टेलीग्राम के सहारे एक युग का वर्णन
अनिल उन कवियों में से हैं जो बहुत ही विनम्र ढंग से काव्य कर्म को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं. उन्हें पता है कि कवि को कहां से खड़ा होकर इस संसार और जीवन को देखना है. वह प्रचलितब अर्थों में प्रतिरोध के कवि नहीं है लेकिन गंभीर हाथों में उनकी पक्षधरता हर कविता में दिखाई पड़ती है.

विमल कुमार
साहित्य की दुनिया में जब कोई नया कवि आता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि उसके पास नया शिल्प क्या है, नई भाषा क्या है और नया मुहावरा क्या है लेकिन अक्सर हम इन बातों पर बहुत कम ध्यान देते हैं कि उस कवि के पास नए विषय वस्तु क्या हैं, नया कथ्य क्या है और चीजों को देखने का नया नजरिया क्या है? नवे दशक के कवियों में देव प्रसाद मिश्र ,कुमार अम्बुज और एकांत श्रीवास्तव के बाद जो नई पीढ़ी कविता में आई उसमें से एक कवि अनिल कर मेले भी थे लेकिन वह कम लिखते हैं और कविताओं के प्रकाशन में कम रुचि रखते हैं. इस लिहाज से अब तक एक ही संग्रह सामने आया जबकि उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों के अनेक संग्रह आए लेकिन अब इस वर्ष उनका दूसरा कविता संग्रह "बाकी बचे कुछ लोग" आया है जिसने साहित्य प्रेमियों का ध्यान खींचा है.
अनिल उन कवियों में से हैं जो बहुत ही विनम्र ढंग से काव्य कर्म को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं. उन्हें पता है कि कवि को कहां से खड़ा होकर इस संसार और जीवन को देखना है. वह प्रचलितब अर्थों में प्रतिरोध के कवि नहीं है लेकिन गंभीर हाथों में उनकी पक्षधरता हर कविता में दिखाई पड़ती है.
अनिल इस दृष्टि से पाठकों का ध्यान खींचते हैं. उन्होंने पिछले दो दशकों में समाज में आए आर्थिक बदलाव के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में जो बदलाव आए हैं और उसके कारण समाज जिस तरह से बदला है, उससे किस तरह का जीवन और कविता संभव हुई है,उसको दर्ज करने का काम कविता में किया है.
1873 में बने टेलीग्राफ कानून से लेकर 140 साल तक टेलीग्राम ने भारतीय समाज और जीवन में जो कुछ दर्ज किया है उसे अनिल ने कविता का विषय बनाया है. 15 जुलाई2013 को यानी आज से सात साल पहले टेलीग्राम का प्रचलन खत्म कर दिया गया. वह अखबार के लिए भले ही एक खबर मात्र हो पर वह कोई मामूली घटना नहीं थी बल्कि एक बड़ी घटना थी.
मीडिया ने टेलीग्राम के बंद होने से मनुष्य की संवेदनाओं स्मृतियों की भले गंभीर पड़ताल न की हो लेकिन अनिल ने उसे कविता का विषय बनाया और एक टेलीग्राम की मौत के बहाने उस पूरे जनजीवन और काल खंड को चित्रित करने की कोशिश की जो कभी हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा रहा और किस तरह हमारी स्मृतियां उसमें दर्ज रही खासकर एक कस्बे में निम्न मध्यवर्गीय परिवार में एक टेलीग्राम का आना किस तरह खुशी और भय का माहौल भी पैदा करता था और हम लोग टेलीग्राम को लेकर कितने सशंकित रहते थे.
कई बार अच्छी खबर सुनकर उत्फुल्लित भी रहते थे. इस मनोभाव का बहुत ही शानदार चित्रण अनिल ने इस कविता में किया है और कविता केवल टेलीग्राम की कविता नहीं रह जाती बल्कि वह अपने समय और जीवन की कविता बन जाती है. अनिल ने इस अलक्षित घटना को जिस तरह कविता का विषय बनाया है वह रेखांकित करने योग्य है.
इस तरह के बदलाव और सूक्ष्म परिवर्तन कला के लिए चुनौतियां है. कवि का काम इस बदलाव को साहित्य में दर्ज करना है. इस कविता से एक पूरा इतिहास सामने उपस्थित होता है. इसी तरह चिठियां और डायरी कविता भी इसी समाजिक बदलाव को व्यक्त करती हैं. इस बदलाव से जीवन का रंग बदल जाता है.
चिठियां और डायरी का हमारे जीवन मे क्या महत्व रहा है इसे हर कोई जानता है. यह हमारी अभिव्यक्ति का पहला मंच रहा है. इस मंच पर व्यक्ति ने खुद का भी अवलोकन किया है. यह माध्यम अनर्मन का दस्तावेज रहा है. इनमें वे सुख दुख दर्ज रहे हैं जिसका नोटिस नहीं लिया जाता या अलक्षित रह जाते हैं.
आज नयी पीढ़ी का जीवन और बचपन ईमेल और नई सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में बीता है, वह शायद डायरी और पत्रों के अहमियत और उसकी ऐतिहासिक महत्वको न सोच पाए. लेकिन अनिल ने तत्काल इस बदलाव को पकड़ने की कोशिश की है.
इसी तरह उनकी ये कविताएं डायरी सूचना प्रौद्योगिकी के इस बदलाव को दर्ज करती है क्योंकि आज के जमाने में डायरी लेखन भी लगभग बंद हो गया है और हम सब अपनी बातें नोटबुक या किसी अन्य खाते में दर्ज कर रहे हैं जो डायरी हम सबके जीवन का एक हिस्सा होती थी और अपने को अभिव्यक्त करने का पहला मंच होती थी उस डायरी का अब स्वरूप बदल गया है और अब वह डिजिटल डायरी में बदल गई है.
अनिल इस डायरी कविता के बहाने से भी समाज में हुए उसी प्रौद्योगिकी के बदलाव को रेखांकित करते हैं. हिंदी में डायरी पर अनेक कविताएं लिखी गई हैं लेकिन शायद ही किसी कवि ने डायरी लेखन में हुए इस बदलाव को रेखांकित किया है.
अनिल के पास कुछ छोटी कविताएं भी है कुछ प्रेम और स्त्री को लेकर कविताएं भी है लेकिन उन पर केदारनाथ सिंह मंगलेश डबराल और कुमार अम्बुज की छाया भी है. हर नया कवि अपने पूर्ववर्ती लेखकों को पढ़ता है और उस से प्रभावित भी होता है और उस पर उसका असर भी होता है और वह मुक्त होने का प्रयास भी करता है.
अनिल की कविताओं का ढब उनके पूर्ववर्ती कवियों की याद दिलाता है. उनके मुहावरे और खन में कोई नवीनता नही है है लेकिन उनके पास उनकी दृष्टि है. वह किसी भी घटना को एक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं और कामयाब लोगों के राज को पर्दाफाश करते हैं. उनका यथार्थ धुंधला नहीं है. आज जब अनेक युवा कवि शिल्प और भाषा की गलियों में कथ्य का घर नहीं खोज पाते हैं वहां अनिल की कविता राहत देती है. एक कवि के रूप में उनकी जीआन यात्रा कहां पहुंचती है यह उत्सुकता बनी रहती है.
लेखक साहित्यकार हैं
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