शख्सियत: विशेष जरूरत वाले बच्चों की दीपमाला

बरेली के इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर की प्रधानाचार्य दीपमाला पांडेय ने लॉकडाउन में 'चाइल्ड विथ स्पेशल नीड' बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए शुरू किया 'वन टीचर वन कॉल' अभियान.

दीपमाला पांडेय (फोटोः आशीष मिश्र)
दीपमाला पांडेय (फोटोः आशीष मिश्र)

यूपी में बरेली से करीब 30 किलामीटर दूर भुता ब्लॉक के इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर की प्रधानाचार्य दीपमाला पांडेय की शैक्षिक क्षमता को दो वर्ष पहले अप्रैल, 2018 में बड़ी चुनौती मिली, जब इनके स्कूल में सैरेब्रल पैलिसी से पीड़ित एक मानसिक रूप से कमजोर बच्चे अनमोल ने एडमिशन लिया. इस समय प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर में डेढ़ सौ बच्चे पढ़ रहे थे लेकिन इनके बीच अनमोल का सामंजस्य बिठाना आसान नहीं था. अनमोल बोल नहीं सकता था, समझता भी कम था, शुरुआत में दीपमाला ही नहीं साथी बच्चों को भी कुछ हिचक हुई. दीपमाला के लिए यह एक नया अनुभव था. उन्होंने अनमोल पर ध्यान देते हुए उसकी जरूरतों के हिसाब से उसे सिखाना शुरू किया. कुछ ही दिनों में अनमोल साइन लैंग्वेज सीखकर इसी के जरिए वह अपनी बाते कहने लगा. दीपमाला का हौसला बढ़ा और उन्होंने आम बच्चों के साथ अनमोल को पढ़ाने के लिए कई नए तौर-तरीके अपनाए.

आज अनमोल कक्षा दो में पहुंच गया है. वह स्कूल की सारी एक्टिविटी में भाग लेता है, पीटी करता है, योगा करता है, ‘राइम्स’ पर भी ऐक्शन करने के साथ क्लास भी माइंड करा लेता है. अनमोल का दिमाग अपने साथी छात्रों से कुछ कम विकसित है बावजूद उसे स्कूल में आना बहुत भाता है. यही वजह है कि सैरेब्रल पैलिसी बीमारी से जूझते हुए भी अनमोल ने स्कूल में 90 फीसद से अधिक उपस्थिति दर्ज कराकर दूसरे सामान्य बच्चों को पीछे छोड़ दिया है. इसके लिए अनमोल को सरकार की तरफ से पांच हजार रुपए की स्कॉलरशिप मिलने की घोषणा हुई है. दीपमाला के स्कूल में कक्षा एक में पढ़ने वाला अतुल 60 प्रतिशत दिव्यांग है. इसने भी पिछले वर्ष दिसंबर में विश्व दिव्यांग दिवस पर जिला स्तरीय कला प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार मिला था.

असल में अनमोल, अतुल जैसे बच्चों को तकनीकी भाषा में विशेष जरूरतों वाले बच्चे 'चाइल्ड विथ स्पेशल नीड' (सीडब्ल्यूएसएम) बच्चे कहा जाता है. ऐसे बच्चों के लिए केंद्र सरकार ने 'राइट ऑफ पर्सन विथ डिसएबिलिटी ऐक्ट' (आरपीडब्ल्यूडी) ऐक्ट -2016 लागू किया. इसके जरिए सरकार ने सीडब्ल्यूएसएम बच्चों को सामान्य स्कूलों में ही एडमिशन देने का प्रावधान किया. ये बच्चे चाहें तो वे अपने लिए बने स्पेशल स्कूलों में एडमिशन ले सकते हैं चाहे तो सामान्य स्कूलों में आम बच्चों के साथ भी पढ़ सकते हैं.

सीडब्ल्यूएसएम में 21 श्रेणियां बनाई गई हैं जिनमें ब्लाइंड, हैंडीकैप, मानसिक मंदित, ऑटिज्म, सेरेब्रल पैलिसी, एसिड अटैक, थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चे शामिल हैं. इसी के तहत अप्रैल 2018 में अनमोल ने इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर में दाखिला लिया था. अनमोल के एडमिशन के बाद यहां की प्रधानाचार्य दीपमाला पांडेय ने विशेष जरूरतों वाले सीडब्ल्यूएसएम बच्चों को अधिक से अधिक स्कूलों में एडमिशन दिलाकर इन्हें सामाज की मुख्यधारा से जोड़ने का अभियान शुरू किया. दीपमाला को पता चला कि केंद्र सरकार के आरपीडब्ल्यूडी ऐक्ट के बारे में ज्यादातर शिक्षकों को जानकारी ही नहीं थी. चूंकि इन विशेष जरूरतों वाले बच्चे स्कूलों में कम होते हैं इसलिए दीपमाला ने तय किया कि पहले शिक्षकों को मोटीवेट किया जाए कि वे अपने स्कूलों में ऐसे बच्चों को ज्यादा से ज्यादा एडमिशन दें. आम बच्चों के साथ इन्हें भी कैसे पढ़ाया जाए? पढ़ाई का वह ढंग क्या हो जिससे आम बच्चे अपने बीच इन विशेष जरूरतों वाले बच्चे के साथ घुलमिल जाएं? सीडब्ल्यूएसएम बच्चों को पढ़ाने के तौर तरीके सीखने के लिए दीपमाला ने एनक्लूसिव एजुकेशन की ट्रेनिंग भी ली.

अप्रैल, 2018 में दीपमाला ने बरेली के ही कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर व्हाट्सऐप पर 'इंक्लूसिव एजुकेशन' के नाम से एक 'पीपुल लर्निंग कम्युनिटी' (पीएलसी) बनाई. शिक्षकों को विशेष जरूरतों वाले बच्चों को एडमीशन देने के लिए प्रेरित करना शुरू किया. विशेष बच्चों से जुड़े स्लोगन, कविताएं भेजकर सभी शिक्षकों में इन विशेष जरूरतों वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई गई. दीपमाला ने इन सीडब्ल्यूएसएम बच्चों को क्लास में कराई जाने वाली ऐक्टिविटी को इंटरनेट से सर्च करके या हर ब्लॉक में इन बच्चों के लिए तैनात विशेष शिक्षकों से संपर्क करके एक ट्यूटोरियल सभी शिक्षकों को नियमित भेजना शुरू किया. दो साल पहले कुछ शिक्षकों के साथ शुरू हुए दीपमाला के इस अभियान में अबतक 69 शिक्षक शामिल हो चुके हैं.

विशेष जरूरतों वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए दीपमाला ने कई नवाचार भी किए हैं. इन बच्चों के लिए 'स्टेम ऐक्टीविटी' तैयार की. 'एस' फॉर साइंस, 'टी' फॉर टेक्नोलाजी, 'ई' फॉर इंजीनियरिंग 'एम' फॉर मैथ्स पर आधारित ऐक्टिविटी के जरिए विशेष जरूरतों वाले बच्चों में प्रॉब्लम सॉल्विंग, बैलेंसिंग, सीक्वेंसिंग तथा उनकी मेंटल एबिलिटीज को बढ़ाने के तौर-तरीकों को पढ़ाई के साथ जोड़ा गया. इसके लिए मिट्टी की गोलियां, प्लास्टिक के गिलास ,खाली ढक्कन, न्यूज़पेपर, कलर, मोती, छोटी लकड़ियां, आइसक्रीम स्टिक्स, स्ट्रॉ जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हुए अलग-अलग ऐक्टिविटी तैयार की गई. यह ऐक्टिविटी सामान्य बच्चों के साथ साथ मानसिक मंदित बच्चों, सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों तथा लर्निंग डिसेबिलिटी से जूझ रहे बच्चों को भी मदद करती हैं. दीपमाला ने अपने स्कूल में एक रीडिंग कार्नर भी बनाया है जहां बुक बैंक भी है जिसमें लोगों से दान में मिली किताबें बच्चों के लिए उपलब्ध है. प्राइवेट स्कूलों की तरह प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर में भी हर हफ्ते पोस्टर मेकिंग, ड्राइंग कंप्टीशन, खेल ऐक्टिविटी होती है. साथ ही यहां बच्चों को नवोदय विद्यालय में प्रवेश की तैयारी भी कराई जा रही है.

इस अभियान को एक बड़ी चुनौती कोरोना संक्रमण के कारण लागू हुए लॉकडाउन में मिली जब सारे स्कूल बंद हो गए हैं. बेसिक शिक्षा विभाग ने पहली अप्रैल से शारदा अभियान के तहत प्राइमरी स्कूलों में ऑनलाइन एडमिशन लेने के निर्देश जारी किए. ऐसी हालत में सीडब्ल्यूएसएम बच्चों को प्राइमरी स्कूलों में एडमिशन दिलाने के लिए दीपमाला ने 'वन टीचर वन कॉल' अभियान शुरू किया. इसके तहत हर शिक्षक को केवल एक अन्य शिक्षक को फोन करके यह समझाना था कि किसी भी हालत में सीडब्ल्यूएसएम बच्चे एडमिशन से वंचित न रह जाएं. गांव में प्रधान या अन्य लोगों से ऐसे बच्चों के बारे में जानकारी लेकर उन्हें संबंधित प्राइमरी स्कूल में एडमिशन दिलाने की मुहिम शुरू की गई. इसके लिए दीपमाला ने बकायदा 'वन टीचर वन काल' अभियान का एक लोगो तैयार किया. जिसमें “योर वन कॉल कैन गिव विंग्स टू स्पेशल चाइल्ड” संदेश लिखा गया. इसे ज्यादा से ज्यादा शिक्षकों को भेजा गया. इसका असर यह हुआ कि 19 जून तक 4,437 सीडब्ल्यूएसएम बच्चों की ऑनलाइन एडमिशन के लिए फीडिंग की जा चुकी है.

बरेली कॉलेज से केमिस्ट्री में एमएससी और बी.एड. करने वाली दीपमाला पांडेय का वर्ष 2009 में बेसिक शिक्षा विभाग के तहत सहायक शिक्षक के रूप में हुआ था. इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल डभौरा गंगापुर की प्रधानाचार्य दीपमाला पांडेय ने जिस तरह से विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में समावेशी वातावरण तैयार किया है उसने सामाजिक सरोकारों में एक शिक्षक की भूमिका को नया आयाम दिया है. दीपमाला कहती हैं, “मेंटल डिसएबिलिटी उनमें है जो विशेष जरूरत वाले बच्चों में एबिलिटी नहीं देख पाते हैं.” यही एबिलिटी दीपमाला को औरों से अलग करती है.

***

Read more!