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हथियार उठाने वाले हाथों ने थामे कॉफ़ी के कप, ऐसे बदल रहा माओवाद में जकड़ा बस्तर

छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी और इससे प्रभावित लोग बस्तर में शुरू हुए पंडुम कैफे को चलाते हैं जो अपने छत्तीसगढ़ी खानपान के साथ इटैलियन और चाइनीज डिशेज के लिए भी चर्चा में है

बस्तर का पंडुम कैफे (फोटो : चंद्रदीप कुमार)
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2026

कुछ वक्त पहले तक छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन का हेडक्वार्टर, और वामपंथी उग्रवाद का गढ़ रहा जगदलपुर अब पहले जैसा नहीं दिखता. हथियार डाल चुके माओवादी और कभी इसके पीड़ित रहे लोग, शांति से एकसाथ काम करते हुए इस कायाकल्प की कहानी कहते हैं.

महज दो माह पहले शुरू हुआ कैफ (कैफे) पंडुम युवाओं के ऐसे अड्डे के तौर पर खुद को स्थापित कर रहा है जहां वे न सिर्फ लोकल खान-पान और माहौल का आनंद ले रहे हैं, बल्कि दशकों की हिंसा के बाद इलाके में लौटी शांति का जश्न भी मना रहे हैं.

यहां के मूल गोंड समाज की गोंडी भाषा में पंडुम का शाब्दिक अर्थ है 'त्योहार'.

कैफ पंडुम, दरअसल, बस्तर के आईजी सुंदरराज पी. के प्रयासों का नतीजा है. यहां के विस्तृत मेन्यू में इटैलियन और चाइनीज से लेकर ठेठ छत्तीसगढ़ी पकवान जैसे 'फरा' और बस्तर का 'बड़ा' मिल जाते हैं. लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि यहां का स्टाफ 14 ऐसे लोगों से मिलकर बना है जिन्होंने किसी न किसी रूप में माओवादी हिंसा का दंश झेला है. इनमें से पांच खुद सरेंडर कर चुके माओवादी हैं, तो वहीं बाकी इसके पीड़ित रहे हैं. इनमें महिलाएं भी शामिल हैं.

कैफ पंडुम का उद्घाटन बीते साल नवंबर में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने किया था. इस दौरान उन्होंने यहां उन्हें परोसे गए खाने का जायका भी लिया था.

कैफे के को-फाउंडर तुपेश चंद्राकर कहते हैं, "कैफे का मेन्यू यहां के लोगों के खान-पान के गहरे अध्ययन और रिसर्च के बाद तय किया गया है. हालांकि, हमने यह भी तय किया कि यहां के लोगों तक बाहरी दुनिया का स्वाद पहुंचाना भी जरूरी है. इसलिए इटैलियन और चाइनीज आइटम भी शामिल किए गए."

चंद्राकर और उनके बिजनेस पार्टनर प्रियंक पटेल पहले ही रायपुर में नुक्कड़ कैफेज नाम की कैफे चेन चला रहे हैं. अपने कैफेज में वे हाशिए पर रहे लोगों को नौकरी देने के लिए जाने जाते हैं, जैसे, ट्रांसजेंडर और विकलांग. उनका यह इतिहास देखते हुए समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों वे बस्तर पुलिस के कैफ पंडुम के  आइडिया को साकार करने के लिए एक सहज विकल्प के तौर पर चुने गए.

नुक्कड़ की मैनेजमेंट टीम ने ही पंडुम के स्टाफ को ट्रेनिंग देने का काम किया है. कैफे रेवेन्यू-शेयरिंग सिस्टम पर काम करता है, जिसके तहत कमाई का एक तय हिस्सा बस्तर पुलिस के पास जाता है, जिसने नुक्कड़ टीम को कैफे चलाने के लिए इक्विटी के तौर पर जमीन मुहैया करवाई है.

न सिर्फ यह कैफे एक अलग तरह की मिसाल कायम करता है, बल्कि इसका डिजाइन भी एक कहानी कहता है. इसकी दीवारों की नंगी ईंटों पर बस्तर में मनाए जाने वाले 12 'पंडुम' का जिक्र है. इस तरह यह परिसर लौटी हुई शांति का प्रतीक बनकर खड़ा है.   

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