
कुछ बातें कब होती हैं, कैसे होती हैं, से ज्यादा जरूरी उनका हो जाना होता है. लेकिन कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के साथ हुई इस बातचीत में कब और कैसे होने के भी बराबर मायने हैं.
दरअसल इन प्रश्नों के उत्तर देने की शुरूआत उन्होंने घर से की थी और अंतिम रूप अस्पताल में दे पाए. जवाब देते हुए उन्होंने लिखा था कि इन उत्तरों को देना रचनात्मकता के कुछ करीब ऑक्सीजन को पाने जैसा था.
पढ़िए इंडिया टुडे के डिप्टी एडिटर अंजुम शर्मा से उनकी बातचीत :
इधर आप बच्चों के लिए काफी लिख रहे हैं. लिखते हुए अपने बचपन में लौटते हैं? क्या-क्या याद आता है?
हां, इन दिनों मैं बच्चों के लिए लिख रहा हूं. पिछले करीब डेढ़ दशक में बच्चों के लिए ज्यादा लिखा है. बच्चों के लिए लिखते समय अपना बचपन याद आता है. आस-पास, घर, पड़ोस के बच्चों को देखकर उनसे मिलकर, बात कर भी लिखने का मन करता है. मेरा बचपन बहुत पीछे चला गया है, पर बचपना लगता है बुढ़ापे में भी बचा रहता है. बचपन को याद करना भी बचपना है.
आपकी मां बांग्लादेश के जमालपुर गांव से थीं. मां ने कभी जिक्र किया अपने बचपन का या आपने जानने की कोशिश की?
हां, अम्मा (मां) ने जिक्र किया था. उनका बचपन बांग्लादेश के जमालपुर में बीता था. तब यह सब भारत का ही हिस्सा था. मेरे नाना का परिवार कानपुर का था. वे मिट्टीतेल का व्यापार करने जमालपुर गये थे. वहां पद्मानदी (गंगा) के पास उनका घर था. वह इलाका गोपालबाड़ी कहलाता था. नाना रोज सुबह-सुबह नहाने पद्मानदी जाते थे. उस समय भी दंगे होते थे. सुबह नहाकर लौटते समय नदी के किनारे एक दिन उनकी हत्या कर दी गई. फिर, अम्मा और परिवार के अन्य लोगों को छोटे नाना वापस कानपुर ले कर आ गये. कानपुर में छोटे नाना का बड़ा घर था. अफीमकोठी पुलिस थाना से कुछ दूर, वह घर लालबंगला कहलाता था.

क्या बंगाली साहित्य भी आपके जीवन में घुला?
बंगाली साहित्य के संस्कार मुझे बचपन से मिले. यह मुझे अम्मा से मिले. बचत के पैसे इकट्ठा करते-करते कुछ सालों में गुल्लक दो रुपये के बराबर सिक्कों से भर गया. उस रुपये से पहली जो किताब खरीदी वह शरतचंद्र का विजया उपन्यास था. यह किताब मैंने नांदगांव में खरीदी थी.
छत्तीसगढ़ के उसी नांदगांव में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी भी थे, आपके ऊपर उनका क्या प्रभाव रहा?
नांदगांव में हमारे घर बख्शी जी का आना-जाना था. मेरे चचेरे बड़े भाई भगवती प्रसाद शुक्ल कविताएं आदि लिखते थे और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को बतलाते थे. उनका प्रभाव रहा.
घर में और भी लोग लिखा करते थे? भाई-बहन.
हां. घर पर बड़े भाई, चचेरे बड़े भाई भी लिखा करते थे. कविताएं, गजल लिखते थे. घर पर पढऩे-लिखने का माहौल था.
पहली कविता या पहली कहानी जब लिखी तो वह क्या था जिसकी वजह से शब्द भीतर से बाहर आए?
बचपन में कुछ रचनाएं लिखी थीं. पहली कविता या कहानी याद नहीं. कृषि महाविद्यालय जबलपुर की मैग्जीन में पहली कहानी छपी थी. उसका नाम था, नवाब हुजूर. फिर, वह कहीं खो गई. उस समय मैं B.Sc. कर रहा था. किसी कविता या कहानी को पहला-दूसरा जैसा कहना कठिन है. कहानी जब तक छपती नहीं उससे छुटकारा नहीं मिलता. यही कविता का भी हाल है, कविता जब तक छपती नहीं उससे भी छुटकारा नहीं मिलता. जब तक छपने लायक कविता या कहानी नहीं होती तब तक उसे छपने के लिए कहीं भेजता नहीं. अचानक जब किसी दिन ऐसा लगता कि यह रचना ठीक है तब उसे छपने भेज देता हूं. कभी वह छपती है कभी नहीं छपती. और जब तक नहीं छपती वह मेरे पास रहती है. कई बार पहले लिखी कविता, बाद में लिखी किसी कहानी के बाद छपती है.
किस समय लिखते हैं. क्या पहर के हिसाब से भी रचना आकार लेती है?
लिखने का कोई निश्चित पहर नहीं है. लेकिन लिखने की सोचने की तरफ मेरी सोच हमेशा रहती है. जब कुछ नहीं करता तब, जब चुपचाप बैठे रहता हूं तब और जब कुछ करता रहता हूं तब भी अंदरूनी तौर पर कोई बात सोच में रचना का रूप लेती रहती है. जब सोच में कोई कविता या विचार घटित होने का रूप लेने की कोशिश करता है, तब अचानक मैं उसे लिखने के लिए सोचने लगता हूं कि वह कैसी होगी? क्या होगी? यह सोच में पहले आ जाता है.

यह कैसे तय होता है कि कोई विचार कविता का रूप लेगी या कहानी का?
यह मेरी सोच ही तय करती है कि ये जो मैंने अभी लिखीं, दो पंक्तियां, चार पंक्तियां या दस पंक्तियां; वे किस रचना का रूप ले सकती हैं! कभी लगता है कि वह रूप अभी नहीं ले रही है तो वह लगातार सोच में बनी रहती है.
अपनी अभिव्यक्ति को विशिष्ट बनाने का दबाव या आकांक्षा होती है?
बिल्कुल नहीं.
मान लीजिए कोई विचार है, जो आपको मथ रहा है. क्या वही रचना के केंद्र में रहेगा? उसका साथ देने वाली बाकी घटनाएं कैसे जुड़ती हैं?
कोई विचार या पहले का लिखा जब दुबारा देखता हूं तो अचानक कोई पंक्ति आ जाती है, जो कभी कविता के रूप में आकार लेने लगती है कभी गद्य के रूप में. तब उसे लिख देता हूं. केंद्र में क्या होगा वहां यह रचना ही मुझे लेकर जाती है. बाकी सब भी इसी तरह उसमें आते-जाते हैं.
एक ही वस्तु को एक कवि, उपन्यासकार और बच्चों के लिए लेखन करने वाला रचनाकार अलग-अलग कैसे देखता है?
स्वाभाविक है, अलग-अलग व्यक्ति होते हैं तो उनका अनुभव भी अलग-अलग होता है. वे ही उसको अलग-अलग तरह से सोचने और लिखने के लिए उकसाते हैं. और, एक व्यक्ति का उसके अपने जीवन में मिला अलग-अलग अनुभव, उसके लेखन में अलग-अलग तरह से आता है.
आपकी रचनाओं की शुरूआत काफी दिलचस्प होती है, चाहे कविता हो या कथा लेखन. पहली पंक्ति की खोज कैसे करते हैं?
पहली पंक्ति की खोज मैं नहीं करता. जो मैंने लिखा है वही मुझे मार्ग दिखाता है. यह बताता है कि इस रचना को पाने के लिए मुझे किस तरफ भटकना होगा. लिखना एक प्रकार का भटकना ही होता है.
ऐसे में कविता आपके लिए आनंद का विषय है या ज्ञान का?
कविता मेरे लिए न आनंद का विषय है न ज्ञान का. कविता मेरे लिए अभिव्यक्ति का विषय है. कविता से मुझे मेरे होने का संतोष भी मिलता है.
आपकी भाषा में एक तरह का इत्मीनान है. स्लोनेस (Slowness) है. भाषा का यह अर्जन कहां से हुआ?
यह तो पाठक ही बता रहे हैं. यह मैं नहीं जानता कि मेरी भाषा में इत्मीनान है या धीमापन है. भाषा का अर्जन तो आस-पास रहने वालों, उनसे बोलचाल, उनकी आवाजाही में बोली का साथ होना, घरेलू बातचीत में बोली का होना और अपनी बात को स्पष्ट रूप से कह देने की कोशिश ही शायद स्लोनेस हो सकती है. यह अर्जन बोलने से ही होता है. मैंने पहले कई बार कहा भी है कि जितने स्थानीय होंगे, उतने ही वैश्विक होंगे.
कहीं यह स्लोनेस गांधीवादी प्रतिरोध का प्रतिबिंब तो नहीं?
यह सवाल कुछ ठीक से समझ में आया नहीं. मैंने गांधीवाद का कभी प्रतिरोध नहीं किया. भाषा का धीमा होना गांधीवाद का प्रतिरोध कैसे हुआ? यह समझ में नहीं आया. सवाल की यह अस्पष्टता ही बता रही है कि गांधीवाद को अब तक ठीक से समझा ही नहीं गया. दुनिया को, प्रकृति को, मनुष्यता को, लोकतंत्र आदि को बचाने में गांधीवाद आज भी एकमात्र विकल्प दिखता है.
मैं हमेशा गांधीवाद का पक्षधर रहा हूं. वे मुझे हमेशा याद आते हैं. एक घटना उनसे जुड़ी है. जब-तब स्मृति से वह लौट आती है. जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई, उस दिन नांदगांव में, घर में सब रो रहे थे. घर के बाहर सड़क पर भी सब रो रहे थे. उस दौर में सड़कों पर कार्बाइड के लैंप जला करते थे. उस दिन लैंप के उजाले में मुझे चांदी का एक सिक्का मिला. मुझे खुशी हुई थी. उसे लेकर मैं अम्मा के पास गया. मुझे लगा कि मुझे शाबाशी मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अम्मा ने तब कहा था कि इस सिक्के की जितनी कांदी आए ले लेना. कांदी मतलब हरी घास के गठ्ठे. और, उस कांदी को लेकर सड़क के किनारे गायों के लिए फैला देना. मैं तो उस समय बच्चा था. उस काम में दूसरों ने भी मेरी सहायता की थी. आज भी मैं यह समझ नहीं पाया हूं कि यह बात मुझे किस तरह याद है और क्यों है कि गांधी जी की जिस दिन मृत्यु हुई उस दिन मुझे चांदी का सिक्का मिला इसलिये या चांदी का सिक्का जिस दिन मिला, उस दिन गांधी जी की मृत्यु हुई थी.
गांधीवादी प्रतिरोध का अर्थ यहां गांधी की तरह प्रतिरोध का तरीका अपनाए जाने से था. हालांकि आपने स्पष्टता से उजागर दिया कि आप हमेशा से गांधीवाद के पक्षधर रहे हैं. आपने बचपन की स्मृति भी साझा की. क्या आपके लिए स्मृति समय को समझने का एक तरीका भी है?
हां, स्मृति समय को समझने का तरीका भी है. स्मृति का बार-बार हमारे पास लौटना या स्मृति की ओर हमारा बढऩा हर बार जीवन अनुभव को समृद्ध करता है.
स्मृतियां आपकी लेखन प्रक्रिया का सचेत हिस्सा हैं या स्मृति स्वयं भाषा को दिशा देती है?
स्मृतियां लेखन प्रक्रिया का हिस्सा तो हैं लेकिन वे स्वयं भाषा को दिशा नहीं देतीं.
क्या यह नैतिक अनुभव भी है या दूसरी तरह से पूछूं तो आपके ऊपर किसी तरह का नैतिक दबाव रहता है कि दुनिया को ऐसे ही देखा जाए?
यह नैतिक अनुभव तो है. और, एक नैतिक दबाव यह कि इसे मैं ऐसा भी देख सकूं.
आपने कहा कि 'जितने स्थानीय होंगे, उतने वैश्विक होंगे' पर एआइ (AI) तो एक तरह की वैश्विक भाषा गढ़ रहा है. क्या आपको यह किसी तरह की चुनौती लगता है?
हां, यह मैं हमेशा कहता हूं कि 'हम जितने स्थानीय होंगे, उतने ही वैश्विक होंगे.’ एआइ (AI) से मुझे कोई चुनौती नहीं लगती. एआइ की अपनी क्षमताओं के साथ एक सीमा भी है. वह अपनी उस सीमा से आगे नहीं जा पाएगा. इसके बाद वह खुद को दोहराता रहेगा. मनुष्य जैसा मशीन कभी नहीं सोच सकती. वो हमेशा एक कदम पीछे रहेगी. मनुष्य मशीन नहीं है. जब मशीन नहीं तो मशीन जैसे सोचेंगे कैसे? लेकिन आने वाले समय में एआइ उन लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती होगा जो इस पर निर्भर होते चले जाएंगे. कोई भी भाषा तो बोलियों में जीवित रहती है. दुनिया में एक भाषा का होना बहुत कुछ नष्ट करने जैसा भी है. चाहे वह तकनीकी भाषा ही क्यों न हो.
अगर भविष्य में कोई मशीन आपकी कहानियां या कविताएं पढ़कर आपकी शैली में लिखने लगे तो क्या वह आपको प्रसन्न करेगी या असहज?
शायद थोड़ा असहज कर दे. लेकिन किसी और की तरह लिखना तो अपनी मौलिकता को खो देना हुआ. वह तो नकल ही रहेगी. मैंने पहले भी कहा है कि एआइ को बनाया मनुष्य ने है. आज मनुष्य अपनी संवेदनशीलता को नष्ट करने को भी विकास मानने लगा है. उसने अपने सुख को और दुख को एआइ के पिंजरे में कैद कर लिया है. इस पर निर्भरता इस कैदखाने में उसे और अंदर धकेल देगी. एक दिन मनुष्य संवेदनाहीन होकर मरते तक इसी पिंजरे में रहेगा.
आपके पास आपकी अपूर्ण रचनाएं भी हैं? उनकी तरफ लौटते हैं?
जो मन में सोचा हुआ है वह भी लिखने से पहले का अपूर्ण है. किसी भी रचना की शुरूआत तो अपूर्णता से ही होती है. मेरी पहले की कई अधूरी कहानियां, कुछ उपन्यास अंश मेरे पास अब नहीं हैं. मेरे बिखरे पहले के लिखे हुए को बेटा समेट रहा है. अभी जो लिख रहा हूं उसे भी समेटते-सहेजते रहता है. उन सब सिमटे को दिखाकर दुबारा लिखने के लिए प्रेरित करता है. इसमें पत्नी और पूरा परिवार भी शामिल है. मैं इन समेटे हुए से लिखने की कोशिश करता रहता हूं. जिस दिन जिस लिखे को लगता है कि ठीक है उसे अपूर्णता से बाहर निकाल लेता हूं. इस बीच नया लेखन भी कभी रुका नहीं. लिख चुके और लिख रहे के बीच की अपूर्णता की ओर इसी तरह लौटते रहता हूं.
लगभग जयहिंद से लेकर आजतक की लेखन यात्रा में खुद को आपने कितना बदला हुआ पाया?
मैं अपने लेखन में बदलाव तो पाता हूं. यह किस तरह का बदलाव है यह पाठक ही बता सकेंगे.
क्या रचना का कोई नेपथ्य होता है, जिसका रचनाकार को पता होता है. सवाल इसलिए भी कि अक्सर कहा जाता है कि आपने अपने ही राज्य के लोगों की चिंताओं पर न के बराबर लिखा?
लिखते समय दुनिया के सारे लोग बराबर होते हैं. मैं मनुष्य के बारे में, मनुष्यता के बारे में सोचता हूं. लोगों को क्षेत्रों आदि में, टुकड़ों में बांटकर राजनैतिक चश्में से नहीं देखता. सवाल यह भी है कि मेरा लिखा हुआ क्या पूरा पढ़ा गया है? अगर पढ़ा गया होता तो शायद यह सवाल नहीं होता. मेरी जवाबदेही मेरी रचनाओं में है.
मित्रों के बारे में कुछ बताइए.
जीवन में हमेशा जो साथ रहे वे आकाश, चंद्रमा, नक्षत्र, पेड़-पौधे, हवा, पृथ्वी, पक्षी ही रहे. एक तरह से मुझे संभाले हुए से. मित्रता बचपन की चीज है. उम्र कुछ बढ़ी तो उस समय किसी से मिलना-जुलना अच्छा लगता था. फिर सब धीरे-धीरे अपने-अपने काम में व्यस्त होते गये. उम्र बढ़ती जाती है तो मित्रता भी छूटती जाती है. मेरी शत्रुता किसी से भी नहीं है.
जीवन का सबसे बड़ा सुख क्या रहा?
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख यही रहा कि जो काम बचपन में करता था लिखने-पढऩे का काम, वो अभी भी कर रहा हूं.
सबसे बड़ा दु:ख?
सबसे बड़ा दुख क्या है यह बता सकना बहुत मुश्किल है. सबसे बड़ा दुख कभी किसी के साथ नहीं होना चाहिए.
कोई मलाल?
कोई मलाल भी नहीं होना चाहिए.
कभी किसी के लेखन को पढ़कर लगा हो कि काश यह मैंने लिखा होता?
हां. किसी और के लेखन को पढ़कर मुझे कई बार ऐसा लगा कि काश यह मैंने लिखा होता.
अगर रायपुर की जगह दिल्ली में होते तो भी इतना ही लिख पाते?
मुझे लगता है कि अगर मैं दिल्ली में होता तो इतना नहीं लिख पाता.
जीवन के उत्तरार्ध में आप पर पुरस्कारों की वर्षा-सी हुई, हो रही है. क्या कहेंगे.
कोई भी लेखक पुरस्कार पाने के लिए नहीं लिखता. पुरस्कार मिलने से खुशी होती है, चाहे वह कितना भी छोटा पुरस्कार हो या बड़ा. दोनों के मिलने से एक जैसी खुशी होती है. पुरस्कार लेखक को बड़ा नहीं बनाते, उसकी रचना उसे बनाती है. पुरस्कार हमेशा जिम्मेदारी को साथ लेकर आते हैं.
कोई ऐसा काम जो आप करना चाहते थे, नहीं कर पाए और करना चाहते हैं?
मुझे लगता है जो काम करना चाहता था, वह कर पाया. और इस बात की खुशी है कि मैं लिखने-पढऩे का काम करना चाहता था, और लिखने-पढऩे का काम करता रहा. अभी भी कर रहा हूं.

