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शेरों के बाद अब गुजरात बनेगा चीतों का नया आशियाना  

गुजरात के सौराष्ट्र में बन्नी घास के मैदान और इसके आसपास के गांव लगभग चार दशकों से चीतों का इंतजार कर रहे हैं. साल 1984 में केंद्र सरकार ने यहां पर कुछ चीतों को लाने का प्रस्ताव सामने रखा था

कुनो के बाद गुजरात बनेेगा चीतों का नया घर
अपडेटेड 14 दिसंबर , 2023

मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क के बाद अब गुजरात चीतों का नया घर बनने जा रहा है. राज्य का गिर नेशनल पार्क पहले से ही शेरों के घर के तौर पर जाना जाता है. राष्ट्रीय CAMPA (क्षतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण) ने कच्छ के दक्षिणी छोर पर स्थित संरक्षित वन, बन्नी ग्रासलैंड्स रिजर्व में चीता संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित करने की राज्य सरकार की योजना को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस परियोजना की निगरानी करेगा. 

गुजरात के इस प्रजनन केंद्र को एक साल के भीतर ही शुरू भी कर दिया जाएगा. जल्द ही केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण लाए जाने वाले चीतों की संख्या तय की जाएगी. बन्नी घास के मैदान और इसके आसपास के गांव लगभग चार दशकों से चीतों का इंतजार कर रहे हैं. साल 1984 में केंद्र सरकार ने यहां पर कुछ चीतों क लाने का प्रस्ताव सामने रखा था. गुजरात वन विभाग के एक सर्वेक्षण में बन्नी के इलाके को चीतों के लिए अनुकूल पाया. यहां के स्थानीय लोगों ने भी इस प्रस्ताव का स्वागत किया था.

उस समय, कच्छ के ग्रेट रण में खादिर बेयट के लगभग 10,000 निवासी स्थानांतरित होने के लिए तैयार थे. हालांकि राज्य सरकार की मंजूरी के बाद भी यह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ सका. इसके तुरंत बाद तेजी से बढ़ने वाले खरपतवार प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा ने शुष्क रेगिस्तान में घास के मैदानों के कम से कम एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया. इसकी वजह से पोषक तत्वों से भरपूर यहां की घास और दूसरे पेड-पौधे खत्म हो गए और क्षेत्र की जैव विविधता और जीव जंतु भी नष्ट हो गए. काफी ज्यादा चराई, मिट्टी में बढ़ता खारापन, बार-बार सूखा और प्राकृतिक जल स्रोतों का सूखना ये सभी बन्नी के घास के मैदान को खत्म करने वाली बड़ी वजहें थीं. इस क्षेत्र में नदियों पर बने बांधों की वजह से प्राकृतिक जल स्रोत सूख गए. 

साल 2015 में वन विभाग ने मिट्टी में खारेपन को कंट्रोल में रखने के लिए जूलीफ्लोरा लगाने के अपने पांच दशक पुराने फैसले को पलट दिया और तब से इस इलाके में लगभग 20,000 हेक्टेयर पर घास के मैदान सफलता के तैयार किए गए हैं. अब वन विभाग का लक्ष्य अगले पांच सालों में दूसरी 55,000 हेक्टेयर की जमीन को भी तैयार करना है. घास के मैदानों की भी कटाई की जाती है और लगभग 48 गांवों में पशुओं के चारे के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है. 

पुराने दिनों में बन्नी के घास के मैदानों में लगभग 40 अलग-अलग प्रजातियों के जानवर निवास करते थे. लगभग आठ दशक पहले तक यह चिंकारा नीलगाय, लकड़बग्घा, जंगली सूअर, भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी लोमड़ी, कैराकल, रेगिस्तानी बिल्ली और यहां तक कि चीतों का घर भी हुआ करता था. यहीं पर, लगभग 2,500 वर्ग किमी के विस्तार में, मध्य प्रदेश के कूनो से कहीं और चीते लाकर बसाए जा सकते हैं. सितंबर 2022 में 20 अफ्रीकी चीतों को कुनो नेशनल पार्क लाया गया था. अब तक इस प्रोजेक्ट को मिश्रित सफलता मिल पाई है. भारतीय चीते लगभग 70 साल पहले ही काफी ज्यादा शिकार की वजह से विलुप्त हो चुके हैं. 

बन्नी के प्रजनन केंद्र में नियंत्रित वातावरण में कुछ चीतों को रखा जाएगा. लेकिन जानवरों को जंगल में देखे जाने में कम से कम पांच साल लगेंगे, जिससे क्षेत्र में पर्यटन बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए समय मिल सकेगा. साल 2009 में वन्यजीव संस्थान ने भारत में चीतों को बसाने के लिए 14 संभावित स्थानों में से एक के तौर पर बन्नी की पहचान की थी. इनमें कुनो के साथ ही साथ राजस्थान में ताल छप्पर में डेजर्ट नेशनल पार्क का नाम भी शामिल था. सौराष्ट्र इलाके में एशियाई शेरों की अबादी 1990 तक घट कर 284 पहुंच गई थी. इसके बाद काफी कोशिशों के चलते यह 2020 में बढ़ कर 674 पर पहुंच सकी. इसी हवाले से वन विभाग का मानना है कि सौराष्ट्र का इलाका चीतों के व्यवहार पैटर्न और स्वास्थ्य आवश्यकताओं को समझने और इस जंगली बिल्ली की लुप्त हुई आबादी को बहाल करने के लिए राज्य में सबसे अच्छी स्थिति में है.  


 

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