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भारतीय राजनीति में कब से शुरू हुई विधायकों को 'रिजॉर्ट' ले जाने की परंपरा?

भारत में राजनीतिक दलों का अपने चुने गए प्रतिनिधियों को दल-बदल से बचाने के लिए रिजॉर्ट में रखना अब एक आम चलन बन गया है

1982 - (हरियाणा) निर्दलीय विधायक लाल सिंह का मनोरंजन करते लोक दल के विधायक और होटल के बाहर पहरा देते बंदूकधारी गार्ड्स/इंडिया टुडे मैगजीन
1982 - (हरियाणा) निर्दलीय विधायक लाल सिंह का मनोरंजन करते लोक दल के विधायक और होटल के बाहर पहरा देते बंदूकधारी गार्ड्स/इंडिया टुडे मैगजीन
अपडेटेड 7 फ़रवरी , 2024

हर चुनाव के बाद जो एक मीम सोशल मीडिया पर चलता ही चलता है वो है 'रिज़ॉर्ट बुक हो गए हैं.' इस 'रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स' में कानून बनाने वालों को कड़ी निगरानी में भारी सुरक्षा वाले रिज़ॉर्ट तक सीमित कर दिया जाता है. चुनाव परिणामों से पहले और आजकल तो बीच सरकार में ही नेताओं की अल्टा-पलटी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक मजाक बन गई है.

लेकिन इस मजाक की शुरुआत कहां से हुई, अगर इस बात का पता लगाना है तो हमें समय के पहिए को उल्टा घुमाकर 1982 में जाना होगा. 'रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स' का सबसे पहला उदाहरण 1982 में हरियाणा में देखने को मिला जब विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्यपाल जीडी तापसे ने भजन लाल के नेतृत्व वाले आईएनएलडी-भाजपा गठबंधन को दरकिनार करते हुए कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया.

दरअसल 1982 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में देवीलाल के नेतृत्व वाली इंडियन नेशनल लोक दल (आईएनएलडी) ने कांग्रेस को चुनौती दी और एक बड़ी ताकत बनकर उभरी.

आईएनएलडी और भाजपा के गठबंधन ने 37 सीटों पर कब्ज़ा जमाया तो वहीं कांग्रेस ने कुल 90 में से 36 सीटें हासिल कीं. किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. होना तो यह था कि सबसे ज्यादा सीटें जीतने की वजह से आईएनएलडी-भाजपा गठबंधन को सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए था.

इंडिया टुडे मैगजीन के 15 जून, 1982 अंक का कवर
इंडिया टुडे मैगजीन के 15 जून, 1982 अंक का कवर

जाहिर है देवी लाल और बाकी नेताओं ने राज्यपाल की इस करतूत पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की. 15 जून, 1982 की इंडिया टुडे मैगजीन में रिपोर्टर चैतन्य कालबाग ने इस घटनाक्रम पर एक विस्तृत रिपोर्ट की थी. चैतन्य लिखते हैं, "हरियाणा के राज्यपाल जीडी तापसे के अलोकतांत्रिक कदम के 18 घंटे बाद जब वो चंडीगढ़ के राजभवन के एक सोफे पर बैठे थे तो लोक दल के विधायकों ने उनसे चिल्लाकर कहा - ये हरियाणा है. अब यहां गोलियां चलेंगी, खून बहेगा! देवी लाल ने झल्लाकर राज्यपाल से कहा - इंदिरा गांधी के गुलाम, तुझे क्या लगता है, जो तूने किया, उससे तू बचकर निकल जाएगा?"

हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तापसे और चौधरी देवी लाल/तस्वीर - इंडिया टुडे मैगजीन
हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तापसे और चौधरी देवी लाल/तस्वीर - इंडिया टुडे मैगजीन

इस बहस के बाद राज्यपाल ने देवी लाल को 24 मई तक की मोहलत दी और विधायकों को राजभवन में पेश कर बहुमत सिद्ध करने को कहा. राज्यपाल जीडी तापसे के इतना कहने भर की देर थी कि कुछ ही घंटों के भीतर कुल 48 विधायकों को हिमाचल के सोलन में परवाणू के होटल शिवालिक में बंद कर दिया गया. इसमें आईएनएलडी-भाजपा गठबंधन के विधायकों के अलावा इंडिपेंडेंट एमएलए भी शामिल थे. चैतन्य कालबाग की रिपोर्ट के मुताबिक, विधायकों को बाड़े में कसने की कमान थामी थी चौधरी देवी लाल के बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने और उनका साथ दे रहे थे अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल.

निहंग सिखों के एक जत्थे के साथ प्रकाश सिंह बादल के भेजे गए गार्ड्स बंदूक और तलवारें लेकर होटल के बाहर पहरा दे रहे थे. कैद विधायकों में एक इंडिपेंडेंट एमएलए थे लछमन सिंह जो इस अभेद्य किले को भेदने में सफल हो गए और पाइप के सहारे होटल से भाग निकले. चैतन्य कालबाग ने अपनी रिपोर्ट में लछमन सिंह को 'इंडिपेंडेंट-इन-चीफ' कहा है, मतलब वो निर्दलीय विधायकों के मुखिया थे. उन्होंने निकलते ही भजन लाल से जाकर हाथ मिला लिया और कांग्रेस की सरकार हरियाणा में बरकरार रही.

1982 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कांग्रेस नेता भजन लाल/तस्वीर - इंडिया टुडे मैगजीन
1982 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कांग्रेस नेता भजन लाल/तस्वीर - इंडिया टुडे मैगजीन

बस यहीं से गाड़ी खुली और विधायकों को रिजॉर्ट में ले जाने वाली राजनीति आज तक हमारे यहां 'रेलेवेंट' ही है. अगले ही साल लोगों ने कर्नाटक में फिर से रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की झलक देखी. 1983 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने इंदिरा गांधी को विधानसभा भंग करने से रोकने के लिए जनता पार्टी के लगभग 80 विधायकों को बेंगलुरु के बाहर एक लक्जरी रिजॉर्ट में भेजा दिया था. रामकृष्ण हेगड़े राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे.

इसके बाद 1995 में जब भाजपा ने केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री नियुक्त किया तो शंकर सिंह वाघेला ने विद्रोह का दिया था. वाघेला आत्माराम पटेल के साथ मिलकर 40 से ज्यादा विधायकों को लेकर मध्य प्रदेश के एक रिजॉर्ट में पहुंच गए थे.

अभी हाल की बात करें तो हेमंत सोरेन के इस्तीफ़ा देने के बाद कांग्रेस ने अपने झारखंड के विधायकों को हैदराबाद के एक रिजॉर्ट में भेज दिया था ताकि चंपई सोरेन के शपथ ग्रहण में कोई रोड़ा ना आए. इसके बाद बिहार में जब नीतीश कुमार ने फिर से पलटी मारी तो 19 कांग्रेस विधायकों में से 16 को पटना में 12 फरवरी को होने वाले विश्वास मत से पहले हैदराबाद ले जाया गया. बिहार में कांग्रेस अब विपक्ष में आ गई है और उसे डर है कि पार्टी  से विधायकों को तोड़ने के प्रयास ना होने लगें. बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने भी पुष्टि की है कि 16 विधायकों को राज्य से बाहर भेज दिया गया है, बाकियों के जल्दी ही शामिल होने की उम्मीद है.

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