रमज़ान 2020 पर लॉकडाउन का असर

इस बार रमज़ान में इस महीने की सारी जरूरी चीजें हो रही हैं, सिवाए सामूहिक रूप से मस्जिद में तरावीह और नमाज के. हां, सड़कों और बाजारों से रौनक और चहल-पहल जरूर गायब हैं.

दिल्ली के जौहरी फार्म की मस्जिद में महिलाओं की नमाज के लिए तय रास्ते पर भी ताला/ फोटोः मनाल अंजुम
दिल्ली के जौहरी फार्म की मस्जिद में महिलाओं की नमाज के लिए तय रास्ते पर भी ताला/ फोटोः मनाल अंजुम

भैया इस बार आप कुछ इमदाद भेजें, हम लोग अपने इलाके में गरीब लोगों के लिए राशन किट तैयार कर रहे हैं. सब गरीबों में बांटना है.'' बिहार में पूर्वी चंपारण के बड़हरवा लखन सेन गांव में रहने वाले तारिक़ ज़फ़र ने दिल्ली में रहने वाले अपने कज़िन को व्हाट्सऐप मैसेज किया है. यह वही गांव है, जहां करीब सौ साल पहले महात्मा गांधी गए थे और उनका कायम किया हुआ स्कूल अभी तक चल रहा है, भले ही उसकी दशा जर्जर हो चुकी है. आजादी के बाद वहां के हालात बिल्कुल बदल गए, अपेक्षाकृत संपन्नता आ गई. रमज़ान के महीने में तारिक़ और उनका परिवार हमेशा से लोगों की खास मदद कर रहे हैं, लेकिन इस साल हालात बिल्कुल अलग हैं. कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से काफी लोगों के पास कोई काम-धंधा नहीं है और उनके सामने खाने-पीने की समस्या खड़ी हो गई है. लिहाजा, इस साल उन्होंने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्टर क़ासिम अंसारी के साथ यह काम ढाका में सबडिविजन स्तर पर शुरू कर दिया है. वे और उनकी टीम अपने परिचितों से लोगों की मदद की अपील कर रहे हैं.

ऐसा केवल वहीं नहीं हो रहा है. देश के विभिन्न इलाकों में बड़े-बुजुर्गों की निगरानी में युवा वर्ग गरीबों को इमदाद पहुंचाने में लगे हैं. दिल्ली में ओखला के एक दुकानदार बताते हैं, ‘‘अलग-अलग लोग आते हैं और बता देते हैं कि कितनी बोरियां तैयार करनी हैं. कोई 20 तो कोई 50 बोरियां तैयार करा रहा है. कुछ लोग पांच बोरी भी तैयार करवा रहे हैं.'' इन बोरियों में आटा, चावल, चीनी, चाय पत्ती, मसाले, तेल, बेसन आदि होते हैं. किसी ने 22 किलो की बोरी तैयार कराई है, जिसमें प्याज और आलू भी रखवा दिया है. इसे आम तौर पर राशन किट कहते हैं. रमज़ान में मुस्लिम मुहल्लों में लोग अपनी माली हालत और सबसे बढ़कर नीयत के मुताबिक कमजोर तबके के लोगों की ऐसे ही मदद करते हैं. लेकिन इस साल इस पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि लॉकडाउन की वजह से लोगों के पास काम-धंधा नहीं है. लोग इसके लिए ढिंढोरा नहीं पीटते, बहुत खामोशी के साथ काम करते हैं, प्रायः किसी ऐसे शख्स को बता देते हैं जो यह संदेश जरूरतमंदों के बीच पहुंचा देता है और लोग खुद ही आकर ‌एक तयशुदा जगह से अपना सामान ले जाते हैं. कई बार युवा खुद ही इसे जरूरतमंदों के घर पर पहुंचा रहे हैं.

पांच स्तंभों में से एक

इस्लाम के पांच स्तंभ—कलमा, सलात या नमाज, सौम या रोजा, ज़कात और हज—हैं, और इनमें रोज़ा एक है और रमज़ान में हर बालिग़ और सेहतमंद व्यक्ति से 29 या 30 दिन तक रोज़ा रखने को कहा गया है. कमजोर, बीमार, सफर पर जाने वाले लोगों, दूध पिलाने वाली मांओं, माहवारी से गुजर रही महिलाओं को इससे विशेष छूट है. जान-बूझकर रोज़ा न छोड़ने की हिदायत है. बीमारी की हालत में रोज़ा छोड़ने वाले को जरूरतमंदों को अपने हिस्से का खाना खिलाने को कहा गया है. यही नहीं, विशेष रूप से सदक़ा-ख़ैरात देने को कहा गया है.

भारत में आजकल रोज़ा करीब 15 घंटे का है. दिल्ली में सुबह 4.20 पर सेहरी (सुहूर) का वक्त खत्म हो जाता है, थोड़ी देर में फ़ज्र की अज़ान होती है और रोज़े की शुरुआत हो जाती है. शाम को 6.52 पर मग़रिब की अज़ान होती है और लोग अपने-अपने घरों में इफ्तारी करते हैं. इस तरह एक रोज़ा पूरा हो जाता है. शिया हजरात की सेहरी का वक्त 10 मिनट पहले खत्म हो जाता है, और इफ्तार भी अमूमन 10 मिनट बात करते हैं. दिन में न सिर्फ न कुछ खाना-पीना है, बल्कि सिगरेट, तंबाकू और यौन संबंधों से परहेज करना है, अन्यथा रोज़ा नहीं होगा. यही नहीं, ग़ीबत या परनिंदा और फिजूल की बातों तथा दिनभर सोकर बिताने की भी मनाही है. लिहाजा, नमाज पढ़ने और अच्छी बातें करने पर जोर दिया जाता है. साथ ही, लोगों को अपने सामान्य काम करते रहने पर जोर दिया जाता है. आजकल गर्मी ज्यादा नहीं है और लॉकडाउन की वजह से कहीं जाने की मनाही है, लिहाजा किसी के घर दावत पर जाने का सवाल नहीं है.

रोज़ा अरबी के नौवें महीने में रखा जाता है. इस्लामी कैलेंडर लूनर कैलेंडर है और इसमें मौसम को समान महीने में रखने के लिए कोई दोमास नहीं लगता. हर साल रमजान १० दिन पीछे खिसक जाता है और अमूमन ३६ साल में विभिन्न मौसमों से गुजरते हुए रमजान अंग्रेजी के उसी महीने में आ जाता है. माना जाता है कि इसी महीने में पैगंबर मोहम्मद को वही हासिल हुई और क़ुरान नाजिल हुई. मुसलमान यह भी मानते हैं कि इसी महीने में अब्राहमी धर्मों—इस्लाम के अलावा यहूदी धर्म और ईसाई धर्म—की दूसरी धार्मिक किताबें भी आईं.

तरावीह नहीं

मुसलमान इस महीने में अपने पवित्र ग्रंथ को कम से कम एक बार पूरा पढ़ जाने या सुन लेने की कोशिश करते हैं. इसके लिए रात में मस्जिदों में इशा की नमाज़ के बाद 20 रेकात (एक बार नीयत करके बाएं हाथ पर दायां हाथ रखने या हाथ बांधने, रुकु या आधा झुकने और फिर दो बार सिज्दा करने के बाद एक रिकात पूरी होती है) नमाज़ अतिरिक्त पढ़ी जाती हैं. इसे तरावीह कहते हैं. मुसलमानों के कुछ फिरक़े आठ और बारह में इसे पढ़ लेते हैं और कुछ नहीं पढ़ते हैं, सिर्फ क़ुरान की तिलावत या पढ़ाई करते हैं. लेकिन मक्का में ये 20 रेकात पढ़ी जाती है, जिनको कम पढ़ना होता है, वे पहले निकल जाते हैं. मस्जिदों के अलावा कुछ लोग अपने घरों में भी तरावीह का इंतजाम करते हैं और इसकी सूचना गली-मुहल्ले में दे देते हैं, ताकि पढ़ने वाले लोग वहां आ सकें. मस्जिदों में होने वाली तरावीह पूरे 29 या 30 दिन यानी पूरे रमज़ान के दौरान चलती है, वहीं घरों में इसे सात से 15 दिनों में ही खत्म कर लेते हैं. दरअसल, तरावीह में नमाजियों को पूरी कुरान सुनाई जाती है. हाफ़िज़, जिसे पूरा क़ुरान कंठस्थ होता है, इन दिनों में क़ुरान की पहली आयत से लेकर आखिरी आयत तक सुनाता है. क़ुरान में 77,449 शब्द हैं और हाफ़िज़ को ये सारे शब्द क्रमवार याद होते हैं. जाहिर है, यह तरावीह सामूहिक रूप से पढ़ी जाती है. लेकिन कोविड-19 के दौर में ऐसा नहीं है.

मस्जिदों में सामूहिक नमाज़ पर पाबंदी आयद कर दी गई है. देशभर में विभिन्न शहरों, कस्बों और गांवों में मस्जिदों के दरवाजों पर ‘अपील' चस्पां कर कर दी गई है. इसमें लोगों को अपने घरों पर ही नमाज़ अदा करने को कहा गया है. किसी भी तरह के जमावड़े की मनाही है. हालांकि वबा या आपदा के समय इस तरह की पाबंदियों से मुस्लिम समाज वाकिफ न हो, ऐसा नहीं है लेकिन मौजूदा पीढ़ी ने कभी ऐसा नहीं देखा. खुद हरमैन शरीफैन (मक्का और मदीना की मस्जिदें) में जमात के साथ यानी सामूहिक रूप से नमाज की पाबंदी लगा दी गई है. फिर दुनिया की दूसरी मस्जिदों में ऐसा हो रहा है तो ताज्जुब की बात नहीं है. रमज़ान महीने में पांच नमाजों के बाद मस्जिद में इमाम (नमाज पढ़ाने वाला), मुअज्जिन (अजान देने वाला), खादिम (खिदमत करने वाला) और इंतजामिया कमेटी के एक-दो लोग दूरी बनाकर जमात के साथ नमाज पढ़ लेते हैं. अक्सर मस्जिदों में सिर्फ तीन ही लोग होते हैं. वैसे भी तरावीह को पांच वक्त की सामूहिक नमाज की तरह फ़र्ज़ करार नहीं दिया गया है.

अज़ान में एक लाइन में लोगों को सलात (नमाज के लिए अरबी शब्द) के लिए बुलाया जाता है. यह लाइन दोहराई जाती है. लेकिन अपने देश की मस्जिदों में हर अजान के बाद लोगों से अपने घरों में ही नमाज पढ़ने की सलाह दी जा रही है. अरब की कुछ मस्जिदों में इस लाइन की जगह घर में ही नमाज पढ़ने की लाइन दोहराई जा रही है. दिल्ली के जौहरी फार्म में गार्ड की नौकरी करने वाले मुजफ्फरपुर के 50 वर्षीय मोहम्मद खालिद का कहना है, ‘‘भइया, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा. जुमा की नमाज नहीं हो रही है. जमात के साथ कोई नमाज नहीं हो रही है. मस्जिद ही बंद कर दी गई है.'' खालिद ने ही नहीं, कई बुजुर्गों ने भी कभी ऐसा हाल नहीं देखा. बरसों से पार्किंग में दूसरे गार्डों और अपने रिश्तेदारों के साथ इफ्तार करने वाले खालिद अब शाम होते ही थोड़ी देर के लिए अपने घर चले जाते हैं, जहां अपने परिवार के साथ इफ्तार करते हैं.

शाम को सड़कों पर सैर या मटरगश्ती नहीं

मुस्लिम मोहल्लों में इफ्तार से पहले हर कोई अपने घर पर पहुंच जाना चाहता है. आम दिनों में इफ्तार से आधे घंटे पहले सड़कें और गलियां सूनी होने लगती थीं. लोग अपना-अपना सामान खरीदकर घर के अंदर इफ्तारी के लिए चले जाते थे. कहीं-कहीं लोग सड़क के किनारे शर्बत और खजूर या बिस्कुट या केक लेकर खड़े रहते थे कि रास्ते में फंसे लोगों को इफ्तार करा दिया जाए. लेकिन लॉकडाउन के दौर में चूंकि सब लोग अपने घर में बंद हैं लिहाजा ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. सड़कें सूनी हैं. शाम को इफ्तार के बाद खासकर युवा लोग सड़कों पर घूमने निकल जाते थे. चाय और खाने-पीने की दुकानों के इर्दगिर्द मंडराते रहते थे, लेकिन अभी शाम को यह रौनक भी गायब है. सड़कें या गलियां जैसे दिन में वैसे ही रमजान की रात में भी दिखती हैं.

दुकान-बाजार बंद

शाम से सुबह सेहरी तक गुलजार रहने वाले खाने-पीने के होटल बंद हैं. खासकर पुरानी दिल्ली के मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में देर रात तक खुलने वाली दुकानें बंद हैं. शाम से लेकर सुबह तक सड़कों पर हुजूम नहीं है. ओखला जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में कुर्ता-पायजामे की दुकानों पर भीड़ वाले दृश्य नहीं हैं, क्योंकि बाजार और दुकानें ही बंद हैं. जूते-चप्पल और कुर्ता-पायजामे की कुछ दुकानों पर पहले के रमजान में इस कदर भीड़ होती थी मानो वहां मुफ्त में बांटा जा रहा हो. शहर में रहने वाला हर शख्स ईद की खरीदारी शुरू में ही कर लेना चाहता था. दुकानों की सालभर की ज्यादातर कमाई इसी एक महीने में होती थी. दुकान मालिक नया और पुराना, हर तरह का माल बेच लेता था. इसके लिए अलग से स्टॉक तैयार करता था क्योंकि महीने के आखिरी दस दिन में दुकानदार को सोने तक की फुर्सत नहीं होती थी. जाहिर है, उनका धंधा चौपट हो गया. रमज़ान के दिनों में खास तरह के पकवान और आइटम तैयार करने वाली दुकानें भी बंद हैं. दिल्लीवाले खास तरह के सेहरी और इफ्तार के आइटम दुकानों से लेते थे, जो इस बार नहीं मिल रहे. खाने-पीने की दुकानों के इर्दगिर्द भीड़ होती थी. चहल-पहल और रौनक गायब है. यह रौनक घरों में ही सीमित है. लेकिन घर में भी दोस्तों और रिश्तेदारों की दावत बंद है. कोई कहीं जा-आ नहीं सकता.

इसके अलावा, इस महीने में ज्यादातर लोग ज़कात देते हैं, जिसे लेने के लिए विभिन्न मदरसों और यतीमखानों के लोग हाजिर हो जाते हैं. इस बार वे भी नदारद हैं क्योंकि लॉकडाउन की वजह से उन लोगों की आवाजाही पर भी रोक है. देश के मदरसे और यतीमखाने ज्यादातर इसी रकम से चलाए जाते हैं. इस पर तफसील से अगले लेख में बात करेंगे.

फिलहाल, इस रमज़ान में इस्लाम में बताई गई कोई जरूरी बात ऐसी नहीं है, जिस पर अमल न किया जा रहा हो. तरावीह को छोड़ दें तो यह दूसरे साल के रमजान से अलग नहीं है. लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. ज़कात, सदका और खैरात जारी है. घरों में रहने की वजह से ऐसे लोग भी रोज़ा रख रहे हैं, जो बरसों से किसी न किसी वजह से रोज़ा नहीं रख रहे थे. हां, इफ्तार पार्टी नहीं हो रही है, और शायद हो भी नहीं पाएगी.

इस तरह, इस बार रमज़ान में इस महीने की सारी जरूरी चीजें हो रही हैं, सिवाए सामूहिक रूप से मस्जिद में तरावीह और नमाज के. हां, सड़कों और बाजारों से रौनक और चहल-पहल जरूर गायब हैं. इसका थोड़ा-बहुत असर लोगों की सोच पर जरूर है लेकिन देश-दुनिया में एक साथ लॉकडाउन के मद्देनजर यह गैर-मामूली नहीं लग रहा है.

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