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फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल किडनी के लिए हो सकता है घातक!

हाल ही में किडनी इंटरनेशनल जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें लोगों को फेयरनेस क्रीम के इस्तेमाल के खतरों से आगाह किया गया है

भारत में फेयरनेस क्रीम का मार्केट करीब 5000 करोड़ रुपये का है/ सांकेतिक फोटो
भारत में फेयरनेस क्रीम का मार्केट करीब 5000 करोड़ रुपये का है/ सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2024

कहीं पढ़ा था कि देश में तीन 'ग' लोगों को खूब मोहित करते हैं - गंगा, गांधी और गोरा. गंगा की शुद्धता की बात अब बेमानी हो चली है. वहीं गांधी की मौजूदगी आज भी लोगों के ख्यालों में (सैद्धांतिक रूप में ही सही) और नोटों पर मौजूद हैं. लेकिन जब बात "गोरा" बनाने वालीं फेयरनेस क्रीम्स की हो तो आज इनका मार्केट करीब 5000 करोड़ रु. तक पहुंच गया है और ये तेजी से बढ़ता जा रहा है. 

भारत में गोरेपन का ये धंधा ठीक ढंग से 1975 में शुरू हुआ जब हिंदुस्तान यूनीलीवर कंपनी ने फेयर एंड लवली क्रीम मार्केट में उतारी. इस फेयरनेस क्रीम ने लोगों को गोरे होने के सपने दिखाए और देखते ही देखते कंपनी बाजार में छा गई. बाद में और भी कंपनियां इस धंधे में उतरीं और जमकर नोट छापे. लेकिन अब एक हालिया स्टडी ने सिक्के के दूसरे पहलू को लोगों के सामने पेश किया है.

किडनी इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में बताया गया है कि फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल किडनी पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है क्योंकि इनमें पारा की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. स्टडी के मुताबिक इस तरह की क्रीम के बढ़ते इस्तेमाल से मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी (एमएन) के मामले बढ़ रहे हैं. एमएन एक ऐसी स्थिति है जो किडनी फिल्टर को नुकसान पहुंचाती है और शरीर से प्रोटीन लीकेज का कारण बनती है. 

एमएन एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो नेफ्रोटिक सिंड्रोम की वजह बनती है. आसान लहजे में कहें तो नेफ्रोटिक सिंड्रोम एक किडनी डिसऑर्डर है जिसके चलते पेशाब के रास्ते शरीर से ज्यादा मात्रा में प्रोटीन बाहर निकल जाता है. इस स्टडी में बतौर रिसर्चर योगदान देने वाले केरल के डॉ. सजीश शिवदास ने एक्स पर लिखा, "पारा त्वचा से होकर शरीर में प्रवेश करता है और किडनी फिल्टर्स को नुकसान पहुंचाता है. इससे नेफ्रोटिक सिंड्रोम के मामले लगातार बढ़ रहे हैं." 

डॉ. शिवदास ने आगे लिखा, "भारत के अनियमित बाजारों में लगभग हर जगह मौजूद ये क्रीम जल्दी परिणाम का वादा करती हैं, लेकिन आखिर किस कीमत पर? क्रीम लगाने वाले अक्सर इन क्रीम्स की एक लत के रूप में शिकायत करते हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल बंद करने से त्वचा का रंग और भी डार्क हो जाता है."

इस स्टडी के बारे में और ब्योरा साझा करें तो जुलाई 2021 से सितंबर 2023 के बीच रिपोर्ट किए गए 22 एमएन मामलों की जांच की गई. इन मरीजों को केरल के एस्टर एमआईएमएस अस्पताल में दाखिल किया गया था जिन्हें अक्सर थकान, हल्की सूजन और पेशाब में झाग की शिकायत रहती थी. सिर्फ तीन मरीजों को गंभीर सूजन थी लेकिन सभी के पेशाब में प्रोटीन का स्तर बढ़ा हुआ था.  

नतीजे जब सामने आए तो पता चला कि करीब 68 फीसदी लोग (22 में से 15) न्यूरल एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर यानी NELL-1  से पीड़ित थे. NELL-1 एमएन का ही एक दुर्लभ रूप है जो काफी घातक साबित हो सकता है. खैर, इन 15 में से 13 लोगों ने स्वीकार किया कि फेयरनेस क्रीम के इस्तेमाल शुरू करने के बाद ही उनके शरीर में बीमारी से जुड़े लक्षण सामने आए.

इस स्टडी पेपर में रिसर्चर्स ने लिखा है, "इनमें से ज्यादातर मामले इन क्रीमों के इस्तेमाल बंद करने से हल हो गए. लेकिन ऐसे प्रोडक्ट एक संभावित स्वास्थ्य खतरा पैदा करते हैं जिसे रोकना जरूरी है. ऐसे प्रोडक्ट के इस्तेमाल के खतरों के बारे में जागरूकता फैलाना और स्वास्थ्य अधिकारियों को सचेत करना जरूरी है."

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