लॉकडाउन डायरीः जीवन-मृत्यु के संघर्ष में सकारात्मकता ही शक्ति है
मृत्यु और जीवन का संघर्ष बहुत पुराना है. जब से प्रकृति है सभ्यता है तब से यह संघर्ष है और इसमे जीवन ही विजयी हुआ है तभी तो सभ्यता का विकास और प्रसार हुआ. मृत्यु जरूर लोगों की जान ले लेती है पर जीवन को वह पराजित नही कर पाती है.

विमल कुमार/ लॉकडाउन डायरीः सोलह
मैं अकेला;
देखता हूं, आ रही
मेरे दिवस की सान्ध्य बेला .
पके आधे बाल मेरे
हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मन्द होती आ रही,
हट रहा मेला.
महाकवि निराला की यह पंक्तियां आज सहसा सच हो गई हैं. पूरी दुनिया आज सदमे और भय से आक्रांत है. लोगों को लगने लगा है कि अब उनके जीवन की सांध्य वेला आ गयी है. लेकिन पूरी दुनिया मे एक सकारात्मकता भी व्याप्त है. डॉक्टर, पुलिसकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी से लेकर सब्जी और फलवाले अपनी सेवाएं दे रहे है.
हमारे सामने 1918 के स्पेनिश फ्लू का उदाहरण सामने है जब 5 करोड़ से अधिक लोग मारे गए थे तब भी इसी सकारात्मकता ने दुनिया को बचाया था.
मृत्यु और जीवन का संघर्ष बहुत पुराना है. जब से प्रकृति है सभ्यता है तब से यह संघर्ष है और इसमे जीवन ही विजयी हुआ है तभी तो सभ्यता का विकास और प्रसार हुआ. मृत्यु जरूर लोगों की जान ले लेती है पर जीवन को वह पराजित नही कर पाती है.
कोरोनो ने जीवन और मृत्यु के इस द्वंद्व को पेश किया है और यही कारण है कि दुनिया मे इस द्वंद्व ने सृजनात्मकता को फिर से जन्म दिया है. इटली की बालकनी में खड़ा एक व्यक्ति अपने वाद्य संगीत से पूरी दुनिया को जीवन के लिए प्रेरित कर रहा है, तो एक नृत्यांगना टैगोर की कविता पर नृत्य कर एक वीडियो फेसबुक पर पेश कर रही है और वह रातों-रात वायरल हो जा रहा है. कोई कुमार गन्धर्व के गीत गा रहा तो कोई रविशंकर का सितार सुन रहा या बजा रहा है.
यह अलग बात है कि ये मध्य वर्ग से जुड़े लोग हैं गरीबों वंचितों और असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों के सामने दूसरा संकट है. लेकिन हिन्दी के कवि इस संकट को अपनी कविता में व्यक्त कर रहे हैं. करीब तीस से अधिक लोग फेसबुक पर कोरोना संकट को लेकर कविताएं पोस्ट कर चुके हैं. उनमें से कुछ कविताएं बहुत वायरल भी हो गई है.
वरिष्ठ पत्रकार एवम कवि संजय कुंदन की कविता तो इतनी वायरल हुई कि उसका वीडियो डॉक्टरों से लेकर नगर निगम के कर्मचारियों के वॉट्सऐप ग्रुप में पहुंच गई है. इस से पता चलता है कि अगर रचना व्यक्ति के दुख-दर्द को ईमानदारी से व्यक्त करती है तो वह लोगों के दिलो-दिमाग को छूती है.
विष्णु नागर, उदयप्रकाश, लीलाधर मंडलोई जैसे अनेक वरिष्ठ कवियों ने कोरोना संकट पर कविताएं लिखी हैं जो सोशल मीडिया पर सराही गयी है.
यह सृजनात्मकता अचानक फूटी है क्योंकि लोगों के अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका ने अनेक उपन्यासों और क्लासिक फिल्मों को जन्म दिया. प्लेग और कोलेरा ने भी कामू और मार्खेज को क्लासिक लिखने के लिए प्रेरित किया. इन की किताबों की मांग अब फिर बढ़ गई है.
नयी पीढी के लोग अब फिर से पढ़ना चाहते है और जानना चाहते है कि इन साहित्यिक कृतियों ने जीवन को कैसी रौशनी और विश्वास दिया जिससे लोगों को अपनी जिजीविषा को बनाये रखने में मदद मिली.
इतिहास में अनेक संकट आये जिसे मनुष्य ने अपनी मिहनत प्रतिभा लगन और सकरत्मकता से दूर किया है. आज कोरोना से लड़ने के लिए पूरी दुनिया में शोध-अनुसंधान शुरू हो गए. भारत में भी नए सस्ते जांच किट मास्क और उपकरण बनने लगे. आइआइटी के छात्रों से लेकर गांव की स्व-सहायता ग्रुप की महिलाओं और कैदियों तक ने अपने नवाचार का प्रयोग कर पीपीई मास्क दस्ताने आदि बनाने लगे है. यह उनकी रचनात्मकता हैं.
नवाचार से जुड़े लोगों का समाधान कार्यक्रम सरकार ने शुरू किया है. हैकथन की तर्ज पर आईडियाथन भी सम्पन्न हो चुका. इस तरह इस सृजनात्मकता के अनेक रूप हैं. मृत्यु का भय मनुष्य को मजबूत तो बनता है रचनात्मक भी बनाता है. क्योंकि उसे निराला के शब्दों में यह भी विश्वास रहता हैः
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त
हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,
द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त.
मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त.
(विमल कुमार, वरिष्ठ कवि और पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उनसे इंडिया टुडे की सहमित आवश्यक नहीं है.)
***