स्मृतिशेषः गीतकार योगेश के लिए सलिल दा की धुनें जलेबी-सी होती थीं

गीतकार योगेश नहीं रहे. 2017 की इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी में उनका एक साक्षात्कार हमने प्रकाशित किया था. पेश हैं उसके कुछ अंशः

साहित्य वार्षिकी में गीतकार योगेश
साहित्य वार्षिकी में गीतकार योगेश

जब मैं संघर्ष कर रहा था तब सलिल दा, मदनमोहन, नौशाद, ओपी नैयर साहब अपने पीक पीरियड में थे. लेकिन जब गीतकार के तौर पर मुझे काम मिलने लगा तब इनके पास काम कम हो गया था. नई पीढ़ी के लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन यानी पंचम दा आ गए थे. लक्ष्मीकांत जी मुझे बहुत प्यार करते थे. उन्होंने दुनिया नाचेगी फिल्म में एक गाना दिया था. पंचम दा के साथ मैंने लगभग 14 फिल्मों में काम किया.

मदनमोहन जी के साथ एक गाना किया जो रिलीज नहीं हो सका. बीआर चोपड़ा ने जब मुझसे पूछा कि लता दीदी ने पाकिस्तान में कोई गाना गाया है? मैंने उनसे कहा कि मुझे तो वह याद नहीं है, आप वह गाना बताइए. वे बोले कि वह गाना है जाइए हमसे खफा हो जाइए...तब मैंने उनसे कहा कि यह तो मेरा लिखा हुआ है.

मेरे लिए यह सौभाग्य की बात थी कि वह गाना पॉपुलर हो गया था.

चोपड़ा साहब की फिल्मों छोटी-सी बात और अग्निपरीक्षा के लिए मैंने गाने लिखे थे. मैंने वसंत देसाई के साथ भी काम किया था. उनके कहने पर मैंने एक बैले (गीतिनाट्य) लिखा था. यह वसंत बापट की एक पोएट्री का हिंदी अनुवाद था. इसका प्रदर्शन प्रभादेवी स्थित रंग शारदा में हुआ था और उसे देखने के लिए शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब आए थे.

वसंत देसाई की मराठी फिल्म छत्रपति शिवाजी के लिए मैंने दो हिंदी गाने लिखे थे. इसमें से एक क़व्वाली थी, जिसका फिल्मांकन मुगल कैंप में हुआ था. दूसरा मुजरा था--

जो चाकुओं से, जो ख़ंजरों से,

न मरे किसी ज़हर से,

वो नाज़वाले, वो हुस्नवाले,

मरे मेरी नज़र से

उन दिनों म्युजिक डायरेक्टर कोई बहुत दोस्ताना रवैए वाले नहीं होते थे. गाने लिखने के लिए मेहनत करनी होती थी. सिचुएशन से गाने को उतारना पड़ता था. ऐसा ही वाकया था, पंचम दा ने मुझसे फिल्म हमारे तुम्हारे (राखी और संजीव कुमार) में गाने लिखवाए थे. इसके बाद उन्होंने रूस के सहयोग से बनी फिल्म अली बाबा चालीस चोर मुझे नहीं दी. चूंकि पंचम दा से आनंद बख्शी नाराज़ थे और उन्हें खुश करने के लिए वह फिल्म बख्शी साहब को दी गई थी. मैं बख्शी साहब की तरह नाराजगी जाहिर नहीं कर पाता था.

लक्ष्मीकांत जी मुझसे हमेशा कहते थे कि बख्शी कुछ भी लिख देते हैं, पर इसके बावजूद उन्होंने मुझसे खूब गाने लिखवाए. बख्शी के बारे में ऐसा बोलकर वे शायद मुझे लटकाए रखते थे.

सलिल दा (चौधरी) का हर गाना बंगाली होता था, क्योंकि वह खुद एक कवि थे. मुझे नहीं मालूम कि इसमें क्या था पर याद है कि एक गाना था, अन्नदाता फिल्म का गाना ओ मेरी प्राणसजनी चंपावती... इसमें चंपावती शब्द पर दादा ने बोला था लिखने के लिए और मैंने लिखा था. मुझे कभी इस बारे में पूछने की या जानने की हिम्मत नहीं हुई. हेमंत कुमार का गाया एक बांग्ला हिट गाना था, जिसकी ट्यून पर मुझे लिखने के लिए कहा गया था और मैंने लिखा था--कहीं दूर जब दिन ढल जाए.

इस गाने को मुकेश ने गाया था. सलिल दा अपने हिट बांग्ला गानो ंका इस्तेमाल हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगू और मलयालम में भी किया करते थे. जहां तक मुझे पता है, मेरे आने से पहले के गीतकारों को लिखने की छूट थी. गीतकार गाना लिखते थे और प्रोड्यूसर उस गाने को लेकर म्युजिक डायरेक्टरों के चक्कर काटते थे. बाद में यह परंपरा बदली और ट्यून पर गाने लिखे जाने लगे.

अलबत्ता, सलिल दा से गीतकार घबराते थे कि धुने जलेबी जैसी हैं, लिखेंगे कैसे.

सलिल दा के लिए मैंने देशभक्ति के छह गाने भी लिखे थे. इसके अलावा मैंने खुद एक क्लासिकल गाना लिखा था- नी सा गा मा पा नी सा रे गा, आ आ रे मितवा...

यह बासु भट्टाचार्य की आनंद महल फिल्म के लिए था, जिसका म्युजिक सलिल दा ने तैयार किया था. येसुदास का यह पहला गाना था. विजय अरोड़ा और सारिका अभिनीत इस फिल्म को बासु दा ने डिब्बे में बंद कर दिया था. उन्हें पूरी फिल्म बनने के बाद पसंद नहीं आई थी. लेकिन मेरे लिए खुशी की बात यह थी कि म्युजिक कंपनी ने गानों का रिकॉर्ड जारी कर दिया था.

(इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी के 2017 अंक में गीतकार योगेश का यह साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था. जो उनकी नवीन कुमार के साथ बातचीत पर आधारित थी.)

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