एमपी गजब है, ऐसा कांटे का मुकाबला नहीं देखा
मध्यप्रदेश की जनता ने बदलाव के लिए वोट किया, ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में शीला दीक्षित को अच्छा काम करने के बावजूद जनता ने सत्ता से बाहर कर दिया. नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे भी भाजपा के खिलाफ गए.

मध्य प्रदेश में भी राजस्थान और छत्तीसगढ़ की तरह विधानसभा चुनाव परिणाम 2018 की लगभग स्थिर हो चुकी तस्वीर में सत्ता विरोधी रुझान की झलक दिखाई देती है. राज्य के 230 सदस्यों के सदन के लिए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का सौ-सौ से ज्यादा सीटों पर आगे चलने के पीछे कांग्रेसियों की एकजुटता और भाजपाइयों के डैमेज कंट्रोल को वजह माना जा सकता है. चुनाव प्रचार के घमासान से लेकर मतगणना के राउंड तक कांटे का मुकाबला दोनों पार्टियों के बीच दिखा तो इसका सारा श्रेय उन नेताओं को है जिन्होंने वाकई मतभेद भुलाकर कांग्रेस के लिए काम किया.
शिवराज सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर करीब दो सालों से ज्यादा महसूस की जा रही थी. हालांकि इसकी शुरुआत व्यापम घोटाले के सामने आने के बाद से ही हो गई थी. इसके बाद किसानों की समस्याएं और बढ़ती बेरोजगारी ने भी असंतोष गहरा दिया.
एससी-एसटी एक्ट का मुद्दा भी सामने आया तो उनकी तरफदारी का बयान देने पर शिवराज को "माई के लालों" के गुस्से का सामना करना पड़ा लेकिन इसका चुनाव परिणामों पर कोई असर दिखा नहीं क्योंकि सपाक्स को मिले वोटों की संख्या नगण्य कही जा सकती है.
मध्यप्रदेश की जनता ने बदलाव के लिए वोट किया, ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में शीला दीक्षित को अच्छा काम करने के बावजूद जनता ने सत्ता से बाहर कर दिया. नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे भी भाजपा के खिलाफ गए.
नोटबंदी के पक्ष में भाजपा आज तक ठोस दलील पेश नहीं कर पाई और जीएसटी की विसंगतियां इसके लागू होने के साल भर बाद भी दूर नहीं हो सकीं. जीएसटी ने कारोबारियों की मुश्किल बढ़ाई तो उपज के पर्याप्त रेट न मिलने और कर्ज में दबे किसान को कांग्रेस ने कर्जमाफी का वादा कर हवा को अपने पक्ष में बनाया.
अंत तक भाजपा ने किसान कर्जमाफी की घोषणा नहीं की जबकि वह ऐसा कर नुक्सान को कम कर सकती थी. इसके विपरीत कांग्रेस ने लगातार मोदी और शिवराज पर तीखे हमले जारी रखे.
किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लगातार भाजपा को घेरकर बेचैन रखा और बाकी का काम बदलाव का मूड बनाकर बैठे मतदाता ने कर दिया. बेरोजगारी का सच ये है कि प्रदेश में शैक्षिक संस्थाओं की तो बाढ़ आ गई लेकिन नौकरियां उनके मुताबिक प्रदेश में नहीं आईं.
तारीफ शिवराज की भी करनी पड़ेगी जिन्होंने कांग्रेस को एकतरफा जीत का मौका नहीं दिया और मुकाबले को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया. फिलहाल इस मुकाबले का अंत अभी देखना बाकी है.
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