सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने के साथ ही गांधी लोगों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा करते थे. यह शांति के दूत के लिए असामान्य लग सकता है. लेकिन महात्मा के प्रति तीव्र भावनाएं तब समझ में आने लगती हैं, जब हम यह जान लेते हैं कि वे नितांत मौलिक थे, बिल्कुल इसके बुनियादी अर्थ में.
गांधी को विदा हुए सात दशक हो गए हैं, लेकिन हमारे मुश्किल वक्त में अब भी उनकी बातें समाधान की तरह हैं, क्योंकि उनके विचार युगांतरकारी हैं. अपने जीवनकाल में उन्होंने जो कुछ हासिल किया है, उस पर दोबारा गौर करके हम गांधी की प्रासंगिकता को समझ सकते हैं. ऐसा नजरिया आज के युग में भी उनके महत्व को स्पष्ट कर देगा.
गांधी 1915 में शांतचित्त, लेकिन फौलादी संकल्प और बड़ी महत्वाकांक्षा से लैस होकर भारत लौटे थे. उनके लिए उस दौर की सबसे बड़ी ताकत-ब्रिटिश साम्राज्यवाद के चंगुल से ही भारत को निकालना ही पर्याप्त नहीं था. गांधी ने इसे उस दौर की राजनीति के तौर-तरीकों और सामाजिक संरचना में बदलाव लाकर हासिल करना चाहा. तो, क्या गांधी उन सबमें सफल हुए, जो लक्ष्य उन्होंने निर्धारित किए थे, लेकिन हकीकत यह है कि यह सब उनकी महत्वाकांक्षाओं एक छोटा हिस्सा भर था.
यह सर्वविदित है कि कई अभियानों और भाषणों, लेखन और अपने आश्रमवासी जीवन के जरिए गांधी ने अहिंसा को एक नए लोकाचार के रूप में स्थापित किया. भारत में सत्याग्रह की सफलता ने दुनिया भर में उसे असहमति व्यक्त करने और विवाद-समाधान के नैतिक और व्यावहारिक औजार के रूप में स्थापित किया. लेकिन इसकी हमें पहले से जानकारी की वजह से गांधी के क्रांतिकारी विचार ढंक नहीं जाते.
राजनीति के लिए गांधी का दृष्टिकोण नैतिक, लोकतांत्रिक और असामान्य था. हिंसा के लिए अस्वीकृति ने आम लोगों को जिस असंभव तरीके से सार्वजनिक दायरे में हिस्सेदारी के लिए सक्षम बनाया, वह सशस्त्र तरीके से संभव नहीं होता. जवाहरलाल नेहरू अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में गांधी की वजह से भारत में आए बदलाव की चर्चा करते हैं. ऐसे समय में जब ब्रिटिश शासन ''घबराहट, दमन, भय का गला घोंटू माहौल बना रहा था... गांधी की धीर-गंभीर आवाज उठी: डरो मत.''
गांधी ने लोगों को बिना किसी डर के अपने विवेक से काम करने को प्रेरित किया, लेकिन यह सक्रियता महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ आई. गांधी की दृष्टि में साधन भी उतना ही जरूरी था, जितना साध्य, भले ही साध्य कितना ही महान या जायज क्यों न लगता हो. इसलिए इसमें बिना अपने मूल सिद्धांतों से डिगे समझौते के लिए तैयार रहना होता था. इसमें व्यक्तिगत शुचिता और ईमानदार आत्मावलोकन की भी जरूरत है, जिससे जीवन खुली किताब बन जाता है. वास्तव में, हम गांधी की कई असफलताओं के बारे में इसलिए जानते हैं क्योंकि उन्होंने हमें उनके बारे में बिना किसी लाग-लपेट के, ईमानदारी से बताया है.
अहिंसा को स्थापित करके विशाल जनांदोलन खड़ा करने के अलावा, गांधी बेहद बारीक समझ वाले संस्था-निर्माता भी थे. भारतीय कुलीन वर्ग के नवजात शिशु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को गांधी ने विशाल जनसंगठन में बदल करके बेमिसाल राजनैतिक ताकत में तब्दील कर दिया. उन्होंने 1920 के दशक में चार आना सदस्यता की जो शुरुआत की थी, तीन दशक बाद भारत के संविधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाने के पीछे उसी दृष्टिकोण की छाप देख सकते हैं.
हम यहां यह भी नोट कर सकते हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी-नागरी और उर्दू में लिखी गई- की एक सामान्य भाषा के रूप में वकालत की थी, तो भाषा की किसी की संस्कृति और पहचान के महत्व को भी स्वीकार किया था. उन्होंने उन औपनिवेशिक प्रांतीय सीमाओं को अस्वीकार किया जो प्रशासनिक सुविधा के हिसाब से तैयार की गई थी और जो भारत पर उनके विजय के इतिहास को दर्शाती थी. गांधी ने कांग्रेस को भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया. स्वतंत्रता के बाद से, इस सिद्धांत ने एक जटिल राष्ट्र में एकता की शक्ति के रूप में कार्य किया है.
लोकतंत्र में प्रतिनिधि संस्थाओं की अहम भूमिका है, लेकिन गांधी को न्याय और समानता की व्यवस्था कायम करने में इन संस्थाओं की क्षमता पर गहरा संदेह था. आज, लोकतंत्र की इन प्रतिनिधि संस्थाओं के वजूद पर खतरनाक विश्वव्यापी संकट तारी है. भले चुनाव-प्रक्रिया सुचारु रूप से कार्य करती है, लेकिन कानून और शासन में जनहित मुश्किल से दिखता है. साधारण लोग तेजी से राजनैतिक प्रक्रिया से निराश होने लगे हैं जो ताकतवर बड़े कारोबारियों और कॉर्पोरेट समूहों की इच्छापूर्ति करने में जुटा होता है. कई देशों में राज्य अपनी गिरफ्त बढ़ाने की कोशिश में दिखता है, तो अल्पसंख्यकों या गरीबों की तरफ से उठाई गई कई वैध मांगों पर राज्यों के रुख में सख्ती नजर आती है.
दुनिया भर में इन दिनों विकृत राजनीति के साथ मीडिया और पत्रकारिता की गहरी सांठगांठ एक नया संकट पैदा कर रही है, जिसकी आजकल भारत में सबसे बुरी तस्वीर दिख रही है. अपने लंबे और बेहद व्यस्त सार्वजनिक जीवन में गांधी एक पत्रकार और संपादक की भी भूमिका में थे, अलबत्ता कुछ अलग ढंग के. उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं को चलाया- बिना विज्ञापनों के- और उन्हें अपने विचारों को बड़े पैमाने पर जनता तक पहुंचाने का माध्यम बनाया. उन्होंने पत्रकारिता को हमेशा जिम्मेदारीपूर्वक निर्वाह करने का कार्य माना, फिर भी वे स्वयं फर्जी खबरों के लगातार शिकार रहे थे.
1946 में, एक नाजुक राजनैतिक वार्ता के दौरान प्रेस में आई एक शरारतपूर्ण खबर के जवाब में, गांधी जी ने उत्तेजक टिप्पणी की—''अखबार वाले चलते-फिरते प्लेग बन गए हैं.'' एक अन्य मौके पर, उन्होंने टिप्पणी की थी कि ''अगर मुझे वायसराय की जगह एक दिन के लिए तानाशाह नियुक्त कर दिया गया, तो मैं सभी अखबारों को बंद कर दूंगा.'' हालांकि उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि वे अपनी पत्रिका हरिजन को अपवाद रूप में बंद नहीं करेंगे.
गांधी ने बड़े राजनैतिक अभियान खड़े किए मगर उनका फोकस हमेशा व्यक्तियों के आचरण में परिवर्तन था. अपने सहयोगियों के विपरीत, वे सरकार को ताकतवर बनाने के खिलाफ थे. उनके मुताबिक, गैर-बराबरी व्यक्ति के कल्याण और स्वतंत्रता को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है. गांधी की नजर में लोगों को उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए ज्यादा अधिकार दिए जाने चाहिए. उनका तर्क था, ''सही मायने में स्वराज कुछ लोगों का सभी शक्तियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेने से नहीं बल्कि अपने अधिकारों के हनन की स्थिति में सभी को सत्ता के विरोध में खड़े होने से सच्चा स्वराज स्थापित होगा.''
आर्थिक दृष्टि से, व्यक्ति के प्रति गांधी की प्रतिबद्धता ने उन्हें खादी और ग्रामोद्योग जैसे रचनात्मक कार्यों की वकालत करने के लिए प्रेरित किया, जो बिना किसी संपत्ति, कौशल या शिक्षा के लाखों व्यक्तियों को फलदायी रोजगार प्रदान करने का साधन था. उनके लिए, आर्थिक न्याय का सवाल कृषि प्रधान भारत की नियति से जुड़ा था, क्योंकि उनके समय में, अधिकांश भारतीय गांवों में रहते थे और गांव में ही अपनी आजीविका कमाते थे. उनका कहना था ''बुद्धि कौशल और श्रम को अलग करने से गांवों की अनदेखी का अपराध हुआ है. और इसलिए, देश के गांवों में सौंदर्य की बजाए हमें बस गोबर के ढेर नजर आते हैं.'' काफी हद तक, यह सब आज भी सच है.
गांधी के जीवन का एक और बुनियादी पहलू था धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता. हालांकि वे सनातनी हिंदू थे, लेकिन उनका मानना था कि सभी को बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन करने में सक्षम होना चाहिए. गांधी का इसके पक्ष में यह तर्क भी था कि भारत अल्पसंख्यकों के साथ न्याय करने में विफल रहता है तो इससे जिन्ना के सिद्धांत की पुष्टि होगी कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय एक साथ नहीं रह सकते. अपने अंतिम वर्षों में सांप्रदायिकता के खिलाफ गांधी के साहसपूर्ण संघर्ष बाद के वर्षों में भारत के लिए शांति और स्थिरता का एक महत्वपूर्ण मार्ग हासिल करने के लिए अहम थे.
अहिंसा के पैरोकार गांधी ने हर जाति, वर्ग और धर्म के लोगों में हिंसक प्रवृत्ति को पहचाना. इसलिए उन्होंने एक नए, समावेशी राष्ट्रवाद को जन्म दिया. भाषा, संस्कृति, धर्म, शिक्षा और आर्थिक न्याय के सवालों पर, उन्होंने भारत को आधुनिकता का एक ऐसा गैर-आभिजात्य मार्ग दिखाया जिसमें यूरोप की नकल नहीं थी, बल्कि उसमें भारत की विविधता और जरूरतों को ध्यान में रखा गया था. बेशक, गांधी विभाजन को रोकने या जातिगत आधार पर बंटे भारत को पूरी तरह से अपने पूर्वाग्रहों से बचाने में विफल रहे. लेकिन, अगर वे नहीं होते तो लोकतंत्र की ओर भारत का प्रस्थान कहीं अधिक बुरा हो सकता था.
भारत ने स्वतंत्रता के बाद बहुत कुछ हासिल किया है. फिर भी, पाठक यह महसूस करेंगे कि ऊपर कही गई हर बात उन्हीं मूलभूत चुनौतियों की ओर इशारा करती है जिनका हम सामना कर रहे हैं. खासकर, आज की सत्ता उन मूल्यों को व्यापक रूप से नजरअंदाज करती है जिसकी नींव गांधी ने रखी और उसे आगे बढ़ाया. हम अपने खड़े किए संकट से दूसरे संकट के बीच झूलते रहते हैं—जैसे नोटबंदी, असम में एनआरसी, कश्मीर, मुस्लिमों के खिलाफ भीड़ की हिंसा-हताशा और डर का माहौल से देश विचलित है. भारतीय गणराज्य अस्तित्वगत संकट के कगार पर खड़ा है. इन असामान्य रूप से बुरे दौर में, प्रेम और न्याय के अपने संदेशों के माध्यम से, गांधी आगे की कठिन लेकिन सही दिशा दिखाते हैं.
गांधी के जिस हत्यारे का मौजूदा सत्ताधारियों में कई गुणगान करते हैं, उसने सोचा था कि वह महात्मा को तीन गोलियों से चुप करा सकता है. वह गांधी के शरीर को मिटाने में सफल रहा. लेकिन भारत और दुनियाभर में ऐसे बहुत से लोग हैं जो गांधी के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये विचार और मूल्य अकेले गांधी के नहीं रहे, बल्कि उन सभी के हैं जो अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय दुनिया चाहते हैं. मायूसी और नैराश्य के इस दौर में, हमें खुद को गांधी की उस उद्घोषणा को याद करना चाहिए: ''मृत्यु के मध्य, जीवन कायम रहता है; असत्य के बीच सत्य का अस्तित्व बना रहता है; अंधेरे के बीच, प्रकाश बना रहता है.''
(वेणु माधव गोविंदु IISc, बेंगलूरू के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

