
क़रीब दो ढाई दशक पहले बनारस में एक अख़बार ने एक तस्वीर छापी. फ्रेम करवाकर रखी जाए ऐसी तस्वीर. खचाखच भरी हुई सब्ज़ी मंडी में 'बनारस का राष्ट्रीय पशु' सांड बौरा गया है. ज़मीन पर बिछी बोरियों पर रखी सब्ज़ियां कुचलते हुए सांड भाग रहा है, या शायद किसी सब्ज़ीवाले की लाठी से बच रहा है, या शायद किसी को कसने के लिए दौड़ा रहा है.
तस्वीर में फुंफकारते सांड के दो पांव हवा में हैं. अब उससे पांच सात कदम की दूरी पर पुलिस का एक दारोगा है, जो दुर्योगवश सांड के ठीक सामने है. अधेड़ दारोगा. आजकल जैसे बने-तने रीलबाज़ी के लिए सदैव तत्पर दारोगाओं की पौध से इतर. सिपाही भर्ती होकर रिटायर होने से दो एक साल पहले का प्रमोटी दारोगा. तस्वीर में इस पुलिसवाले ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर सांड पर तान रखी थी. एकदम किंकर्तव्यविमूढ़. कुछ लोग सांड को देख रहे हैं, कुछ हथियार ताने दारोगा को और कुछ ‘कह नहीं सकते’ मार्का स्टाइल में बचने का रास्ता देख रहे हैं.
अब सोचिए... बहुत जल्दबाज़ी मत कीजिए. यह रंगीन तस्वीर आपके दिमाग़ में बन गई? तो अब सोचिए. उस अधेड़ दारोगा ने सांड पर रिवॉल्वर क्यूं तानी? क्या सांड यह बात समझ सकता था कि अपने होल्स्टर से निकालकर इस आदमी ने जो ब्रिटिशकालीन पॉइंट थ्री एट वेब्ले रिवॉल्वर उस पर तान रखी है, उसके दो शॉट काफ़ी होंगे उसे कैलाश यात्रा पर भेजने के लिए. या कि, क्या उस दारोगा ने सचमुच गोली दाग देने के इरादे से ही हथियार निकाला था? भरे बाज़ार एक सांड पर गोली चलाकर अपनी रिटायरमेंट और पेंशन गंगा में बोरने को तैयार था दारोगा? शायद नहीं. इस अधेड़ आदमी के मन में भरोसे के नाम पर इतनी गहरे धंस चुकी थी उसकी सर्विस रिवॉल्वर कि शायद वह भी अपने हाथ में हथियार देखकर हमारे जितना ही हैरान होगा. होल्स्टर तक जाने का फैसला हाथ का था, दिमाग़ का नहीं.
जब समय आपके ख़िलाफ़ जाता है और सबसे निर्मम चेहरा पहन लेता है तब आप क्या करते हैं? क्या कर सकते हैं? सबसे घने अंधेरे के लिए आपने भरोसे के नाम पर क्या तैयार किया है? सुन्न सपाट अकेलेपन से किस दम पर आंख मिलाएंगे? इन्हीं सवालों की बुनियाद पर बनी फिल्म ‘सूबेदार’ अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम हो रही है. निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने अनिल कपूर, मोना सिंह, सौरभ शुक्ला और फ़ैसल मलिक सरीखे कलाकारों के साथ चंबल की ज़मीन साधने की कोशिश की है.

‘सूबेदार’ क्यों?
क्योंकि मोर्चा एक नहीं है. अपने आस-पास देखिए, ख़ुद को देखिए. एक साथ कितने मोर्चों पर तैनात हैं लोग. फौज से रिटायर होकर आया सूबेदार अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) ज्यादातर मोर्चों पर एब्सल्यूट फेल्योर सा दिखाई देता है. उन्नीस के पहाड़े सा अबूझ पिता, हमेशा देरी से पहुंचने वाला पति, रीढ़ सीधी रखकर दोस्ती के हरे पत्ते पर हर बार कत्था फेर देने वाला दोस्त, और जो हो रहा है उस तरफ से आंख मीचे दुनिया को ‘होना चाहिए’ के अतीव महंगे चश्मे से देखने की कोशिश करता नागरिक. इन्हीं मोर्चों की कहानी है सूबेदार. जीवन जब दसों दिशाओं से आपके लिए गणित का इम्तेहान बन जाता है तब आपका हाथ क्या फैसला करता है?
लोहे और बारूद का आदती हाथ क़ायदे से हथियार टटोलता दिखना चाहिए. लेकिन बैंक में पांचवीं बार वही फॉर्म भरवाता क्लर्क, ख़ानदानी होटल में मुफ्त रोटियां तोड़ता छौना माफ़िया, अपने बूते तनी बनी बिटिया पर तेज़ाब लेकर मंडराते गिद्ध, जहां-तहां पंजे मार कर बालू फांकता सिस्टम और एक अदद लाल चमकीली जिप्सी...सूबेदार किसी हथियार पर भरोसा नहीं करता, बल्कि भरोसा ही उसका सबसे मारक हथियार है. कमाल की बात ये है कि सिस्टम के ख़िलाफ़ बग़ावत की ज़मीन पर बुनी इस कहानी में नायक सूबेदार लड़ रहा है अव्यवस्था से. जैसे किसी जंगल से आया ताकतवर लेकिन सज्जन हाथी अचानक एक सर्कस में छोड़ दिया गया हो, जिसके अपने रिंगमास्टर और अपने जोकर हों.
नायक का वापस आना
रिटायर्ड फ़ौजी की खाल में अनिल कपूर जो घुसे हैं कि साथ में अपना पूरा दौर स्क्रीन पर लेकर लौटे हैं. तालियों और सीटियों का जबर दौर. स्क्रीन पर अपनी चुप्पी से भी अनिल मुनादी पीटते हैं और मन में बात उठती है ‘ये हीरोइज्म मिस किया’. ‘नायक’ का सेकेंड हाफ़ अगर अब भी गाहे बगाहे देखते हों तो सूबेदार में क़रीबन वही आनंद आएगा. नायक की इस वापसी में मोना सिंह ने बबली दीदी के किरदार में बारीक और असरदार काम किया है.

हाल ही में आई वेब सीरीज ‘कोहरा 2’ को मोना सिंह का बेस्ट काम माना जा रहा था लेकिन, बबली के किरदार से मोना ने साबित किया है कि अभी तो बस शुरुआत हुई है. माफ़िया बबली दीदी ने जिस सटल तरीके से नायक सूबेदार के लिए ज़मीन तैयार की है उससे अनिल कपूर और और निखर के सामने आते हैं. पंचायत फेम फैसल मलिक ने साबित किया है कि अगर कहानी जगह दे तो किरदार बदला जा सकता है. बबली दीदी और फैसल (सॉफ्टी भईया) के बीच जेल का एक सीन है, उसमें फैसल ने ताल ठोक कर बताया है कि उन्हें पंचायत से इतर भी देखा और बरता जाए. सौरभ शुक्ला ने सूबेदार के भरोसेमंद दोस्त प्रभाकर के किरदार को आदतन बहुत सहज होकर स्क्रीन पर जिया है.
इनके साथ आदित्य रावल (प्रिंस भईया) और राधिका मदान (श्यामा) ने इतनी सारी पावर पैक्ड परफॉर्मेंसेज़ के बीच भी जिस तरह अपने लिए पक्की जगह बनाई, कमाल की बात है.
छोटे स्ट्रोक्स, बड़ी तस्वीर
निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने चंबल की ज़मीन से बढ़िया काम निकाला है. बारीक चीज़ों का ध्यान रखा है. जैसे डायलेक्ट, जिस पर बहुत आसानी से समझौता किया जा सकता था, मास हिंदी ऑडियंस के नाम पर. हथियार को आख़िरी बार कब स्क्रीन पर ‘असला’ कहा गया. एक्शन के नाम पर जब आपके पास अनिल कपूर जैसा हरफनमौला हो तो स्क्रीन को बम गोलियों से धुंआ-धुंआ कर देने की प्रबल इच्छा पर सुरेश त्रिवेणी वही सादगी चुनते हैं जो बरसों पहले ‘शूल’ फिल्म में इंस्पेक्टर समर प्रताप सिंह ने दिखाई थी. कोई फैंसी एक्शन मूव्स नहीं, हाथ-पांव का सामान्य इस्तेमाल.

आम आरओ प्यूरीफायर में भी चंबल के पानी का पोटाश बचाए रखा गया है. इसका क्रेडिट फिल्म की राइटिंग और राइटर प्रज्वल चंद्रशेखर समेत सुरेश त्रिवेणी को भी जाता है. लेखकों ने कल्पना और स्मृति के विकल्प में से स्मृति पर टिक लगाया है. पार्किंग को लेकर शुरू हुआ झगड़े वाला सीन हो या रिटायर्ड फ़ौजी से खैनी बनवाने का सीन, ये सब किस्सागोई से उपजे हैं. घटे हुए लगते हैं. यही इनकी ताकत है. मशहूर पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने स्क्रीन राइटिंग में बतौर डायलॉग राइटर एंट्री ली है और उनके होने से फिल्म में चंबल-बुंदेलखंड का रस सुनाई देता है. ‘असला है, उधार नहीं कि लौटा दें...’ जैसे डायलॉग कहानी और किरदारों में ज्यादातर बार फबते हैं.
लेकिन दिक्कतें भी हैं
ठीकठाक संसाधनों के साथ बनाई गई ‘सूबेदार’ एकाध मोर्चों पर और बेहतर हो सकने की संभावनाओं से भरी दिखाई देती है. मसलन, जब-जब रिटायर्ड सूबेदार अर्जुन मौर्य के फ़ौजी दिनों को दिखाया गया है, तब-तब फिल्म अजीब तरह से ग्रिप लूज़ कर देती है. उन सीन्स का प्रोडक्शन कमज़ोर स्तर का दिखाई देता है. इसी तरह से यह बात भी समझ के बाहर लगती है कि ‘मेरा बालम थानेदार चलावे जिप्सी’ जैसा बिल्कुल ही अनफिट गाना क्योंकर फिल्म में रिक्रिएट किया गया? इस गाने और सूबेदार की लाल जिप्सी, दोनों का किरदार आपस में छत्तीस बैठता है. शायद इन बातों का ध्यान सूबेदार के अगले हिस्से में रखा जाए.
क्या यह वापसी का बयान है?
अनिल कपूर ने अपने दर्शकों की गर्दन पकड़कर आख़िरी बार सीटी कब बजवाई थी? शायद ही याद आए. मोना सिंह, फैसल मलिक, राधिका मदान...एक पूरी फेहरिस्त है जहां संभावनाओं की जगह आशंकाओं ने ले रखी थी. लेकिन ऐसा लगता है कि इन सबने एक साथ मिलकर अपनी वापसी का बयान दिया है. इन सभी की नियति फिल्म के अंतिम अध्याय से मेल खाती दिखाई पड़ती है जिसका नाम है ‘प्रारंभ’.

