
- अवनीश सोमकुवर
अगर आपको बताएं कि यह तस्वीर डायनासोर के अंडे की है तो आपको हैरानी होगी या अविश्वास? शायद दोनों ही होंगे और वह इसलिए कि यह अंडा करीब 6 करोड़ साल पुराना है. लेकिन आज यह आप कहां देख पाएंगे! मध्य प्रदेश के घुघुवा गांव में स्थापित देश के पहले जीवाश्म उद्यान में, जो पूर्वी हिस्से के डिंडोरी जिले में पड़ता है.

यहां आकर आपको यह भी पता चलेगा कि दुनिया के सबसे पुराने पेड़ यूकेलिप्टस और ताड़ हैं. दुनिया के सबसे पुराने फल-बीज आम, चिरोंजी, हर्रा, रुद्राक्ष, जामुन, केला और नारियल हैं. यह सब डायनासोर के समय के फल, बीज और वृक्ष हैं और हमारे लिए सम्माननीय हैं.



करोड़ों साल पहले के वक्त की खिड़की जहां खुलती है, उस घुघुवा का रास्ता हम लेते हैं आज के जबलपुर से. यहां से डिंडोरी जिले की तरफ शाहपुरा तहसील जाने वाली सड़क पर हरियाली भरा रास्ता तय कर 100 किलोमीटर बाद आता है घुघुवा गांव.
करीब 450 घरों की बस्ती वाला घुघुवा वास्तव में वैश्विक महत्व का गांव है. यह सकतरा ग्राम पंचायत का भरा-पूरा गांव है. राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान या नेशनल फॉसिल पार्क, घुघुवा के भीतर जाते हुए कोई रोमांच नहीं होता लेकिन इसके भीतर रखे हुए जीवाश्म के पास खड़े होना बेहद रोमांचकारी अनुभव है. पत्थर बन चुके पेड़, पौधे, झाड़ियां और डायनासोर का अंडा देख सहज विश्वास नहीं होता. दरअसल हम ऐसे साक्ष्यों के साथ खड़े हैं जो छह करोड़ साल पुराने हैं. खुद को भरोसा देने हम इन्हें बार-बार छूकर देखते हैं और समय का अंदाज लगाते हैं. समय देखने की नहीं अनुभव करने की वस्तु है. कल्पना और वैज्ञानिक तथ्यों का गठजोड़ करते हुए सत्य के सामने पहुंचने की क्षमता और साहस बंटोरते हैं. सिर्फ कल्पना या सिर्फ तथ्य काफी नहीं. इसका गहन बोध घुघुवा में सहज होता है.

घुघुआ मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में है और इसके ठीक विपरीत पश्चिमी भाग में भी धार जिले के पास बाग में डायनासोर पार्क आकार ले रहा है. एक ही प्रदेश में दो फॉसिल पार्क होना एक बड़ी उपलब्धि है. बाग में सोरोपॉड और एबेलिसोरस डायनासोर की हड्डियों और अंडों के जीवाश्म मिलना आश्चर्य से भर देता है. घुघुवा का आश्चर्य है डायनासोर के अंडे और पेड़ -पौधों के जीवाश्म का एक साथ मिलना. लाखों साल पहले पृथ्वी के इस भाग में हुई उथल-पुथल के इतिहास के यह साक्ष्य हैं. आज से 10-15 करोड़ वर्ष पहले क्या हुआ था इसकी कल्पना करना एक रोमांचकारी अनुभव है.

आखिर जीवाश्म बनते कैसे हैं
जीवाश्म का बनना एक अनूठी वैज्ञानिक प्रक्रिया है. हर जीव-जंतु, पेड़-पौधों के जीवाश्म नहीं बनते. इसके लिए जरूरी है कि उनके सड़ने की प्रक्रिया शुरू होने के पहले ही तलछट की प्रक्रिया शुरू हो जाए. तलछट की प्रक्रिया मतलब है कि जीव-जंतु या पेड़-पौधों के मरने के तुरंत बाद उसके ऊपर ज्वालामुखीय राख, रेत या मिट्टी परत जम जाए ताकि उनके नष्ट होने की प्रक्रिया शुरू ही न हो पाए.


इस तरह लाखों बरसों में वे पत्थर बन जाते हैं. इसलिए ज्यादातर जीवाश्म तलछटी चट्टानों में मिलते हैं या झीलों, नदियों, समुद्र के भीतर मिलते हैं. धरती के गहरे नीचे कोयले में दबे मिलते हैं. उन्हें ऑक्सीजन और बैक्टीरिया नहीं मिलने से सड़ने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाती और तलछट की परत जमने लगती है. इनका आकार ठीक वैसा ही होता है जैसा जीव-जंतु या पेड़-पौधे का असली रूप होता है. यह प्रक्रिया सालों में पूरी होती है इसलिए जीवाश्म का मिलना हमारे लिए आश्चर्य से कम नहीं. सीधे-सरल शब्दों में कहें तो जो जीव-जंतु, पेड़-पौधे सड़ने से बच गए और खनिज कणों से भर गए वे पत्थर में बदल गए और सदा के लिए संरक्षित हो गए.

घुघुवा में उन पौधों के जीवाश्म मिलते हैं जो 6.5 करोड़ साल पहले होते थे. अब तक 31 परिवारों के जीवाश्म मिले हैं इसमें ताड़ प्रमुख है. ऑस्ट्रेलिया का मूल वृक्ष यूकेलिप्टस का जीवाश्म देखना एक अद्भुत अनुभव है. घुघुआ पृथ्वी का इतिहास बताने वाली जगह है. यहां पता चलता है कि हिमालय समुद्र के भीतर था क्योंकि हिमालय में समुद्र में रहने वाले जीवों के जीवाश्म मिले हैं. घुघुवा यह भी बताता है कि भारत ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से सटा हुआ भूभाग था. यहां जिन पेड़-पौधों के जीवाश्म मिले हैं, वे पेड़-पौधे ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में भी पाए जाते हैं.
आपको जब समय का आभास लेना हो या कल्पना करना हो कि लाखों साल पहले पृथ्वी के इस भू-भाग पर क्या हुआ होगा तो घुघुवा में आइए और कुछ देर ठहर जाइए. यदि आपकी जीवन विज्ञान में जरा भी दिलचस्पी है तो यह आपके लिए अद्वितीय अनुभव होगा, दिलचस्पी नहीं है, तो घुघुवा वह पैदा करने की पूरी क्षमता रखता है.
(लेखक मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग में उप निदेशक हैं)

