नदीसूत्रः बोल मेरी बिजली कितना पानी

महाराष्ट्र का विदर्भ पहले से ही पानी की किल्लत का इलाका है. वहां की वेनगंगा नदी का अस्तित्व खतरे में है क्योंकि न सिर्फ खेतों को सींचने के लिए, बल्कि ताप बिजलीघरों का पेट भरने के लिए भी इस नदी का पानी इस्तेमाल किया जा रहा है. बढ़ते ताप बिजलीघर अधिक पानी खींच रहे हैं और वेनगंगा पर ताबड़तोड़ बांध बनाए जा रहे हैं

फोटोः मंदार देवधर
फोटोः मंदार देवधर

देश का एक इलाका है विदर्भ. नाम तो सुना ही होगा. महाराष्ट्र का यह इलाका अपनी खेती-बाड़ी की दिक्कतों के लिए खबरों में बना रहा है. आज नदीसूत्र में वहां की एक नदी वेनगंगा की बात करते हैं. वेनगंगा से आपका जुड़ाव इसलिए भी हो सकता है कि इसकी घाटी ही रूडयार्ड किपलिंग के जंगल बुक का कैनवास है. 

महाराष्ट्र का पूर्वी विदर्भ इलाके की अपरिमित हरियाली इसी नदी की वजह से है. 

महाराष्ट्र के कुल जंगल क्षेत्र का आधे से अधिक इसी इलाके में आता है. पर इस हरियाली को जीवन देने वाली वेनंगगा के लिए सरकारों ने रोड़े ही बिछाए हैं. सिंचाई के नाम पर न जाने कितने बांधों की योजना बनी बैठी है. नतीजतन, वेनगंगा के पानी पर जैव विविधता, वन्य जीवन और जंगल का अधिकार छीजता चला गया है, सिंचाई के लिए बांधों और बिजली के लिए ताप बिजलीघरों का हिस्सा खतरनाक तरीके से बढ़ता गया है.

वेनगंगा प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी गोदावरी की सहायक है और यह मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से निकलती है. बाद में जाकर यह चंद्रपुर जिले में वर्धा नदी में मिल जाती है. 

लेकिन अपने वनों, वन्य जीवन और जनजातीय आबादी की निर्भरता के बावजूद वेनगंगा की संरक्षा को लेकर सरकारों ने कत्तई चिंता नहीं दिखाई है. इसकी धारा को बांध और बराज बनाकर कई जगहों पर रोका गया है. इसके बेसिन में कोई 149 बांध बनाए जा चुके हैं. इतना होने पर भी, राज्य सरकार द्वारा गठित विदर्भ इरीगेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (वीआइसीडी) और अधिक बांध बनाने पर जोर दे रहा है. मार्च, 2011 में ही वीआइसीडी ने वेनगंगा और वर्धा नदी की बेसिन में 257 परियोजनाएं शुरू कर दी थीं. (कैग रिपोर्ट, 2014) 

विदर्भ क्षेत्र में 37 परियोजनाओं पर काम बगैर फॉरेस्ट क्लीयरेंस के ही चालू कर दिया था, जबकि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत वन भूमि को गैर-वनीय कामों में इस्तेमाल के लिए लाने से पहले यह क्लीयरेंस जरूरी था. 

खासकर, महाराष्ट्र राज्य को तो बड़े बांधों से कुछ खास ही प्यार है. केंद्रीय जल आयोग का नैशनल रजिस्टर फॉर लार्ज डैम्स, 2014-15 सीडब्ल्यूसी देश के कुल बड़े बांधों में से 36 फीसद तो सिर्फ महाराष्ट्र में बनाए जा रहे हैं. बाद में खबर आई कि तीस सालों से बन रहे और विदर्भ का भाखड़ा नांगल कहे जा रहे वेनगंगा के घोसीखुर्द बांध का सिंचाई वाला मकसद नाकाम साबित हुआ. मीडिया रिपोर्टस में दावा किया गया कि इस परियोजना के लागत में करीबन 1900 फीसदी की बढोतरी हो गई. 

ऐसा ही मामला बावनथड़ी बांध को लेकर भी हुआ जिसे वेनगंगा नदी पर बनाया जा रहा था और जिसे पूरा होने में करीबन 37 साल लगे. यह परियोजना मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त योजना थी और 23 करोड़ की आवंटित लागत के साथ 1975 में शुरू की गई थी. बहरहाल बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी खबर के मुताबिक, इसकी लागत इस बांध के बनकर पूरा होते वक्त 1,407 करोड़ रुपए हो गई. वेनगंगा की सहायक गड़वी नदी पर बने इतियादोह बांध भी सिंचाई मुहैया कराने में नाकाम रहा. 

इसके साथ ही वेनगंगा के पानी पर ताप बिजली घरों का दावा भी बढ़ता जा रहा है. तुर्रा यह है कि यह ताप बिजलीघर नदी को प्रदूषित भी करते हैं. 2011 में गैर-सरकारी संस्था ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट कहती है कि 2010 तक ही विदर्भ में 71 ताप बिजलीघर स्वीकृति पाने के विभिन्न चरणों में थे, इनकी स्थापित उत्पादन क्षमता 55 गीगावाट थी. 

इसका मतलब यह हुआ कि इन सब ताप बिजलीघरों की वजह से वेनगंगा बेसिन में जल उपलब्धता में 16 फीसद की कमी आएगी और वेनगंगा से सटे वर्धा बेसिन में यह कमी करीबन 40 फीसद तक होगी. चंद्रपुर में कोयल खनन के वास्ते पहले साल 2000 तक 2,558 हेक्टेयर वन भूमि खत्म हो गई है. 

लेकिन हाल के वर्षों में सरकार ने 1,17,500 मेगावॉट के कोयला आधारित ताप बिजलीघरों को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है. एनजीओ "प्रयास'' का आकलन है कि इतनी मात्रा में बिजली पैदा करने के लिए करीब 460 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी खर्च होगा. इतने पानी से 9,20,000 हेक्टेयर खेत की सिंचाई की जा सकती है, या पूरे मध्य प्रदेश की आबादी की सालभर की पानी की जरूरतें पूरी हो सकती हैं.

महाराष्ट्र ने 33,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने के लिए विदर्भ में 47 नए ताप बिजलीघरों को मंजूरी दी है. विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन का अनुमान है कि इन 47 बिजलीघरों के लिए करीब 135.3 करोड़ क्युबिक मीटर पानी की सालाना जरूरत होगी. ताप बिजलीघर पानी के लिए सोख्ते का काम भी करते हैं. हालांकि हर बिजलीघर के लिए पानी की जरूरतों के आंकड़े पर्यावरण मंत्रालय ने उपलब्ध नहीं कराए हैं.

अनुमान है कि किसी ताप बिजलीघर में एक यूनिट बिजली उत्पादन के लिए दो से तीन क्युबिक मीटर पानी खर्च होता है. 

जाहिर है, यह पानी इलाके की सिंचाई परियोजनाओं से ही लिया जाएगा और यह पानी 2 लाख हेक्टेयर खेतों को पानी से महरूम कर देगा. और फिर इन बिजलीघरों से उसी तरह राख निकलेगी जैसी सिंगरौली, परीछा और कोरबा में निकल रही है.

प्रदूषण और सांसों की घुटन के साथ दमकते भारत के लिए बिजली बनाई जा रही है और झिलमिलाती रोशनी से दूर इन बिजलीघरों के साए में उडऩे वाली राख खाना, पानी और बजरिए सांस, फेफड़ों को गर्दो-गुबार से अंधेरा कर रही है.

असल में, वनभूमियां ही नदी के जलभरों (एक्विफर) को पानी से लबालब करती हैं और हम उस भूजल का इस्तेमाल अपने कई कामों के लिए करते हैं. पर, वनभूमि, नदी, बरसात इन सबका चक्र टूट रहा है. वेनगंगा में तेजी से कम होते पानी की वजह सिंचाई बताई जा रही है, और जब नदी ही खत्म हो जाएगी तो पता नहीं सरकार बांध किस चीज पर बनाएगी.

सवाल उलझाऊ है. जवाब है कि मिलता ही नहीं.

(मंजीत ठाकुर इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता हैं)

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