उदास हैं, निराश नहीं है वसीम बरेलवी
वसीम बरेलवी फ़रमाते हैं कि आज के हालात के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं. हमने अपनी सुविधाओं के लिए, अपने अंहकार के लिए प्रकृति के संतुलन को असंतुलित करने का हर काम किया.

राजेंद्र शर्मा
बयालीस साल से महबूब शायर वसीम बरेलवी को सुनता,पढ़ता रहा हूं. उनसे बतियाता रहा हूं, पर आज फ़ोन पर हुई बातचीत में उन्हें जितना उदास महसूसा, उतना कभी नहीं. उनकी इस उदासी का सबब वे लोग हैं ,जिनके घरों के चूल्हे उनकी रोज़ की मजूरी से आबाद होते हैं. करोना के कारण मजूरी नहीं है, चूल्हे बंद हैं. अपनी मेहनत के दम पर अपने आत्मसम्मान को जिलाए रखने वाले मेहनतकश राहत सामग्री पर निर्भर हो रहे हैं.
वसीम बरेलवी फ़रमाते हैं कि आज के हालात के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं. हमने अपनी सुविधाओं के लिए, अपने अंहकार के लिए प्रकृति के संतुलन को असंतुलित करने का हर काम किया. दुनियावी अंधी दौड़ में हम ऐसे डूबे कि “मैं”के अलावे कुछ देखना ही नहीं चाहते, रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा था, मां बाप, बीवी बच्चे, रिश्तेदार,आस पड़ोस, यार तो बहुत दूर हमने खुद से भी मिलना, बतियाना छोड़ दिया था. कोरोना के बहाने हमें खुद से बतियाने का, आत्म चिंतन करने का मौका मिला है. वसीम बरेलवी कोरोना प्रकोप को ईश्वर का कहर बिल्कुल नहीं मानते.
पूरी आस्था के साथ कहते हैं कि एक मां अपने बच्चे को पांच मिनिट कड़ी धूप में खड़ा होते नहीं देख सकती फिर ईश्वर तो एक एक बंदे को सत्तर मांओं जितनी मोहब्बत करता है, वह अपने ही बंदों को, अपने बच्चों को, अपनी बनाई दुनिया को परेशान कैसे देख सकता है पर जब बंदे सृष्टि से, प्रकृति से खिलवाड़ करने लगे तो ईश्वर दुनिया को जगाता है -
जगाना आता है उसको कई तरीक़ों से
घरों पे दस्तक देने ख़ुदा नहीं आता ।आज के हालात को वसीम बरेलवी ईश्वर की इस दुनिया को जगाने की , अंहकार को ख़त्म करने की कोशिश मानते हुए कहते हैं कि ईश्वर समूची मानव जाति की परीक्षा ले रहा है कि हममें कितनी मानवीयता बची है. सरकारी अफ़सरों , डाक्टरों, नर्सों , सफ़ाई कर्मियों और उन तमाम लोगों में जो इस विपदा की घड़ी में अपनी जान की परवाह न कर मानव सेवा में लगे है, को सलाम करते हुए अपना एक शेर फ़रमाते हैं .
ज़रा लड़ने की दिल में ठान ली तोबड़ा ख़तरा ज़रा सा हो गया है ।
वह उम्मीद करते हैं कि इस परीक्षा में हर देशवासी अव्वल दर्जे से पास होगा. बस हर बार की तरह इसे केवल सरकारी तंत्र का काम न समझें ,आपके आसपास का एक भी इंसान, प्रकृति के उपहार पशु पक्षी तक भी भूखे न रहे, बुरे वक़्त में एक रोटी कम खा लीजिए पर सब खा सकें ,यह संकल्प इस परीक्षणों पास होने के लिए ज़रूरी है.
वसीम साहब उदास ज़रूर है पर निराश क़तई नहीं हैं. कहते हैं कि मेरा देश आस्थाओं का देश है , इन आस्थाओं में इतना दम है कि बहुत जल्दी कोहरा छंटेगा, बस फ़िलहाल हर एक को एहतियात बरतनी है, मेडीकल साइंस ने संक्रमण से बचने के लिये तरीके बताए हैं , उनका कड़ाई से पालन कर खुद को , अपने घर को , अपने समाज को, दुनिया को बचाना है. वसीम साहब फ़रमाते हैं कि
बस इतना जान लो फिर ज़िंदगी ना बोलेगी
घरों से निकले तो दरवाजा मौत खोलेगी ।वसीम साहब कोरोना के इस दौर में शायर वसीम बरेलवी ,अपनी शायरी , अपनी बुलंदियों पर कोई बात करने से परहेज़ करते हैं. बस यह दुनिया महफ़ूज़ रहे ,इस मुसीबत से बाहर आए, इस जंग को जीत लें ,यही उनकी कामना है और ख़ुदा से यही अर्ज़ है. दुनिया नहीं रहेगी तो वसीम बरेलवी कहां रह जाएगा.
अल्लाह वसीम बरेलवी की अर्ज़ क़बूल करें , इसी कामना के साथ इस महबूब शायर के चंद बेशकामती शेर याद आ रहे है -आसमाँ इतनी बुलंदी पर जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है ।
जहां रहेगा वहीं रोशनी लुटाएगा
किसी चराग का अपना मकाँ नहीं होता ।
रात तो वक्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है कि चराग़ो का सफ़र कितना है ।
तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हो
जमीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है ।
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्तों के साथ
कीजे मुझे क़ुबूल मिरी हर कमी के साथ ।
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