर मोस्ट से फ्रस्टेट है. सीनियर को हर चीज बिजली की गति से होती हुई चाहिए. साइंटिस्ट को लगता है कि उसके सर प्रोसेस को इग्नोर कर रहे हैं. साइंटिस्ट और सीनियर में बकझक हो जाती है. फोन पर ही सब कुछ हो रहा है. फोन कट जाता है. साइंटिस्ट अपने जूनियर साइंटिस्ट से फ्रस्टेशन में बात करने लगती है. रो भी रही है.

तभी दफ्तर के दरवाजे से एक छोटा बच्चा आता है. साइंटिस्ट को गुलाब का फूल देता है. वो भावुक हो जाती है. बच्चा चला जाता है. साइंटिस्ट अपने टेबल पर गुलाब रख देती है. फ्रेम में सिर्फ महिला और गुलाब हैं. इमोशन क्रिएट करने की पुरजोर कोशिश तो दिखती है लेकिन इस सीन में इमोशन नेचुरल नहीं लगता, उनकी जबरिया आजमाइश दिखती है. 

खैर यहीं फिल्म का इंटर्वल हो जाता है. ये सीन है नई-नवेली फिल्म द वैक्सीन वॉर का, जिसके डायरेक्टर हैं विवेक रंजन अग्निहोत्री. वही विवेक अग्निहोत्री जो पिछली बार द कश्मीर फाइल्स के साथ आए थे. जो काफी चर्चा में रही और विवादित भी. द कश्मीर फाइल्स और द वैक्सीन वॉर का बेसिक प्लॉट एक जैसा ही है. इस मामले में कि दोनों ही फिल्मों में डायरेक्टर देश के 'दुश्मनों' की तरफ इशारा करना चाहते हैं. खैर हम वैक्सीन वॉर की बात करते हैं. इस पर बात शुरू करने के लिए दो रास्ते थे. एक तो फिल्म के किसी सीन के जरिए इसकी पॉलिटिकल डिबेट के साथ बात शुरू हो. दूसरा, किसी सीन के जरिए फिल्म के सिनेमाई क्राफ्ट को फोकस में रखकर बात की जाए. हमें लगा कि पॉलिटिकल डिबेट तो हर जगह हो ही रही है तो आपको इस फिल्मी दुनिया में क्राफ्ट पर चर्चा के साथ ले चलें.

एनआईवी डायरेक्टर प्रिया अब्राहम के किरदार में पल्लवी जोशी
एनआईवी डायरेक्टर प्रिया अब्राहम के किरदार में पल्लवी जोशी

फिल्म की थोड़ी कहानी जान लेते हैं. हालांकि इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि स्पॉइलर अलर्ट देना पड़े. फिल्म कोरोना के दौर में भारत द्वारा बनाए गए कोविड-19 के वैक्सीन, उन्हें बनाने वाले वैज्ञानिकों, उनके निजी जिंदगी के संघर्षों के बावजूद देश के लिए कमिटमेंट, विदेशी ताकतों द्वारा भारत के खिलाफ कथित साजिश, भारत में ही बैठे कुछ लोगों द्वारा उन विदेशी ताकतों को मिल रहे सपोर्ट की कहानी है. यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है. ऐसा लगता है कि फिल्म में कई एलिमेंट्स डालकर मिक्स कर दिया गया है. फिल्म ठहरकर किसी पहलू को पूरी तरह खोल नहीं पाती बल्कि सब कुछ थोड़ा-थोड़ा छू लेना चाहती है. लेकिन जो बेसिक प्लॉट समझ में आता है, वो ये कि भारत के कोविड-19 वैक्सीन बनाने और उसकी क्षमता पर सवाल केंद्र में हैं.

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर कोविड-19 की वैक्सीन बना रहा है. इस मिशन को लीड कर रहे हैं आईसीएमआर के डीजी डॉ. बलराम भार्गव (नाना पाटेकर ने ये किरदार निभाया है.) साथ में हैं कई वैज्ञानिक, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं. एक पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया के एक धड़े का प्रतिनिधि बना कर पेश किया गया है, नाम है- रोहिणी सिंह (राइमा सेन का किरदार). फिल्म दिखाती है कि कैसे रोहिणी विदेशी ताकतों से मिलकर भारत के मिशन कोविड वैक्सीन के खिलाफ आर्टिकल्स लिखती हैं, गलत या अधूरे फैक्ट्स लोगों को बताती हैं और भारतीय वैज्ञानिकों के काम पर सवाल उठाती हैं. यह सब इसलिए ताकि सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सके.

वैज्ञानिक इन चीजों से डगमगाते नहीं हैं. लड़ते-भिड़ते वैक्सीन बना लेते हैं. लेकिन वैक्सीन पर भी रोहिणी सिंह सवाल उठाने लगती हैं. उसे विदेशी वैक्सीनों से कम बताने लगती हैं. आईसीएमआर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाती है जहां बाद में नाना पाटेकर आते हैं और फिर रोहिणी सिंह और उनके बीच सवाल-जवाब होते हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में सभी पत्रकार ताली बजाने लगते हैं वैज्ञानिकों के लिए. रोहिणी का हृदय परिवर्तन हो जाता है. वो भी ताली बजाने लगती हैं. इसके बाद डॉ. भार्गव एक महिला साइंटिस्ट, जिसका किरदार निभा रही हैं पल्लवी जोशी को एक किताब देते हैं. किताब का नाम है- गोइंग वायरल. ये फिल्म इसी किताब से निकली है.

आईसीएमआर डीजी डॉ. बलराम भार्गव के किरदार में नाना पाटेकर पुख्ते लगे
आईसीएमआर डीजी डॉ. बलराम भार्गव के किरदार में नाना पाटेकर प्रभावित करते हैं

फिल्म में कोरोना से जुड़े रिसर्च वाले सीन जब भी आते हैं औसत दर्जे का बैकग्राउंड म्यूजिक सुनने को मिलता है. वायरस के विजुअलाइजेशन बेहद सतही दिखते हैं. ये कुछ ऐसी जगहें थीं जहां इस फिल्म को थोड़ा और पुख्ता होना था. इन जगहों पर फिल्म होने की फीलिंग आनी चाहिए थी. जो नहीं आती.

फिल्म का एजेंडा

फिल्म में आईसीएमआर के वैज्ञानिकों की एक टॉप लेवल मीटिंग हो रही है. यहां पल्लवी जोशी का किरदार कहता है- "ICMR की सफलताएं कम नहीं हैं, लेकिन हमारे पास कोई रॉकेट नहीं है जिसकी पूंछ में आग लगा दें और मार्स पर पहुंच जाएं." फिल्म थोड़ी देर और आगे बढ़ती है और पत्रकार रोहिणी अपने बुलेटिन में कहती हैं- INDIA CAN'T DO IT. जिसके बाद डॉ. भार्गव अपनी मीटिंग में एक बोर्ड पर यही लाइन लिखते हुए कहते हैं- "अगर कोई भारत का दुश्मन नहीं है तो ऐसा क्यों लिखेगा." फिर एक सीन में एक महिला साइंटिस्ट कहती हैं- "भारत को सबसे ज्यादा खतरा अपने ही लोगों से है."

ज्यादातर सीन देश के 'दुश्मनों' को आइडेंटिफाई करते हुए दिखाए जाते हैं. एक और सीन देखिए. कोरोना के खतरों को लेकर प्रधानमंत्री ने एक मीटिंग बुलाई. आईसीएमआर के डीजी ने लॉकडाउन का उपाय सुझाया. इसके बाद डीजी अपनी टीम को इस बारे में बता रहे होते हैं. तभी टीम की एक महिला साइंटिस्ट कहती हैं- "ऐज ए साइंटिस्ट पहली बार ऐसा लग रहा है कि हमारे साथ कोई है." यह डायलॉग और चेहरे का भाव साबित करना चाहता है कि इससे पहले देश के साइंटिस्ट को सरकार का साथ नहीं मिलता था.

पत्रकार रोहणी सिंह के किरदार को और बेहतर डिजाइन किया जा सकता था
पत्रकार रोहणी सिंह के किरदार को और बेहतर डिजाइन किया जा सकता था

कुल मिलाकर फिल्म उसी एजेंडे पर खड़ी दिखती है जिसपर विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स थी. वही एजेंडा जो विवेक के ट्विटर टाइमलाइन पर दिखता है. जो साफतौर पर सरकार के पक्ष में होता है. जो विरोधियों को अर्बन नक्सल और आतंकवादी की कैटेगरी में डाल देता है. आतंकवादी शब्द यहां क्यों आया? क्योंकि फिल्म के आखिर में जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. भार्गव बोल रहे होते हैं तब वो पत्रकार रोहिणी के काम की तुलना आतंक और आतंकवादी हरकतों से करते हैं.

देखने लायक क्या है?

नाना का मोनोलॉग. क्रांतिवीर से द वैक्सीन वॉर तक जो सबसे कंसिस्टेंट चीज है वो नाना पाटेकर का मोनोलॉग है. द वैक्सीन वॉर में 2-3 जगहों पर नाना पाटेकर के मोनोलॉग हैं, छोटे-बड़े. ये मोनोलॉग हों या कोई भी सीन जिसमें नाना पाटेकर डॉ. भार्गव के किरदार में दिखते हैं आप बंधे हुए दिखेंगे. उनकी एक्टिंग उसी दर्जे की है जिसके आगे डायरेक्टर का क्राफ्ट छिप जाता है. सभी ऐक्टर्स अपने रोल में ठीक लगते हैं. दूसरी अच्छी बात ये है कि फिल्म में किसी डेटा या फैक्ट के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है. फैक्ट्स को सही ढंग से पेश किया गया है.

एक फिल्म आई थी 'भीड़'. अनुभव सिन्हा ने डायरेक्ट की थी. पंकज कपूर, राजकुमार राव और भूमि पेडणेकर सरीखे ऐक्टर्स थे. भीड़ और द वैक्सीन वॉर फिल्म को एक-दूसरे में गूंथ दें तो कोरोना काल की एक मुकम्मल फिल्म बन सकती है. दोनों ही फिल्में एक पक्ष को दिखाती हैं और दूसरे पक्ष को छूती भी नहीं हैं. ऐसा इसलिए भी क्योंकि दोनों फिल्में उस दौर की दो हकीकतों पर बनाई गई हैं. भीड़, लॉकडाउन की त्रासदी पर बात करती है. तो वहीं द वैक्सीन वॉर कोविड वैक्सीन बनाने के संघर्ष और उस मिशन की सफलता पर. 

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