
सिखों के दसवें गुरु- गुरु गोबिंद सिंह के जीवन की पहचान वैसे तो संघर्ष और खालसा पंथ की स्थापना करने वाले के तौर पर है. मगर उनके जन्मस्थान पटना साहिब के लोग उन्हें हिंदुओं के देवता कृष्ण की तरह बाल लीलाएं करने वाले के रूप में याद करते हैं.
यहां के सिख बताते हैं कि गुरु गोबिंद सिंह ने पटना में अपने शुरुआती जीवन के सात साल बिताए. इस दौरान उन्होंने किसी निस्संतान महिला को अपनी मां बना लिया, किसी गरीब के घर खिचड़ी खाई तो किसी मंदिर में जाकर प्रसाद खाने लगे. उनकी इन नटखट बाल लीलाओं का जिक्र आज भी पटना की सिख संगतें करती हैं और इन लीलाओं के स्थल पर गुरुद्वारे भी बने हैं.

वैसे तो सिख धर्म के पहले नौ गुरुओं का जन्म पंजाब सूबे में हुआ था मगर यह दिलचस्प है कि दसवें गुरु गोबिंद सिंह की पैदाइश बिहार की राजधानी पटना है. हालांकि उनके माता-पिता रहने वाले पंजाब के ही थे. पटना में उनका जन्म एक संयोग की बात है. गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी काव्यमय जीवनी बचित्तर नाटक में बहुत संक्षेप में अपने जन्म और पटना प्रवास के बारे में लिखा है. इस ग्रंथ के सातवें अध्याय “कवि का जन्म” में वे लिखते हैं :
मुर पित पूरब कीयिस पयाना, भांति- भांति के तीरथि नाना.
जब ही जात त्रिबेणी भये, पुन दान दिन करत बितये.
मतलब यह कि मेरे पिता ने धर्म प्रचार के लिए पूरब दिशा की यात्रा शुरू की और अलग-अलग तीर्थों की यात्रा करते हुए त्रिवेणी (संगम) पहुंचे.
तही प्रकास हमारा भयो, पटना शहर बिखै लव लयो.
मतलब वहीं यानी त्रिवेणी में मैं प्रकाशित हुआ (माता के गर्भ में आया) पटना शहर में फिर मेरा जन्म हुआ. इसके आगे वे लिखते हैं कि फिर मुझे पंजाब ले जाया गया. जहां मेरा लालन पालन हुआ.
मगर पटना के तख्त हरमंदिर साहब गुरुद्वारा ने पटना साहिब का इतिहास के नाम से जो पुस्तिका प्रकाशित की है, उसके मुताबिक जब गुरु गोबिंद सिंह के पिता गुरु तेगबहादुर पटना से पहुंचे तो उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी गुजरी देवी को गुरु नानक देव के शिष्य जौहरी सालस राय के वंशज घनश्याम के घर छोड़ दिया. यह सोचते हुए कि आगे की कष्टप्रद यात्रा में उन्हें परेशानी न हो. वहां से निकलकर गुरु तेगबहादुर जब असम के धुबरी पहुंचे तब उन्हें खबर मिली कि उनके पुत्र का जन्म पौष महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ है. अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से वह तिथि 22 दिसंबर, 1666 की थी.
फिर जब गुरु तेगबहादुर असम से लौटकर आए तब तक गुरु गोबिंद सिंह अपनी माता गुजरी देवी के साथ पटना में ही घनश्याम जौहरी के महल में रहे. गुरु तेगबहादुर ने यात्रा के दौरान ही हुक्मनामा लिखकर इसे ‘गुरु का घर’ की उपाधि दे दी. वही महल अब गुरुद्वारा पटना साहिब हो गया है.
इस पुस्तिका के मुताबिक गुरु गोबिंद सिंह यहां लगभग सात वर्षों तक रहे. अपने नन्हें पैरों की अमिट छाप वे इस भूमि पर छोड़ गए. पटना में पं. शिवदत्त, नवाब रहीम बख्श, पीर अरीफोदीन, सैयद भीखन शाह और राजा फतेहचंद मैनी उनके खास श्रद्धालुओं में से थे. मगर इस पुस्तिका में यह जिक्र नहीं है कि सात साल के दौरान उन्होंने यहां क्या-क्या किया.
ये कहानियां पटना के उन तीन गुरुद्वारों के साथ जुड़ी हैं, जिनसे उनका नाता बताया जाता है. ये गुरुद्वारे हैं- गुरुद्वारा बाललीला, गुरुद्वारा कंगन घाट और गुरुद्वारा हांडी साहब.
गुरुद्वारा बाललीला, पटना साहिब गुरुद्वारे के ठीक पीछे के मोहल्ले में है. हाल के दिनों में इस गुरुद्वारे को यहां के संचालकों ने भव्यरूप दे दिया है. इस गुरुद्वारे के संचालक बताते हैं कि पहले यहां राजा फतेहचंद मैनी का महल हुआ करता था. बचपन में गुरु गोबिंद सिंह जिन्हें तब बाला प्रीतम गोबिंद राय के नाम से जाना जाता था, अपने दोस्तों के साथ उस महल के अहाते में खेला करते थे. राजा फतेहचंद मैनी की कोई संतान नहीं थी. उनकी रानी विसंभरा देवी इस बात को लेकर उदास रहा करती थी.
एक दिन खेलते-खेलते बाल गोबिंद उनकी गोद में बैठ गए और कहा, “आज से मैं तुम्हारा धर्म पुत्र हूं और तुम मेरी धर्म माता.” फिर उन्होंने रानी से पूरी और घुघनी मांग कर खाई और अपने दोस्तों को भी खिलाई. जब वे पटना छोड़कर आनंदपुर साहिब जाने लगे तो उन्होंने रानी से कहा कि वे रोज सुबह बच्चों को पूरी और घुघनी खिलाया करें. तब से उस गुरुद्वारे में हर सुबह बच्चों के लिए पूरी-घुघनी का लंगर लगता है.

इसी तरह पटना साहिब गुरुद्वारा के सामने गंगा किनारे एक गुरुद्वारा कंगन साहिब है. यहां उस जमाने में भगवान राम का एक मंदिर हुआ करता था, जिसके पुजारी थे पंडित शिवदत्त. गुरु गोबिंद सिंह बचपन में यहां आते और शिवदत्त भगवान को जो प्रसाद चढ़ाते उसे चुपके से खा जाते. एक दिन पंडित ने जब उन्हें ऐसा करते देख लिया तो पूछा कि बच्चे तुम ऐसा क्यों करते हो? इस पर बाल गोबिंद ने उन्हें अपना ईश्वरीय रूप दिखाया और कहा- मैं ही तो वह भगवान राम हूं, जिसे तुम प्रसाद चढ़ाते हो. इसलिए मैं तुम्हारा प्रसाद खा जाता हूं. इस घाट पर एक दिन उन्होंने सांसारिक सुखों से वैराग्य जताने के लिए अपनी मां का सोने का कंगन गंगा में फेंक दिया. उनकी मां जब गंगा में कंगन तलाशने आईं तो वहां उन्हें हजारों सोने के कंगन नजर आ रहे थे. वहां पहले गुरुद्वारा कंगन घाट के नाम से एक छोटा सा गुरुद्वारा था, हाल के वर्षों में वहां एक विशाल गुरुद्वारा बनाया गया है.
बाल गोबिंद की पटना में तीसरी लीला उनके विदाई के दिन हुई. उनके पिता असम की यात्रा से लौट आए थे. उन्होंने पटना शहर के बाहर दीदारगंज के पास अपने अनुयाइयों के साथ डेरा डाला था. वहां एक गुरुद्वारा बना, जिसका नाम गुरुद्वारा गुरु का बाग रखा गया. आज भी देश भर से आने वाले निहंग वहीं अपना डेरा डालते हैं.
खैर, जब उनकी पटना से विदाई होने लगी तो वे थोड़ी देर के लिए उस वृद्ध महिला जमना माई के घर गये, जो उनसे मिलना चाहती थीं. वे अपनी पूरी टोली के साथ उस जगह पहुंचे. यह अभी दानापुर के पास है. जमना माई से मिलकर उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे खिचड़ी खाना चाहते हैं. जमना माई ने खिचड़ी तो पकाई थी, मगर उनकी हांडी में थोड़ी-सी खिचड़ी बची थी. फिर अपने जादू से बाल गोबिंद ने उस खिचड़ी को इतना अधिक कर दिया कि पूरी संगत ने भरपेट खिचड़ी का लुत्फ लिया. वहीं आज गुरुद्वारा हांडी साहिब बना है और यहां रोज खिचड़ी का लंगर लगता है.
पटना में गुरु गोबिंद सिंह की बाल लीलाओं से जुड़े ये गुरुद्वारे तो हैं ही मगर पूरे बिहार में ऐसे कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं, जिनका जुड़ाव गुरु नानक देव और गुरु तेगबहादुर से संबंधित है. पटना का गायघाट गुरुद्वारा वह पहला गुरुद्वारा है जिससे पटना में सिख धर्म की शुरुआत हुई थी. वहां जेतामल नाम के व्यापारी रहते थे, गुरु नानक देव पहले पहल पटना पहुंचकर वहीं ठहरे थे. वहीं उनसे जौहरी सालस राय मिले थे. उसी रिश्ते के आधार पर गुरु तेगबहादुर ने उनके वंशज घनश्याम के पास अपनी गर्भवती पत्नी गुजरी को छोड़ा था.
इसके अलावा सासाराम, राजगीर, मुंगेर, लालगंज और कटिहार में ऐसे गुरुद्वारे हैं, जिनका संबंध गुरु नानक देव और गुरु तेग बहादुर से रहा है. उस दौर में बिहार के स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में सिख धर्म अपनाया, इन्हें सनातनी सिख कहा जाता है. सनातनी सिख सभा के अध्यक्ष त्रिलोक सिंह निषाद कहते हैं, “बिहार में लगभग 350 गुरुद्वारे हैं. इनमें कई गुरुद्वारे सिख धर्म से संबंधित हैं और बड़ी संख्या में नानकशाही गुरुद्वारे हैं. बिहार में केशधारी सिखों की संख्या लगभग 35-49 हजार हैं, सहजधारी और उदासीन सिखों को जोड़ दिया जाए तो इनकी संख्या लाखों में होगी.”
बिहार सरकार भी पटना साहिब के महत्व को समझकर गुरु गोबिंद सिंह की जयंती के मौके पर प्रकाश पर्व के आयोजन में सहयोग करती है. 2016 में 350 प्रकाश पर्व का भव्य आयोजन सरकार की तरफ से किया गया था. इन दिनों 359 वां प्रकाश पर्व आयोजित हो रहा है.

