देश में महिलाओं के साथ बढ़ती रेप की घटना भयावह स्थिति में पहुंच गई है. आंकड़े बताते हैं कि देश में औसतन हर रोज 80 से ज्यादा (असल में 86) रेप होते हैं और इस लिहाज से लगभग हर बीस मिनट में एक स्त्री रेप का शिकार होती है. इनमें तीन महीने की बच्ची भी शामिल है और 80 साल की बुजुर्ग महिला भी. मगर इनमें से ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते. कुछ चुनिंदा मामलों में पुलिस कार्रवाई होती है और वे अदालत तक पहुंचते हैं. कुछ हाई प्रोफाइल मामले मीडिया में आते हैं और उन पर डिबेट होती है. दूसरी तरफ ज्यादातर मामले अखबारों में सिंगल कालम खबर बनकर रह जाते हैं.
इस भयावह संकट और इसके प्रति अपने देश-समाज में समुचित संवेदनशीलता के अभाव को फोकस करते हुए निर्देशक अनुभव सिन्हा ने अस्सी फिल्म बनाई है. इस फिल्म में मुख्य भूमिका में कोर्ट ड्रामा की पसंदीदा अभिनेत्री तापसी पन्नू हैं, इन दोनों की फिल्म थप्पड़ को लोगों ने खूब पसंद किया था. अनुभव ने इस फिल्म में तापसी के अलावा किसी बड़े स्टार को नहीं लिया है. वे कहते हैं कि उन्होंने रिस्क लेकर एक संवेदनशील फिल्म बनाई है, जिसमें कई तरह के व्यावसायिक खतरे हैं. उनके विषय का चयन निश्चित तौर पर शानदार है और उनकी यह अपील कि ऐसी फिल्मों को लोग समर्थन दें, ताकि आगे भी ऐसी फिल्में बने, भी वाजिब है.
मगर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या खुद अनुभव सिन्हा इस संवेदनशील विषय के साथ उचित न्याय कर पाए हैं? पटना में हुए इस फिल्म के प्रीमियर शो को देखने के बाद ऐसा लगता नहीं है. फिल्म जिस बड़े मकसद से शुरू होती है वह अपने दर्शकों को फिल्मोग्राफी के जरिए उसे ठीक से पहुंचाती नजर नहीं आती. दुर्भाग्यवश अस्सी की सबसे कमजोर कड़ी इस फिल्म की कहानी, इसका निर्देशन और कुछ हद तक एडिटिंग ही है. उलझी कहानी, कई-कई समानांतर प्लॉट जिनके बीच संदेश देने में विफलता के बोझ को इस फिल्म के कुछ शानदार अभिनेता भी अपने कंधों पर ढोने में विवश दिखते हैं. यह फिल्म परेशान तो करती है, मगर प्रभावित नहीं करती.
फिल्म की शुरुआत उस भयावह दृश्य से होती है, जहां पटरियों पर एक स्कूल शिक्षिका क्षत-विक्षत हालत में नजर आती है, उसका रात में रेप हुआ है. शुरुआत के 15-20 मिनट काफी परेशान करने वाले हैं. खासकर कार में रेप की पूरी वारदात को डिटेल में दिखाया गया है. रेप करने वाले पांच लड़कों की भयावह क्रूरता, बेशर्मी और निष्ठुरता, यह सब बहुत परेशान करता है. इस बीच शिक्षिका के परिवार के दृश्य ही थोड़ी राहत देते हैं. मगर उन पर भी ये दृश्य भारी पड़ते हैं. फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा ये दृश्य ही हैं. इसके बाद फिल्म बिखरनी शुरू हो जाती है. इस अच्छी शुरुआत के बाद कहानी को जिस तरह फैलाना था, वह फैल नहीं पाई. और उस बेतरतीब फैली कहानी को आखिर में ठीक से समेटा भी नहीं जा सका.
इस फिल्म की कहानी का सबसे कमजोर पहलू इसमें डाले गए कई तरह के छोटे-छोटे प्लॉट हैं. लगभग हर किरदार की अपनी कहानी शामिल करने की कोशिश की गई है. ऐसे में उनकी कहानी शुरू तो होती है, मगर फिर कहीं गुम हो जाती है. दर्शक ढूंढते रहते हैं कि आखिर इनका क्या हुआ. दो घंटे, 13 मिनट की फिल्म के लिहाज से यह प्रयोग जमता नहीं है.
असली कहानी रेप विक्टिम के परिवार की है. मगर उसके साथ वकील बनी तापसी पन्नू के करीबी कार्तिक (कुमुद मिश्रा) की अलग कहानी है, जो बीमारी या हादसे में, जो ठीक से समझ नहीं आता, अपनी पत्नी को गंवा चुका है. वह फिर सीक्रेट किलर बन जाता है और मारा जाता है. उसके साथ स्पेशल एपीयरेंस में नसीरूद्दीन शाह भी हैं. मगर उस किरदार की कहानी पर भी खूब कन्फ्यूजन तारी रहता है. रेप के आरोपियों की अलग-अलग कहानियां हैं. मगर उनमें से सिर्फ एक आखिरी आरोपी की कहानी का ही फिल्म से कोई जुड़ाव लगता है. एक कहानी में मनोज पाहवा और सुप्रिया पाठक जो पति पत्नी हैं, के बीच तनाव की झलक दी गई है, मगर तनाव क्या है, वह साफ नहीं होता और थोड़ी ही देर बाद मनोज पाहवा अपने आरोपी बेटे के साथ सड़क पर छोले भटूरे खाते दिखते हैं.
एक करप्ट पुलिस अधिकारी है, जो हिंदी साहित्य का दीवाना है. रामधारी सिंह दिनकर से लेकर राम मनोहर लोहिया तक का जिक्र करता है और उदय प्रकाश की कविताएं पढ़ता है. उसे पुलिस व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करने के लिए रखा गया है, मगर वह कर नहीं पाता. दो आरोपियों की बहनें उनकी लानत मलामत के लिए कुछ पलों के लिए आती हैं, मगर फिर वे उन्हें माफ भी कर देती हैं. सीरियल किलर जो रेप के आरोपियों की हत्या करता है, एक बार न जाने क्यों आरोपी की गर्लफ्रेंड की हत्या कर देता है. ऐसे कई अनसुलझे सवाल इस फिल्म की कहानी में रह गए हैं. जबकि इसकी कहानी खुद अनुभव सिन्हा ने गौरव सोलंकी जैसे कथाकार के साथ मिलकर लिखी है. अगर बहुत सकारात्मक तरीके से सोचें तो लगता है, फिल्म की लंबाई कम करने के लिए जो टाइट एडिटिंग की गई होगी, उसमें ज्यादातर कहानियां भी दफ्न हो गई हैं.
दिक्कत यह है कि संकट सिर्फ कहानियों के उलझाव का नहीं है. कहानी कोई असरदार अंत तक भी नहीं पहुंचती. कोर्ट में अपने मोनोलॉग में तापसी सही सवाल उठाती हैं कि जज ऐसा फैसला सुनाए जिससे औरतें अकेले बिना पुरुषों के इस देश में रात-दिन सारे काम बेफिक्र होकर कर सकें. मगर न जज बनी रेवती ऐसा फैसला सुना पाती हैं, न निर्देशक दर्शकों को ऐसा अहसास दे पाते हैं. यह सही है कि उन पर हम क्यों इतना बड़ा बोझ डालें, मगर फिर उन्हें भी आखिर में रेप सर्वाइवर को सड़कों पर बेखौफ घूमते दिखाना नहीं चाहिए. और इस नोट के साथ फिल्म का अंत नहीं करना चाहिए.
खैर, कहानी के इस उलझाव की बात छोड़ दें तो फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी एक्टिंग है. तापसी पन्नू ने अच्छा अभिनय किया है. रेप सर्वाइवर की भूमिका में मलयालय अभिनेत्री कनी कुस्रुति और उनके पति की भूमिका निभा रहे जीशान अयूब का भी अभिनय अच्छा है. उन दोनों के छोटे बच्चे का अभिनय भी ठीक है. कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा और जज की भूमिका में रेवती ने अच्छा काम किया है. टुकड़ों-टुकड़ों में फिल्म के कई दृश्य अच्छे हैं. फिल्म में संगीत का पक्ष महत्वपूर्ण नहीं है, वह सिर्फ कहानी को बढ़ाने के लिए है. कैमरे का काम अच्छा है.
आखिर में सिर्फ इतना कहा जा सकता है, अच्छे विषय, अच्छे कलाकार, अच्छी टीम के बावजूद यह फिल्म सिर्फ इसलिए बहुत प्रभावित नहीं करती, क्योंकि इसकी कहानी को लेकर अनुभव अति महत्वाकांक्षी हो गए. अगर उन्होंने एक सिंपल-सी कहानी उठाई होती, एक स्त्री, उसकी न्यूक्लियर फैमिली, उसके बृहत्तर परिवार, उसका पड़ोस, उसका शहर, उसके वकील, पुलिस और अदालत की कहानी, आरोपियों की अपनी कहानियां, तो शायद फिल्म उस मकसद को पूरा कर पाती, जो वे दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं.

