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ममता कालिया की बतकही में एक शहर-एक दौर

'जीते जी इलाहाबाद' को साल 2025 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है. वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया का यह संस्मरण हर उस लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी पाठ है जिसे जीवंत अतीत आकर्षित करता है

Mamta Kalia, Hindi Writer, Jeete jee Allahabad (Photo : Atul Kumar Yadav)
ममता कालिया अपने संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' के साथ (फोटो : अतुल कुमार यादव)
अपडेटेड 17 मार्च , 2026

कुछ किताबें इतनी उत्सुकता जगाती हैं कि हाथ में आते ही घोंट ली जाती हैं. जीते जी इलाहाबाद  ऐसी ही किताब है और उसको लिखने वाली हैं हमारी प्रिय जीवंत कथाकार ममता कालिया जिन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है.

यह मौका खुशी का तो है ही साथ ही उन दिनों को भी याद करने का है जब मैं एक छात्रा थी और उनके और उनके हमसफ़र मित्र रवींद्र कालिया के बारे में सुना और पढ़ा करती थी. वे रूमानी दिन थे और मुझे वह साहित्यिक जोड़ा बहुत-बहुत आकर्षित करता था. फिर लिखने लगी और आरंभिक कहानी कालिया जी के सम्पादन में वागर्थ में छपी. इसके बाद दोनों से मिलना हुआ.

इस बीच मैंने ममता जी की बहुत सारी कहानियां और कुछ उपन्यास पढ़ डाले. कहना न होगा कि मैं प्रभावित हुई लेकिन जब उनसे पहली बार मिली तो प्रभावित होने से ज्यादा उनकी खुली और प्यारी शख्सियत के सम्मोहन में बंध गई.

पंकज राग जब भी भोपाल से दिल्ली जाते तो उनके घर पर ही खाना खाते और वे बहुत प्यार से अपने हाथों से बना खाना खिलातीं. यह आज से 25 साल पहले की बात है लेकिन इससे भी सुंदर बात है कि वह सिलसिला आज तक कायम है.

ममता जी हम कुछ लोगों को अपनी सहेलियां कहती हैं और जब भी गीताश्री, प्रत्यक्षा और मैं उनके घर पहुंच जाते हैं तो वे आज भी हमें अपने हाथों का बना स्वादिष्ट खाना खिलाकर अपने किस्से-कहानियों से भर-भर कर अमीर बनाती रहती हैं.

उनकी ऊर्जा, उनकी समकालीनता हमें भी ऊर्जा से भर देती है. उन्हें पढ़ने और सुनने वाले जानते हैं कि उनकी चुहलता और विट का कोई सानी नहीं.

इसीलिए जब जीते जी इलाहाबाद आई तो मन खुशी से झूम उठा था. यह किताब हर उस लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी पाठ है जिसे जीवंत अतीत आकर्षित करता है. जिसे अपने पुरोधाओं के बारे में जानने की ख़्वाहिश  रहती है. जिसे अपनी विरासत पर धूल नहीं जमने देने की जिद रहती है और जिसे बस यूं ही ऑर्गैनिक ढब से मन करता है कि विरासत को संवार आगे ले जाया जाए और आगामी पीढ़ियों को सौंप दिया जाए.

इस किताब में रस से भरी बतकही ऐसी है जैसे सामने किस्सागो बैठा है और हंसते, मुस्कुराते, नाराज़ होते, रूठते, किसिम-किसिम के किस्से सुनाए जा रहा है.

अपनायत इतनी सहजता से और आप हैं जो बैठे हुए मंत्रमुग्ध से सुन रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे हम ममता जी के पलंग पर जमघट लगाए आज भी सुनते हैं. बालिश्त भर का फ़र्क नहीं लाइव और उनके लिखे हुए शब्दों के बीच. उनसे मिलने पर हंसी और किस्से, अनवरत झरते रहते हैं खुश्क मौसमों में भी फूलों की तरह.

रानी मंडी कभी गई नहीं लेकिन इस किताब में उसे देखती हूं समूचे इतिहास भूगोल समेत. लोकनाथ, चौक, मेहदौरी के इलाके, जीरो रोड, लकी स्वीट्स के नज़दीक के पान सिगरेट, नवाब की चाय दुकान, अश्क़ जी का अन्दाज़, ज्ञानरंजन के मार्फत समोसे जलेबी और लस्सी की लुभाती लोलुपता, अमरकान्त की नैसर्गिक सादगी, दूधनाथ का जलवा, काशीनाथ सिंह और नामवर सिंह की भाइबंदी, भैरव जी का कद, मार्कण्डेय का हुनर, शैलेश मटियानी के दुख और बाद में कृष्णा सोबती, राजेंद्र यादव जैसे लेखकों की आत्मीय बातें, जैसे जीवन के रंगीन टुकड़े एक मायावी इंद्रधनुष रचते हों. जिसे देख हर्फ दर हर्फ हम उल्लसित होते हैं.

रंजो गम और पेचीदगी से अछूता नहीं रहा है उनका जीवन. रवींद्र कालिया और बच्चों समेत चाई जी को साधती ममता कालिया और अंततः ईमानदारी से अघटित, घटित को नाभि प्रदेश से उसी तरह बयान करती जैसे व्यास जी, रवींद्र कालिया के कहने पर गाते थे, कोयलिया मत कर पुकार / करेजवा लागे कटार.

इस किताब को पढ़ते-पढ़ते यह मीठी कटार धंस जाती है कहीं. अलमस्त कहानीकारों, गीतकारों, शायरों, कवियों, गायकों, वकीलों और अन्नप्राशन करते आरंभिक राजनेताओं की वह इलाहाबादी उर्वर ज़मीन ममता जी की होते-होते हमारी भी हो जाती है. इस शहर का तेवर बताते-बताते एक समूचे साहित्यिक परिदृश्य का मिजाज भी उजागर होता है, उसी विट और खिलंदड़ेपन से जिसका हुनर ममता कालिया में इनबिल्ट है. जोरदार ढंग से.

निजी जावन में भी इस खुशदिल और बहादुर लेखक को हम कई बार गले लगाते हैं बिलकुल हमवयस्कों की तरह और कहीं कोई गैप महसूस नहीं होता. उनकी बनावट, बुनावट जितनी पुरानी है उतनी ही नई. बल्कि यह कहते हुए मुझे कोई गुरेज नहीं कि उनकी मौज सहस्त्रधाराओं सी है जिसका बना रहना हमारे अपने, रचने के लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है.

(वंदना राग हिंदी की  प्रसिद्ध कथाकार हैं)

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